हमारे यहाँ एक लहर सी चलती है। कभी दलित विमर्श कभी नारी विमर्श और इसी के साथ सब जुट जाते है उसके उठान के लिए नारी पर विमर्श के लिए अब रपे के मामले भी उतनी तेजी से बढ़ रहे हैं। बेटी बचाओ अभियान चल रहा है हर भाषण पत्र पत्रिकाओं मैं भ्रूण हत्या की बात चल रही है कोख मैं बेटी मारने को हत्यारा कहते हैं और पर बेटी को नोचने खसोटने को उसे जिल्लत मैं जीने को मजबूर करने को जरा जरा सी बच्चियों को रौंद डालने को लड़के हैं भूल हो जाती है कह कर नकारने को उस माँ से पूछें जिसने अरमानों से उसे पैदा किया की बेटी भी जीने का अधकार रखती है पर क्या कुछ लफंगों की हवस का शिकार बनना उसकी नियति है। रबर की गेंद भी दबने पर दर्द भरी चीख निकालती है जरा जरा सी बच्चियों के घिनोने हत्यारों को ऐसे ही छोड़ दिया जाता है सौ सौ सवाल लड़कियों से किये जाते हैं और लड़के शान से मूँछों पर ताव देते हैं असली धिक्कार के पात्र हैं
Friday, 9 January 2015
beti ke liye
भोर जब भी मुस्कराती है
ख्यालों मैं तू मुस्कराती है
दुपहरिया का फूल जब भी खिलता है
तेरी बाँहों का एहसास मिलता है
शबनमसे रात जब नाम होती है
रेशमी गुल सी मखमली छुअन होती है
रात मैं आकाश मैं तारे टिमटिमाते हैं
तेरी चाँद मागने की जिद याद आती है
ख्यालों मैं तू मुस्कराती है
दुपहरिया का फूल जब भी खिलता है
तेरी बाँहों का एहसास मिलता है
शबनमसे रात जब नाम होती है
रेशमी गुल सी मखमली छुअन होती है
रात मैं आकाश मैं तारे टिमटिमाते हैं
तेरी चाँद मागने की जिद याद आती है
Wednesday, 22 October 2014
bhagwaan ki Insaan se prayer
मुझ पर दया करो इंसान
मुझ पर दया करो इंसान
मंदिर मैं घंटे बजते हैं
मस्जिद मैं हो रही अजान
चारो ओर पुकारे हा हा
देदे देदे हे भगवान्।
कोई कहता लक्ष्मी देदे
कोई कहता आसन
कोई कहता छाया देदो
कोई कष्ट निवारण।
अल्लाह भी हैं मेरे भाई
लेकिन उनमें है चतुराई
कहाँ की जन्नत कैसी जन्नत
देती नहीं दिखाई …
पैगम्बर है वन मैं अटके
ईसा रूप मैं क्रॉस पर लटके
ऐसे मैं बस दया दिखाएँ
कैसी जुगत भिड़ाई।
लेकिन मेरी मुश्किल कैसी
दिखते हाथ अनेकों
अपने सब हाथो से दाता
किरपा सारी फेंको।
चंदा को भी जा घर भेजा
जिससे सब हो जाये अँधेरा
ब्रह्माजी ने कृपा करी और
देने बैठे पहरा
डर जायेंगे शेषनाग से
उसका पलंग बनाया
सागर मैं जा छिप कर लेटा
पर मानुष को चैन न आया
जल जल कर दिए अनेकों
मुझको घेर लिया था
सोने की मेरी इच्छा को
उसने ढेर किया था।
उठ जाओ बस बहुत सो लिए
देदो हमको दान
देदो देदो की आवाजें
फोड़ रही थी कान।
लेकिन इससे ज्यादा मुश्किल
लक्ष्मी को लेकर है आई
देदो देदो लक्ष्मी देदो
करते यही दुहाई
अपनी पत्नी कैसे देदूं
कैसा तू नादान
अपने घर को सूना कर लूँ
सोच जरा इंसान
दर्शन से यदि हो जाये तो
घर घर लक्ष्मी जाए
सौ सौ ताले लगा लगा कर
करते अंतर्ध्यान।
मुझ पर दया करो इंसान
मंदिर मैं घंटे बजते हैं
मस्जिद मैं हो रही अजान
चारो ओर पुकारे हा हा
देदे देदे हे भगवान्।
कोई कहता लक्ष्मी देदे
कोई कहता आसन
कोई कहता छाया देदो
कोई कष्ट निवारण।
अल्लाह भी हैं मेरे भाई
लेकिन उनमें है चतुराई
कहाँ की जन्नत कैसी जन्नत
देती नहीं दिखाई …
पैगम्बर है वन मैं अटके
ईसा रूप मैं क्रॉस पर लटके
ऐसे मैं बस दया दिखाएँ
कैसी जुगत भिड़ाई।
लेकिन मेरी मुश्किल कैसी
दिखते हाथ अनेकों
अपने सब हाथो से दाता
किरपा सारी फेंको।
चंदा को भी जा घर भेजा
जिससे सब हो जाये अँधेरा
ब्रह्माजी ने कृपा करी और
देने बैठे पहरा
डर जायेंगे शेषनाग से
उसका पलंग बनाया
सागर मैं जा छिप कर लेटा
पर मानुष को चैन न आया
जल जल कर दिए अनेकों
मुझको घेर लिया था
सोने की मेरी इच्छा को
उसने ढेर किया था।
उठ जाओ बस बहुत सो लिए
देदो हमको दान
देदो देदो की आवाजें
फोड़ रही थी कान।
लेकिन इससे ज्यादा मुश्किल
लक्ष्मी को लेकर है आई
देदो देदो लक्ष्मी देदो
करते यही दुहाई
