Wednesday, 26 December 2012


एक  बेटी  का प्रश्न 

माँ  तूने जब जन्म दिया तो तुझे  देख  मुस्काई 
पर तेरी आंखे  मुझको पा   ऐसे  क्यों भर आई 
ममता भरे हाथ हैं तेरे  है बेहद नरमाई 
पर  उस ममता  मैं भी मैंने  एक कपकपी पाई 
मैं तो  तेरी छाया  पर  तू क्यों  न हरषाई 
फेर लिया क्यों मुझसे चेहरा  दूर मुझे  सरकाई 
तेरे रक्त मांस से  बनकर  तुझसे सांसें  पाई 
तेरी  अनुकृति  बनकर ही मैं इस धरती  पर आई 
समझ गई मैं तुझको भी थी  पुत्र जनम  की आशा 
सूखा तेरा आंचल  मन मैं  तुझको हुई  निराशा 
माँ की ममता फर्क न जाने  बात यही मशहूर 
बेटी शब्द  जुड़ा  तो क्यों मैं हो गई तुझ से  दूर 
माँ तेरा अंचल  मिल जाये  तो कर जाऊ  कुछ काम 
आसमान  मैं जाकर मैं  लिख दूँगी तेरा नाम 









Monday, 24 December 2012

ना  जाने  कब वक्त  खिड़की  पर  आ  बैठता  है
और दस्तक देकर उड़  जाता है
 उसकी  आहट भी नहीं  सुन पाते है
 कब बालों  मैं  सवेरा कर जाता है
हम समझतें हैं  भोर  हो गई
टांग कर  दोपहरी  को अलगनी पर
 रात की सियाही भर  जाता है
जब  घोर अँधेरा  हो जाता है
लगता है वक्त की  सांसें थमी थमी सी
बीत जाएगी  ऐसे  ही जिंदगी
 दीवाल पर  टंगे कैलेंडर  की तरह
तारीखें वही  रहेंगी
तस्वीर  बदल जाएगी
 काल बांधे  वक्त को
लादकर    कन्धे  चला
वक्त  के  टुकड़ों  को  छितरा
मुस्करा  कर चल  दिया
जागते  सपनों  को बुनकर
चाँद  तारे  टांग  दिए
वक्त ने   तारे  नोच दिए
चाँद को झपट कर
खोंस लिया बालों मैं
वक्त भी क्या गुल खिलाता है
बच्चों की तरह पांव दबा कर
बगल से  निकल जाता है 

Tuesday, 18 December 2012

had ke par

बलात्कार हो गया है खेल
चौपड़ बनी है नारी
जो चाहे जब  चाहे  खेले
और रॉद  दे  और  फेंक दे
 कचरे की माफिक 

Sunday, 16 December 2012

हो जाओ  सावधान  अपनी अपनी  जड़ें  खोजना  शुरू  कर दो  फिर बहुत  सारे  पाकिस्तान  बनने  वाले हैं .पहले  तो घूम घूम कर देखो किसके घर पर कब्ज़ा  करना  अच्छा रहेगा  अपने दडवे से बहार नहीं  जाओ बिहारी  बिहार  मैं विहार  करेंगे  बच्चे  बहार पढने  नहीं  जायेंगे  और नोकरी  बिहार  मैं  ही करेंगे  यूपी  वाले
यूपी  मैं  रहेंगे  सिमट  जायेगा भारत न  ट्रेन  की  जरूरत  न  हवाई जहाज  की  जरूरत  कितना आसान  हल  है  जिंदगी का  क्यों नहीं  किसी  की समझ आता  है 

Thursday, 29 November 2012

ईर्ष्या  भय  और  अहंकार क्रोध  के मुख्य कारण  हैं  इसके अलावा कोई  व्यक्ति  तब  क्रोधित होता है  जब  कोई काम  उसकी इच्छा  के  विरुद्ध  होता  है । अतृप्त  व असंतुष्ट  लोग  भी  क्रोध  की  गिरफ्त  मैं बहुत  जल्दी और  आसानी से आ  जाते  हैं .,और क्रोध मैं  आकर  अपना  अनिष्ट  कर बैठते हैं .
क्रोध  को जीतने मैं मौन  सबसे  अधिक सहायक  है
स्वामी विवेकानंद द्वारा  कहा  हुआ  यह वाक्य  कि  मौन  क्रोध की चिकित्सा  है क्रोध पर  विजय प्राप्ति का  सर्वश्रेष्ठ उपाय  है  अत: आपको जब भी क्रोध  आये तो चुप्पी साध लें हालांकि यह काम आसान  नहीं किन्तु  चुप्पी  क्रोध को शांत करने  का  सबसे  प्रभावी व् शक्तिशाली  समाधान है .
जब आप क्रोध में  हों    तो दस  और अति  क्रोध मैं  हों तो सौ तक  गिनती गिने -नेफ्र्सन

Tuesday, 27 November 2012

Sunday, 25 November 2012

eershya

ईर्ष्याभयऔरअहंकारक्रोधकेमुख्यकारणहँ