Thursday, 30 April 2026

bcche aur mobile

 किशोरावस्था में बच्चे हर समय की टोकाटाकी से अपनी बातों को छिपाने लगते हैं कि पता नहीं किस बात के लिए माता पिता कह दें यह ऐसा क्यों किया वैसा क्यों किया। बच्चों का मन जानना समझना बहुत आवयश्क है इसके लिए उनसे बात करते रहना चाहिये।

देखा जाए तो मोबाइल पर गढ़ी आंखें परिवार का समय भी छीन रही हैं उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय भी छीन रही हैं क्योंकि इससे केवल हताशा निराशा और उच्छृखंलता के सिवाय कुछ भी नहीं मिलने वाला है। अब मस्तिष्क को श्रम करने की आवश्यकता नहीं है बस आंखें उस तक संदेश पहुंचाती रहती हैं और वो उनके साथ ही घूमता रहता है। जितना आप मस्तिष्क से काम लेंगे वह उतना सक्रिय होता है,पर रील देखने में मस्तिष्क को क्रिया का अवसर ही नहीं मिलता है तो वह भी आरामतलब हो जाता है उसे भी कुछ सोचने की और समझने की आवयश्कता नहीं रहती 


Tuesday, 28 April 2026

bacche aur mobile

 मोबाइल के उपयोग से बच्चों को रोकना बच्चों को विद्रोही बना देना हो गया है। बच्चे मोबाइल के आदी हो चुके हैं जिसे कहते हैं नशा हो जाना। अखबार में आये दिन खबर पढ़ने को मिलती है कि बच्चे को मोबाइल नहीं दिलाया या देखने से रोका तो माता पिता की हत्या कर दी ।या आत्म हत्या जैसे कदम उठा लिए कभी एक समाचार था कि कोरियन रील देख देख कर  तीन बहनों ने कूद कर आत्महत्या करली। गेम्स खेलना या रील देखकर टास्क करने की लत लग जाती है और घंटों उसे लिये बैठे रहना देखना अपने भविष्य से खिलवाड़ करना है। उन्हें न स्कूल के काम की फुरसत न मैदान में दोस्तों के साथ खेलने की यहां तक कि खाने की फुरसत नहीं है ।बस आंखें रील के साथ चलती रहती हैं। इसमें डूब जाने को एक कारण यह भी है अकेलापन सीमित परिवार अपने अपने कामों में व्यस्त मां बाप। बच्चों को व्यस्त रखने के लिये स्वयं मां बाप उनके हाथ में मोबाइल पकड़ा देते हैं और बालक के लिये सारी दुनिया उसी में मिल जाती है । उसके साथ हंसना खेलना बोलना सब होने लगा है 

Monday, 27 April 2026

bacche aur mobile 2

 अधिकतर अब दम्पत्ति यही चाहते हैं  िकवे अकेले रहें  वे दो बस ,न किसी को कुछ कहना पड़े न बताना पड़े न कोई उन पर जिम्मेदारी हो  िकवे घर पर से कैसे जायें क्या खा रहे हैं और कीां जा रहे हैं । मां बाप होते हैं तो यह सब बताना पड़ता है । मां बाप टोक भी देते हैं कि यह क्या कल भी बाजार का खाया आज भी बाजार का । बच्चे करना नहीं चाहते बच्चा होना मतलब बंधन । बहुत कहने पर किया भी तो एहसान से एक, चाहे लड़का हो या लड़की । अब लड़की भी कोई कम नहीं होती हैं । दो होते हैं तो बहुत अंतर से वे बड़े होते हैं अलग अलग तरह से वे भाई बहन की तरह नहीं जो लड़ते झगड़ते हैं वे दो अजनबियों की तरह रहते हैं क्योंकि उम्र का अंतर उन्हें साथ नहीं दे पाता। और बच्चे तरह तरह की डिवाइसों की तरफ मुड़ जाते हैं । अब मां बच्चे को अपना दूध तो पिलाती नहीं है वो बोतल से दूध पिलाती है और बच्चा दूध पीले बोतल हटाये नहीं उसके सामने मोबाइल रख देती है और बच्चा उन चलती तस्वीरों को देखकर दूध पी लेता है फिर वह उसका आदी हो जाता है और बिना मोबाइल असहज हो उठता है। जितनी देर तक आप या बालक मोबाइल पर आंख लगाये रहते हैं आप अपने परिवार से दूर हो जाते हैं यह उनसे छीना हुआ समय है। एक निष्क्रियता का जीवन जिसमें चंद इंन्द्रियां सक्रिय रहती हैं बाकी सब निष्क्रिय होती जाती हैं। मस्तिष्क की उर्वरता तो बिलकुल खत्म हो जाती हैं। -रटत रटत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ’पर यहां तो सुजान भी जड़मति हो जाते हैं। कयोंकि मस्तिष्क पर जोर देने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है 

