भौतिकवादी जीवन की ओर बढ़ते युवा और उनके कंधों पर चढ़ता कर्ज का बोझ उनके कंधों को झुका देता है। वे दिन में अपना कॉलर ऊंचा रख कर एक से एक बड़ी गाड़ियों में चलते हैं और रात में ई एम आई की चिंता में करवटें बदलते हैं। चेहरे पर नकली मुस्कान और आंखों में चिंता की झलक एक एक बात पर चिड़चिड़ाहट ,झल्लाहट उनकी मानसिकता को दर्शाता है। जीवन सुकून के स्थान पर संघर्षमय हो गया है । हंसता खेलता परिवार घर आकर बच्चों के बीच बैठने की ललक नहीं है। देर से घर आना और इधर उधर झल्लाते हुए कमी निकालते हुए सो जाना। चिंता से सोना चिंता से जागना ।उन्होंने दर्शन तो अपनाया है जब तक जियो सुख से जियो,ऋण लेते जाओ और घी पीओ पर जीवन आराम से बीतना चाहिये। क्रेडिट कार्ड ने और इस प्रवृर्ति को बढ़ावा दिया है ,मन चाहा खरीदो उधार लो जेब में नहीं दाने अम्मा चली भुनाने वाली स्थिति रहती है। पैसा जमा करके क्या करना है आने वाली पीढ़ी अपना अपने आप देखेगी । पहले भी कहावत थी ,‘पूत कपूत तो का धन संचे पूत सपूत तौ का धन संचै।’। पहले कर्ज चुकाना है तो दूसरा लेकर चुका दो । परंतु सत्य तो यह है इंसान को अपने को सीमित रखना चाहिये जो है वही सत्य है ।☺
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