हमारे अंदर अनुभूतियों का सागर है,प्रवाह है। ये जीवन का बैरोमीटर है,ये हमारे अंदर की षक्ति को प्रदर्षित करता है। हमारी कल्पना को आगामी जीवन की कल्पना कहता है, यह तो प्रकृति का सुंदरतम उपहार है, इसे अभिव्यक्ति देना ईष्वरीय सत्ता को नमन करना है । हम जीवन को कैसे देख रहे हैं ? हम कैसा महसूस कर रहे हैं ?इस छोटी सी बात पर ही सारा जीवन टिका है। हमारी सफलताऐं असफलताऐं सब में यह बात निहित है, तो उसे हम बाहर आने दें ।
हमें अपने अंदर की इस षक्ति को उपयोग में लाना है, एंड्र कार्नेगी ने भट्टी बनाई और स्टील मिल की नींव रखी, जब कि हिटलर ने वही भट्टी लाषों को ठिकाने लगाने में काम में लाई ।
जब तक जीवन कार्यषील है, तब तक ही उपयोगी है, नहीं तो मिट्टी है। मिट्टी कितनी ही उपयोगी हो, रोंदी पैरों तले ही जायेगी ,जब वह कोई आकार ले लेती है तो सिर माथे भी रखी जाती है। सड़क का पत्थर ठोकर खाता है,जब वह मूर्ति रूप ले लेता है तो देवता बन जाता है ।
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