Sunday, 26 April 2026

Why do we say it

 He has an axe to grind

Selfish motive to advance

This a story of a man who had to grind his axe but locked the strength to do this for himself .He saw a young man, young and strong busy with his grindstone. Fighting ignorance, the old man asked the boy how the grindstone worked ,and whilst the boy demonstrated this with the old man’s axe .The man kept on praising the boy’s strength and skill until the axe was ground, whereupon went away laughing at the boy’s foolishness and gave him no rewards          .                                                                                                                                                                                               

anubhutiyan

हमारे अंदर अनुभूतियों का सागर है,प्रवाह है। ये जीवन का बैरोमीटर है,ये हमारे अंदर की षक्ति को प्रदर्षित  करता है। हमारी कल्पना को आगामी जीवन की कल्पना कहता है, यह तो प्रकृति का सुंदरतम उपहार है, इसे अभिव्यक्ति देना ईष्वरीय सत्ता को नमन करना है । हम जीवन को कैसे देख रहे हैं ? हम कैसा महसूस कर रहे हैं ?इस छोटी सी बात पर ही सारा जीवन टिका है। हमारी सफलताऐं असफलताऐं सब में यह बात निहित है, तो उसे हम बाहर आने दें ।

हमें अपने अंदर की इस षक्ति को उपयोग में लाना है, एंड्र कार्नेगी ने भट्टी बनाई और स्टील मिल की नींव रखी, जब कि हिटलर ने वही भट्टी लाषों को ठिकाने लगाने में काम में लाई ।

जब तक जीवन कार्यषील है, तब तक ही उपयोगी है, नहीं तो मिट्टी है। मिट्टी कितनी ही उपयोगी हो, रोंदी पैरों तले ही जायेगी ,जब वह कोई आकार ले लेती है तो सिर माथे भी रखी जाती है। सड़क का पत्थर ठोकर खाता है,जब वह मूर्ति रूप ले लेता है तो देवता बन जाता है ।


Friday, 24 April 2026

mobaile aur bacche

 यद्यपि मोबाइल,‘दनिया मेरी जेब में ,तकनीकी विज्ञान का चमत्कार है इसने पूरी दुनिया को सबके सामने एक क्लिक पर ला दिया है और यदि कहा जाए तो एसा छोटा सा डिब्बा वह जो अगर आपके पास है तो आपको न मोटे मोटे एनसाइक्लोपीडिया,डिक्शनरी,कुछ भी नहीं चाहिए । वैसे ही पुस्तके अपना आस्त्त्वि खोती जा रही है। इस छोटी सी डिबाइस ने पुस्तकों को धूल खाने को विवश कर दिसा है। मोबाइल ने न जाने कितनी चीजों को डिब्बे में बंद कर दिया है। बच्चे जहां रंग बिरंगी किताबों को खोल कर पढ़ने बैठते थे अब गर्दन झुकाए छोटी सी स्क्रीन पर देखते रहते हैं? संभवतः एक दिन गर्दन टेढी वाले ही पैदा होने लगेंगे ।आंखें अपना आस्त्त्वि खो देंगी पर मोबाइल की दुनिया बच्चे छाड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे , 

 सिमटते परिवारों ने बच्चों का एकाकीपन बढ़ा दिया था उसकी वजह से बच्चे चिड़चिड़े हो रहे थे पर अब बच्चे एकाकीपन अधिक पसंद करते हैं आपके बोलने तक ये चिढ़ने लगते हैं। अब बैट बल्ला नहीं खेलना चाहता। वे गेम वीडियो पर खेलते हैं। वर्चुअल दुनिया में समा गये हैं। आपका किसी काम का कहना या बुलाना उन्हें झुंझला देता है ।


Wednesday, 22 April 2026

hum badal rahe hain

 हम अपने अंदर बुनियादी बदलाब चाहते हैं। चेतना जाग्रत होती है पर कैसे के सवाल के साथ ही इब जाती है,कारण मन सोचता कुछ और है लेकिन जब कभी कार्यान्वित करने का  अवसर आता है तो मन बदल जाता है अपने पुराने ढर्रे पर चल देता है। असली बदलाव युवा वर्ग में आ रहा है,रोमांच फन और पैसों के दुरुपयोग का शान शैकत आदि की ओर अधिक घ्यान दे रहे हैं। यहां विचार और विचारक बदल जाते हैं  । भारतीय संस्कृति उच्चतम पायदान पर थी अब धीरे धीरे वह एकदम निचले  स्तर पर आती जा रही  है । बेटा बाप का कत्ल कर रहा है ,बेटी पूरे परिवार को मौत की नींद  अपनी हवस के कारण सुला रही हैं भाई  भाई को मार रहा है बहन हिस्से के लिये लड़ रही है ,इकलौते भाई को मार रही है,जिससे अकेली वह जमीन जायदाद की वारिस बन जाये ।    