अपनी पत्नी कैसे देदूं
कैसा तू नादान
अपने घर को सूना कर लूँ
सोच जरा इंसान
दर्शन से यदि हो जाये तो
घर घर लक्ष्मी जाए
सौ सौ ताले लगा लगा कर
करते अंतर्ध्यान।
Sunday, 31 August 2014
samaj seva ya sv seva
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Saturday, 23 August 2014
ab bolenge
जब कांग्रेस सत्ता मैं थी तब अपने को सर्वोपरि समझती थी हर मसाले मैं चुप अब कांग्रेस बोल रही है की सरकार को क्या करना चाहिए क्या नहीं करना चाहिए क्या पाकिस्तान द्वारा गोलीबारी नई बात है उन्होंने क्या कर लिया अब तक उन पर विश्वास किया है लेकिन उनका बस चले तो वे जो पलने मैं होगा उसके पैरों मैं माथा रख कर चाहेंगे जनता उनकी ही उगली पकड़ कर चलती रहे। सुरंग क्या दो महीने मैं बन गयी होगो अब तक क्या देख रहे थे
amitaabh ka tweet
अमिताभ वच्चन का ट्वीट पढ़ा " सूंघ कर कोई मसल डाले यह है गुल की जीस्त (जीवन)
मौत उसके वास्ते टहनी पर मुरझाने मैं हैं "
मेरी समझ मैं नहीं आया इसके द्वारा श्री श्री श्री महान~ क्या कहना चाहते हैं म्रेरी समझदानी बहुत छोटी है पर समझ नहीं आया क्या फूल की यही नियति है पल भर के उन्मादियों को खूशबू देकर कुचल जाये उसे पूर्ण रूप से महकते हुए पूरा जीवन जीने का अधिकार नहीं है अ पुरुष गरिमा का ढोंग कितना भी कर ले पर अंदर की विकृत मानसिकता निकल ही पड़ती है इन पंक्तियों के माध्यम से क्या तो लिखनेवाला कह रहा है और क्या समझने का प्रयास किया जा रहा है मेरे तो गले नहीं उतरीं आप सब को अच्छी लगीं क्या?
मौत उसके वास्ते टहनी पर मुरझाने मैं हैं "
मेरी समझ मैं नहीं आया इसके द्वारा श्री श्री श्री महान~ क्या कहना चाहते हैं म्रेरी समझदानी बहुत छोटी है पर समझ नहीं आया क्या फूल की यही नियति है पल भर के उन्मादियों को खूशबू देकर कुचल जाये उसे पूर्ण रूप से महकते हुए पूरा जीवन जीने का अधिकार नहीं है अ पुरुष गरिमा का ढोंग कितना भी कर ले पर अंदर की विकृत मानसिकता निकल ही पड़ती है इन पंक्तियों के माध्यम से क्या तो लिखनेवाला कह रहा है और क्या समझने का प्रयास किया जा रहा है मेरे तो गले नहीं उतरीं आप सब को अच्छी लगीं क्या?
Friday, 15 August 2014
live in relation ship
लिव इन रिलेशन शिप अपने को अत्याधुनिक सोच कहनेवाले व्यक्ति दूसरे को उदार होने की सलाह देकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रहे हैं कि औरतों को दूसरी औरत को स्वीकार कर लेना चाहिए लेकिन इस सोच को केवल औरतों तक ही क्यों सीमित किया गया कि सपत्नी रह सकती है तो तो सपति भी रह सकता है. संभवत: कोर्ट का यह भी आदेश होगा होगा की पत्नी भी दुसरे व्यक्ति को घर मैं रख सकेगी दूसरे व्यक्ति को पति सहन करना होगा और दनो से उत्पन्न बच्चों का पालन कौन सा व्यक्ति करेगा करेगा जो रजिस्टर्ड पति पत्नी होंगे या जो केवल रहने के लिए रह रहे हैं वे पल्ला झाड़ बच्चों को उनके मत्थे मढ़ गायब हो जायेंगे इसका मतलब जीवन जिम्मेदारी नहीं घर गृहस्थी नहीं एक व्यभिचार का या कहना है सेक्स का अड्डा है क्योकि लिव इन रिलेशन शिप मैं दूसरे व्यक्ति की दरकार या तो पैसा होगा या सेक्स। महिलाएं रईस व्यक्ति को फसाएंगी और उस व्यक्ति से जायदाद पैसा हासिल करेंगी फिर दूसरे व्यक्ति को तलाशेंगी पति दूसरी औरत लाएगा बहुत अच्छी सामाजिक स्थिति होगी जीवन बंधन मुक्त होगा वृद्धाश्रम का चलन बढ़ ही रहा है बाल घर अनाथालय तो हैं ही और बन जायेंगे माँ बाप को वृद्धाश्रम भेजो खुलकर आनंद ही आनंद लो एक उन्मुक्त जीवन। और जब मन भर जाये तब खुद किसी आश्रम की तलाश करलो। जय हो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की। सारे सम्बन्ध सारे रिश्ते नाते गठरी मैं बांध कर रख लो अपनी औलाद अभी नकार रही है तब तो पहचानने से भी इंकार कर देगी
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