Tuesday, 21 April 2026

shabd ko nishabd ki abha cahiye

 आजकल आम बोलचाल की भाषा में नये नये शब्द गढ़कर आ गये हैं। अगर उनका शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो  अर्थ का अनर्थ हो सकता है। मीडिया को बाइट चाहिये ऐसा लगता है मीडिया काटखाने के लिये दौड़ती ह या हम चबा चबा कर शब्द बोल रहे हैं कि कुछ मंुह से गलत न निकल जाए जो अखबारों की सुर्खियां बन जाऐं। पर फिर भी जब दो विरोधी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती हैं तो उस समय ऐसा लगता है कि अंडरवर्ल्ड के लोग हैं जो एक दूसरे को शब्दों से नहीं मार रहे चाकू छुरे घोंप रहे हों फिर बाद में माफी मांगते दिखेंगे कि कुछ अनजाने में शब्द निकल गये जब कि वे जानबूझ कर बोले गये होते हैं पर दिखाते हैं कि गलती से निकल गए।जैसे भोजन खायें या ठूस लें । आहत को राहत चाहिये न कि कटु शब्दों की मार कि ऐसा होना चाहिये। विष भरे शब्द घायल के घाव को कुरेद कर उसे नासूर बना देते हैं। अर्न्तमन से निकला शब्द असर करता है। मन में शब्द पलने चाहिए उन्हें परिपक्व होने देना चाहिए कि आप बोल रहे हैं वह कहां तक उचित हैं। आपके शब्दों का प्रभाव पड़ेगा या नहीं । आपके भाव और मन की ऊर्जा शब्दों में प्रवेश करती है और आपका वाक्य वजनदार हो जाता है। शब्द को भी निशब्द की आभा चाहिये ,कौन से निकले शब्द घायल मन के लिये औषधि होंगे ,वजनदार होंगे 

Saturday, 18 April 2026

boliye magar sambhal kar

 बोलिये मगर संभल कर ,मुंह से निकला शब्द और तरकश से निकला तीर वापस नहीं आ सकता,जब दोनों की दिल पर लगते हैं तो घायल कर देते हैं इसलिए अच्छा है कि बोलते समय ही संभल कर बोलिये। मन में कुछ और जुबां पर कुछ भी कभी कभी आवश्यक है 

एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव

शब्द संभल कर बोलिये शब्द के हाथ न पाव

कबीर दास जी ने एक दोहे में पूरा जीवन का फलसफा सामने रख दिया । शब्द घायल मन पर मलहम का काम भी कर सकते हैं और उसे कुरेद कर नासूर बना सकते हैं । वे शब्द ही आपकी धारणा का इजहार करते हैं आप सामने वाले के प्रति कितनी आस्था रखते हैं । 


Tuesday, 14 April 2026

admi ke andar jaungal

 स्वच्छ हवा जैसी चीजें बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं, क्योंकि ये सबकी भलाई के लिए होती हैं 

आज के डिजीटल गणतंत्र में डिजिटल साक्षरता पारंपरिक साक्षरता की तरह ही महत्वपूर्ण है। 

आदमी के अंदर भी जंगल उग आते हैं और उसमें कटीली झाड़ियां सिर उठाने लगती हैं। आंतरिक क्रोध दुश्चिंता से कुछ हरकत एसी हो जाती हैंजब मन शांत हो जाता है तब बहुत ग्लानि होती है कि यह हमने क्या कर दिया? हम अवसाद में धिरने लगते हैं। इससे अच्छा है उस स्थिति से उबर जाना न कि यह सोचते रहना कि हमने यह क्या कर दिया। हमसे ऐसा कैसे हो गया। अपने को समझायें कि जो कुछ हुआ परिस्थ्तििवश हो गया,परंतु जहां तक है उस स्थिति पर काबू पायें । यह जरूरी नहीं कि इसके लिए आप अपने को सजा दें बल्कि परिस्थिति  को सुलझाने का प्रयास करें । एक मुस्कान बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिला देती है 


Saturday, 11 April 2026

manidhara

 स्वच्छ हवा जैसी चीजें बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं, क्योंकि ये सबकी भलाई के लिए होती हैं 

आज के डिजीटल गणतंत्र में डिजिटल साक्षरता पारंपरिक साक्षरता की तरह ही महत्वपूर्ण है। 

आदमी के अंदर भी जंगल उग आते हैं और उसमें कटीली झाड़ियां सिर उठाने लगती हैं। आंतरिक क्रोध दुश्चिंता से कुछ हरकत एसी हो जाती हैंजब मन शांत हो जाता है तब बहुत ग्लानि होती है कि यह हमने क्या कर दिया? हम अवसाद में धिरने लगते हैं। इससे अच्छा है उस स्थिति से उबर जाना न कि यह सोचते रहना कि हमने यह क्या कर दिया। हमसे ऐसा कैसे हो गया। अपने को समझायें कि जो कुछ हुआ परिस्थ्तििवश हो गया,परंतु जहां तक है उस स्थिति पर काबू पायें । यह जरूरी नहीं कि इसके लिए आप अपने को सजा दें बल्कि परिस्थिति  को सुलझाने का प्रयास करें । एक मुस्कान बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिला देती है ।


Friday, 10 April 2026

man manidhara

 गुरू गोविंद सिंह ने अनेक युद्ध जीते। युद्ध में घायल सैनिकों को पानी पिलाने का काम उन्होंने भाई कन्हैया को सौंपा। भाई कन्हैया केवल अपनी तरफ के सिपाहियों को ही नहीं बल्कि दुश्मन  के घायल सैनिकों को भी पानी पिलाते थे । कुछ लोगों ने गुरू से इस बात की शिकायत की। गुरू गोविंद सिेह ने भाई कन्हैया से इसका जवाब पूछा तो भाई कन्हैया ने गुरू साहब को कहा,‘ मैं जहां आपकी ज्योति देखता हूं वहां पानी पिला देता हूं’। इस पर गुरू गोविंद सिह ने कहा कि यही एक व्यक्ति है जिसने मेरी शिक्षा को सही रूप् में समझा है और उस पर अमल किया है । उन्होंने भाई कन्हैया से कहा अब आगे से पानी ही नहीं बल्कि उन सिपाहियों की मरहम पट्टी भी किया करो ।धर्म की रक्षा के लिए गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने समस्त परिवार का बलिदान भी किया,इसलिए उन्हें सरबसदानी यानि पूरे परिवार का दानी भी कहा जाता है। उन्होंने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना कर समस्त मानव जाति को प्रेम और बलिदान का संदेश दिया, वो अपने उपदेश में कहा करते थे कि हम अच्छे कर्म करने मे कभी पीछे न हटें,नतीजा कुछ भी हो। धर्म की रक्षा की खातिर अपने परिवार के चारों ओर पु़त्रो को कुरबान कर दिया। उनहोंने प्राणि मात्र को समझाया  कि जबयह अनुभाव करते हैं कि हम एक शरीर नहीं एक आत्मा हैं तब इस सृष्टि के प्रति और ज्यादा । हम धरती रहने वाले जागरूक हो जाते 

Thursday, 9 April 2026

man manidhara

 गुरू गोविंद सिंह ने अनेक युद्ध जीते। युद्ध में घायल सैनिकों को पानी पिलाने का काम उन्होंने भाई कन्हैया को सौंपा। भाई कन्हैया केवल अपनी तरफ के सिपाहियों को ही नहीं बल्कि दुश्मन  के घायल सैनिकों को भी पानी पिलाते थे । कुछ लोगों ने गुरू से इस बात की शिकायत की। गुरू गोविंद सिेह ने भाई कन्हैया से इसका जवाब पूछा तो भाई कन्हैया ने गुरू साहब को कहा,‘ मैं जहां आपकी ज्योति देखता हूं वहां पानी पिला देता हूं’। इस पर गुरू गोविंद सिह ने कहा कि यही एक व्यक्ति है जिसने मेरी शिक्षा को सही रूप् में समझा है और उस पर अमल किया है । उन्होंने भाई कन्हैया से कहा अब आगे से पानी ही नहीं बल्कि उन सिपाहियों की मरहम पट्टी भी किया करो ।धर्म की रक्षा के लिए गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने समस्त परिवार का बलिदान भी किया,इसलिए उन्हें सरबसदानी यानि पूरे परिवार का दानी भी कहा जाता है। उन्होंने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना कर समस्त मानव जाति को प्रेम और बलिदान का संदेश दिया, वो अपने उपदेश में कहा करते थे कि हम अच्छे कर्म करने मे कभी पीछे न हटें,नतीजा कुछ भी हो। धर्म की रक्षा की खातिर अपने परिवार के चारों ओर पु़त्रो को कुरबान कर दिया। उनहोंने प्राणि मात्र को समझाया  कि जबयह अनुभाव करते हैं कि हम एक शरीर नहीं एक आत्मा हैं तब इस सृष्टि के प्रति और ज्यादा । हम धरती रहने वाले जागरूक हो जाते हैं ।

Monday, 6 April 2026

Man manidhara

 जब तक सोच मौजूद है शब्द जिंदा रहते हैं और साहित्य का जरिया बन जाते हैं - सिरिल कानेैली

जीवन हर दिन किये जाने वाला नया ईमानदार प्रयोग है, जो बीत गया वह बोझ नहीं अगर उससे सीखे ले। गलतियां हमें तोड़ने नहीं बल्कि तराशने आती हैं। असली ऊर्जा शोर में नहीं उद्देश्य की स्पष्टता में जन्म लेती है। धैर्य दिशा देता है और संयम गति को स्थिर रखता है । हर  सुबह खुद से बेहतर बनाने का प्रण करना ही सच्ची आशा है।


Sunday, 5 April 2026

Man manidhara

 जब हम एक पड़ाव पर ठहरा हुआ महसूस करते हैं तब मन स्वाभाविक रूप से पीछे भी देखता है और आगे भी । वही क्षण है यह स्वीकार करना चाहिये जो बीत गया उसने हमें कुछ सिखाया ही होगा । भूलें जीवन की सबसे बड़ी शिक्षक होती हैं,अपनी गलती समझ लेना उसे दोहराने से बचना है और यही सीख भविष्य की ताकत बन जाती है ।

अधीरता हमें भटका देती है संयम हमें स्थिर रखता है यदि दिशा सही हो तो धीरे धीरे चलना कमजोरी नहीं है। छोटे शांत और ईमानदार प्रयास समय के साथ बड़े बदलाव की नींव रखते हैं। सच्चा परिवर्तन बाहर नहीं भीतर से शुरू होता है। दुनिया व्यवस्था और लोग इन पर प्रश्न उठाना सरल है पर  स्वयं से प्रश्न करना कठिन है जब तक विचार और आचरण के बीच दूरी बनी रहती है तब तक कोई सुधार टिकाऊ नहीं हो सकता। क्रोध और अहंकार तत्कालिक संतोष दे सकते हैं लेकिन भीतर रिक्तता छोड़ जाते हैं। संयम और अनुशासन धीरे धीरे चरित्र निर्माण करते हैं 


Saturday, 4 April 2026

jeevan

 जीवन हर दिन किए जाने वाला ईमानदार प्रयोग है जो बीत गया वह बोझ नहीं अगर उससे सीख लो । गलतियां हमें तोड़ने नहीं बल्कि तराशने आती हैं। असली ऊर्जा शोर नहीं बल्कि उदेश्य की स्पष्टता में जन्म लेती है,धैर्य दिशा देता है और संयम गति को स्थिर रखता है,हर सुबह खुद से बेहतर बनने का प्रण करना ही सच्ची आशा है।

क्रोध व अहंकार तात्कालिक संतोष दे सकते हैं लेकिन वे भीतर रिक्तता छोड़ जाते हैं,जीवन में वास्तविक प्रगति न तो शोर करती है ,नही दिखावा वह भीतर मजबूत बनाती है ।


Thursday, 2 April 2026

drashtibadha

हम अपने अंदर कुछ धारणाऐं बना लेते हैं और उन पर ही चलते हैं उसी दृष्टि से संसार देखते हैं । ये धारणाऐं  है हमें कुछ नहीं दिखाई देता ,हम उन्हें खोलने की कोशिश नहीं करते। हम अंधेरा है उसे स्थायी मान लेहमारे  मन की खिड़कियां होती हैं,लेकिन जब इन खिड़कियों पर धूल जम जाती है तब हम आहत होते हैं बाहर अंधेराते हैं,उसके पार देखने की कोशिश ही नहीं करते । मन की परतों को समय समय पर साफ करने से दृष्टि बाधा समाप्त होती है,दृष्टिकोण बदलता है,और हम दुनिया को  साफ नजरों से देखने लगते हैं,दुनिया जब नये रंगों में दिखाई देती है, क्योंकि रोशनी बाहर है रोशनी की ओर देखेगो तभी दुनिया दिखाई देगी ।

मैक्स मूलर ने वेदों उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों की दुर्भावनापूर्वक अंग्रेजी अनुवाद किया। मैक्समूलर ने 1836 में अपनी पत्नी को पत्र लिखा ,‘ मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे द्वारा किया गया अनुवाद भविष्य में भारत के भाग्य पर गहरा प्रभाव डालेगा । पिछले तीन हजार वर्षो में उससे जो भी उत्पन्न हुआ है उसे जड़ से उखाड़ फेंकने का यही एक मात्र उपाय है ।


Wednesday, 1 April 2026

moorkh divas

 मूर्ख दिवस


       जीवन के सब रंग देखने को मिलते हैं दुःख ,क्रोध, मान, अपमान पर इन सबसे ऊपर होता है एक रंग हास्य का व्यंग्य का कुछ अपने ऊपर हंस लेने का कुछ समाजिक विकृतियों पर कटाक्ष कर लोगों को जाग्रत करने का। यह सर्वजन्य माध्यम है जो दुनिया को जोड़ता है। यह जीवन की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यह हदय की भावनाओं की अभिव्यक्ति है। संसार में सभी जीवों के पास हर संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। वे रोते है, उदास होते हैं, चिड़चिड़ाते हैं, क्रोधित होते है। आपस में बात करते है। बस उन्हें हंसते नही देखा गया है यह अभिव्यक्ति एक ईष्वरीय उपहार है इससे प्रकृति खिलखिलाती नजर आती है। एक सकारात्मक ऊर्जा का उर्त्सजन होने लगता है जैसे अमावस की यवनिका हटाकर सूर्य झाँक दिया हो। दिलों को मिलाने जीतने की सहज अभिव्यक्ति है। हंसी हमारे रक्त संचालन को मजबूत करती है ष्ष्वसन तंत्र के लिये फेंफड़ो को मजबूत करती है। हमारे पाचन तंत्र को मजबूत करती हैं गहरी साँस आती जाती है। हंसी के माध्यम से हम रोगों की रोकथाम तो करते ही हैं यह एक तरह पूरे ष्षरीर की प्रणाली को  ठीक करता है तनाव के नकारात्मक प्रभाव को खत्म करता है। चित्त ष्षांत कर क्रोध को कम करता है। हास्य और व्यंग्य दो अलग अलग भावनाऐं हैं । किसी की गलत बातों पर तंज कसना व्यंग्य है लेकिन किसी की कमजोरियों पर कटाक्ष उसे आघात देना है और हास्य विषुद्ध उन्मुक्त उल्लास है । नोक झोंक हंसी मजाक दूसरों को बेवकूफ बनाना एक दिन होता है जिसमें इस प्रकार के हास परिहास क्षम्य होते हैं । अप्रैल फूल या मूर्ख दिवस इसी श्रेणी में आता है । यहॉं तक कि मूर्ख सम्मेलन आदि आयोजित किये जाते हैं और कोई बुरा नहीं मानता है । अप्रैल माह के आने के साथ ही पहली अप्रैल आने वाली है चेहरे पर मुस्कान आजाती है ।

अनेक देषों में लोगों को मूर्ख बनाने की यह प्रथा प्रचलित है। इसकी ष्षुरुआत का सही पता तो नहीं चलता पर कुछ संकेत अवष्य उपलब्ध हैं। पहले अप्रिल से साल का आरम्भ होता था । कुछ लोगों का कहना है कि एक अप्रैल नव वर्ष के आठ दिवसीय समारोह का आखिरी दिन होता था। यह समारोह पच्चीस मार्च को प्रारम्भ होता था। इस दिन लोग अपने मित्रों परिचितों के साथ मजाक करने के लिये उन्हें मूर्ख बनाने का खेल खेलते थे।

रोम में मान्यता है कि प्लूटो ने अन्न की देवी सीयर्स की बेटी प्रासपाइन का अपहरण कर लिया। प्रासपाइन ने मॉं को बार बार आवाज दी। लेकिन प्लूटो ने उसकी आवाज को दूसरी ओर से आती कर दिया जिससे सीयर्स प्रासपाइन को ढूंढ नहीं पाई वह उसकी आवाज पर इधर एधर दौड़ती रही। सीयर्स मूर्ख बन गई इसी सिलसिले में मूर्ख दिवस के रूप में मनाया जाता है । 

    ब्रिटेन के ष्षहर गोथम को टाउन ऑफ फूल्स कहा जाता है गोथम वासियों का मानना है कि 13 वीं ष्षताब्दी में मान्यता थी कि जिस सड़क से राजा की सवारी निकल जाये वह सार्वजनिक हो जाती थी। जैसे ही राजा का वहॉं से निकलने का फरमान आया वहॉं के निवासी मूर्खों जैसी हरकतें करने लगे जिससे वहॉं से सवारी नहीं निकली । राजा को बेवकूफ बनाने के उपलक्ष्य में उस दिन को मूर्ख दिवस के रूप में मनाते हैं और राजा उन निवासियांे को मूर्ख मानकर उस कस्बे को टॉउन आफ फूल्स कहता रहा वह दिन एक अप्रैल था। वैसे इंगलैंड में यह हमारी होली की तरह यह त्यौहार के रूप में मनाया जाता है । यह बच्चों का प्रिय त्यौहार है ं 

माना जाता है कि मूर्ख दिवस का प्रारम्भ फ्रांस में हुआ। मूर्ख बनाने वालों को ‘पाइजन द एवरिल’ कहा जाता था । उस दिन एक सभा का आयोजन किया जाता था और सभापति चुना जाता उसे ‘ विषप आफ फूल्स ’ की उपाधि दी जाती थी । सभा में पुरुष महिलाओं का वेष धारण करते थे और महिलाएॅं पुरुषों का । वर्तमान में फ्रांस में पहली अप्रैल को एक हंसी मजाक भरा खेल ख्ेला जाता है । इस दिन लोग एकत्र होकर किन्हीं दो व्यक्तियों को चुनते हैं जिसमें एक को राजा पीते और दूसरे को रानी पीते कहा जाता हैं । इस समारोह में जो भाग नहीं लेते उनका मुॅह काला कर सींग लगा दिये जाते हैं और उन्हें गधे कहकर बुलाया जाता है ।

कुछ लोग कहते हैं कि एक अप्रैल को नोहा ने पानी उतरने से पहले कबूतर को संदेष देकर भेजा था। जो भी इस घटना को भूल जाता था उसे उस कबूतर की तरह संदेष लेकर सफल अभियान पर भेजते थे। पर सबसे अधिक संभावना इस बात की है कि अप्रैल फूल का दिन मनाने की प्रथा फ्रांस से ष्षुरु हुई। चार्ल्स चौदहवें ने 1564 में पोप के आदेष पर आदेष निकाला कि नया वर्ष एक अप्रैल के बजाय एक जनवरी से ष्षुरु होना चाहिये, पर बहुत से लोगों ने इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया, जिन लोगों ने यह आदेष स्वीकार कर लिया था वे अपरिवर्तनवादियों को एक अप्रैल के दिन नकली उपहार नकली आयोजन के निमन्त्रण देकर उनका मजाक उड़ाने लगे। फ्रांस में प्रारम्भ में कागज की मछली बनाकर दूसरे की पीठ पर चिपका देते  इस मछली को फ्रेंच भाषा में ‘‘पॅाइजन डी  एव्रिल’ कहा जाता था । धीरे धीरे इसे नाम ही अप्रैल फूल दे दिया गया और इसने विष्व मूर्ख दिवस का रूप ले लिया और तरह तरह से लोगों का मजाक उड़ाया जाने लगा। एक अप्रैल को मुल्ला नसरूद्दीन दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। मुल्ला नसरुद्दीन का नाम हास्य के बेजोड़ बादषाह के रूप में लिया जाता है जो स्वयं पर हंसकर अपनी मूर्खताआंे से दूसरों को हंसाकर हास्य के माध्यम से बहुत गहरी बात कह देते थे । वे महान् सूफी संत और दार्षनिक थे। रोते हुए को कैसे हंसाया जाता है यह वे जानते थे। जीवन हंसते हंसते कैसे जिया जाये दुःख को भी हास्य का माध्यम बना देते थे ।

   मार्च 1844 में डबलिन में ताष के पत्तेंा पर छापा गया कि पहली अप्रैल को ड्रगंडा तक ट्रेन की यात्रा मुफ्त है । हजारो आदमी स्टेषन पहुॅंच गये  वहॉं जाकर ज्ञात हुआ कि रेलवे ने ऐसी कोई घोषणा नहीं की । स्कॉट लैंड में इसकी ष्षुरूआत गोक हंट के रूप में हुई । गोक छोटी सी चिड़िया है जिसका षिकार बहुत मुष्किल होता है । इसका ष्षिकार बेवकूफी वाला काम माना जाता है । वहॉं कहावत है ‘ कभी हंसो न मुस्कराओ, गोक के षिकार पर मील दर मील दौड़ते जाओ ’ यह दिवस स्कॉट लैंड में दो अप्रैल को मनाया जाता है । 

इटली में ये दिन समानता दिवस के रूप में मनाया जाता है । इस दिन मालिक नौकर बन जाता है और नौकर मालिक । मालिक सब काम करते हैं और नौकर मालिक के समान आज्ञा देते हैं । उस दिन खाना मालिक बनाते हैं और नौकर खाते हैं। नौकरों को पूर्ण स्वतंत्रता होती है कि नौकर मालिक सेे काम लें और न करने पर दंड दें । राज्य का कोई विधान  उस दिन लागू नहीं होता । 

1850 में बोस्टन के एक समाचार पत्र में छपा कि ष्षहर के बाहर एक पेड़ के नीचे दबा खजाना मिला है,उत्सुकतावष लोग वहॉं पहुॅंचे लेकिन वहॉं कुछ नहीं था। 

 1860 में टॉवर ऑफ लंदन के एक महत्त्वपूर्ण अधिकारी ने लंदन के महत्त्वपूर्ण प्रतिष्ठित व्यक्तियों केा टॉवर ऑफ लंदन में सफेद दरवाजे के पीछे सफेद ष्षेरों केा नहलाने का निमंत्रण भेजा। एक अप्रैल को जब नियत समय पर सब वहाँ पहुँचे तब वहाँ न सफेद दरवाजा था न सफेद ष्षेर, बड़े बड़े ष्षब्दों में अंकित था अप्रैल फूल।

एक बार नीदरलैंड के राष्ट्रीय रेडियो प्रसारण में यह घोषणा की गई कि मषहूर चित्रकार रैम्ब्रा की ख्याति प्राप्त कलाकृति ‘द नाइट वॉच’ भूल से एक ऐसे द्रव्य के संपर्क में आ गई है जिससे वह निरंतर धंुधली पड़ती जा रही है। हजारों कला प्रेमी अमर कलाकृति के दर्षनार्थ संग्रहालय पहुँचे लेकिन वहाँ पहुँचकर उन्हें ज्ञात हुआ कि यह खबर मात्र फर्स्ट अप्रैल का मजाक था। 

इसी प्रकार लंदन रिव्यू में पहली अप्रैल 1954 को परमाणु भट्टी के विषय में एक समाचार छपा तथा उसकी निर्माण विधि रेखाचित्रों सहित इतनी अधिक विष्वसनीय भाषा में छपी थी कि वैज्ञानिक इसे मात्र पहली अप्रैल की गप्प समझकर नहीं टाल सके और हंगरी के एटामिक एनर्जी इंस्टीट्यूट ने तो इस परमाणु भट्टी के संबंध में बड़े पैमाने पर पत्र व्यवहार भी किया।

आर्मस्टैंड के एक समाचार पत्र में एक सनसनी खेज खबर छपी कि स्थनीय चिड़ियाघर में एक बंदर को यांत्रिक उपकरणों की सहायता से बोलना सिखाया गया है ।जब दूसरे पत्र के संपादक ने यह खबर पढ़ी तब उसने अपने रिपोर्टरों को फटकारा कि उन्होंने यह खबर अपने अखबार के लिये क्यों नहीं जुटाई फिर उसने चिड़िया घर के निर्देषक से पूछताछ की । निर्देषक खुद परेषान था कि उसके चिड़िया घर में न ऐसा उपकरण था न बंदर । बाद में उन्हें ध्यान आया कि उन्हें  अप्रैल फूल बनाया गया है ।1990 में दक्षिण अमेरिका की एक विज्ञापन ऐजेंसी ने घोषणा की कि एक मोटर कंपनी ने फाइव व्हील कार लॉंच की है ।

इटली के एक अखबार ने पहली अप्रैल को समाचार प्रकाषित किया कि आज प्रसि़़द्ध अभिनेत्री एस्टर्डम के रेलवे स्टेषन पर ष्षूटिंग के लिये आयंेगी। हजारो की संख्या में फिल्म प्रेमी अपनी चहेती अदाकारा के दर्षन करने स्टेषन पहुँचे। वहाँ उन्हें पता चला कि वे अप्रैल फूल बना दिये गये ।

    1983 में ऐसोसिऐटेड प्रैस द्वारा समाचार प्रकाषित हुआ कि बोस्टन विष्वविद्यालय में इतिहास के प्रौफेसर जोसेफ बोस्किन द्वारा  अप्रैल फूल मनाये जाने के मूल कारण की खोज की गई है  वहॉं आये लोगों  को प्रौफेसर ने बताया एक बार बेंजेटाइन के ष्षासक से कोंस्टेटिन के जोकर ने जाकर कहा कि वह भी उसी सफलता से ष्षासन कर सकता है जिसप्रकार कॉंस्टेटिन कर सकता है कॉंस्टेटिन ने जोकर को एक दिन का ष्षासक बना दिया वह दिन था फर्स्ट अप्रैल । प्रौफेसर की सूचना केवल फर्स्ट अपै्रल बनाना मात्र थी । 

   सोवियत न्यूज पेपर ने मूर्ख दिवस संदेष के रूप में सूचना प्रकाषित कराई कि रषियन फैडरेषन ने डायमंड जड़े हथ गोले बनाने की योजना बनाई है। अपने दुष्मनों को पीट पीट कर खत्म करने की वजाय इन हथगोलों का प्रयोग करें ।

1957 में बीबीसी द्वारा एक सूचना प्रसारित हुई सचित्र ,जिसमें महिलाऐं लंबी लंबी स्पैगैटी पेड़ से तोड़ रही थी ,बाद में यह एक मजाक निकला ।

   1962 में स्वीडन में ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी का जमाना था एक ही चैनल होता था उस चैनल पर प्रसारित हुआ कि आप अपने टीवी को रंगीन कर सकते हैं  केवल अपने रंगीन मोजों को स्क्रीन पर लगा दो । जिसने सुना प्रयास किया बाद में ज्ञात हुआ मूर्ख बन गये ।  

    1994 को अमेरिकन रेडियो स्टेषन से एक संदेष प्रसारित हुआ कि पेप्सी के लोगो टेटू को कान पर बनाने वाले को दस प्रतिषत का डिसकाउंट दिया जायेगा, अब क्या था युवा और किषोर  टैटू बनाकर डिसकाउंट के लिये पहुॅंच गये वहॉं पहुॅंच कर उन्हें ज्ञात हुआ कि वे बेवकूफ बन गये । 

कुछ साल पहले वृहस्पतिवार एक अपै्रल को बम्बई से निकलने वाले मिड डे अखबार में एक समाचार छपा ‘नया वाइरस महामारी’ समाचार में खतरे की संभावना व्यक्त करते हुए लिखा था कि गिलगिमेष नामक वायरस विष्व के वैज्ञानिकों के लिये सिरदर्द बन गया है। एच.बी.जी.टू. नामक वायरस के कारण मानव के व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है। कम्प्यूटर के पर्दे पर तीव्र प्रकाश की किरणें परिलक्षित होती हैं लेकिन गति तीव्रता के कारण वे दिखाई नहीं देती लेकिन ऐसी किरणें निकलती हैं जो मस्तिष्क पर असर डालती हैं। दृष्टि और स्मृति का खोना इसका कोई इलाज नहीं है। यह वायरस सबसे पहले टसकोन एरिजोना में पाया गया। इस समाचार में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जैसे डॉ॰ अविनाष खुर्पेकर ;असंक्रमीकरण अनुसंधान संस्थान के डॉ॰ एन्ड्रयू क्वारी ;राष्ट्रीय प्रायोगिक संस्थान आदि के नाम भी उद्धृत थे। डॉ॰ खुर्पेकर के अनुसार दस मिनट लगातार कम्प्यूटर की ओर देखने से यह वायरस उन पर हमला कर सकता था।

बम्बई की सड़कों पर मिड डे के आते ही कुछ ही देर में उसके दफ्तर का फोन खड़खड़ाने लगा दफ्तर के आगे अधिक जानकारी पाने वालों की लाइन लग गई। कम्प्यूटर पर लगातार काम करने वालों के मुँह पर हवाई उड़ने लगी। स्वयं मिड डे के दफ्तर में कम्प्यूटर पर काम करने वालों का बुरा हाल था। बहुत मुष्किल से संपादकीय विभाग यह समझा पाया कि यह अप्रैल फूल का मजाक था। कुछ ने हंसकर मजाक का स्वागत किया तो कुछ परेषान मुंबादेवी के पास बम फट चुका था ऊपर से इस तरह का मजाक।

सिने ब्लिट्ज ने अप्रैल फूल का मजाक श्री देवी की जुड़वा बहन प्रभा देवी की खोज के रूप में किया जबकि प्रकाषित फोटो अनुपम खेर का स्त्री लिवास में था। अनुपम खेर हंस कर बोले मेरे जीवन का सबसे मजेदार रोल था 

दूसरे साल सिने ब्लिट्ज ने अमिताभ बच्चन और अर्चना पूरन सिंह के प्यार के नीड़ के विषय में लेख छापा। जया अमिताभ और उनके परिवार को पहले ही इस मजाक के विषय में सूचित कर दिया गया था। बिजली की तेजी से यह प्रेमकथा जबान दर जबान थी। यद्यपि उसी पत्रिका में ये अंकित था कि यह मात्र अप्रैल फूल का मजाक है।

1981 में करंजिया ने अपने डेली पेपर में पहली अप्रैल को निकाला था कि इंडियन एक्प्रेस को मुख्यमंत्री ए॰आर॰ अंतुले ने खरीद लिया है उन दिनों अरुण ष्षौरी अंतुले पर सीमेंट धांधली के आरोप लगा रहे थे। इस समाचार के लिये इंडियन एक्प्रेस ने करंजिया पर मुकदमा भी ठोक दिया। करंजिया ने ही एक साल यह समाचार दिया कि नीलम संजीव रेड्डी के नेतृत्व में दक्षिण भारत एक नया देष बनाने जा रहा है। इन सब समाचारों के लिये बहुत ऊधम भी हुआ कि ऐसे समाचार मजाक में भी नहीं देने चाहिये। फिर भी समय समय पर निकलते रहते हैं।

उन दिनों सौरभ गांगुली  भारतीय टीम के कप्तान थे हरभजनसिंह ,द्रविड़ और युवराज गुस्से से विफरते हुए गांगुली के पास पहुॅंचे  और गांगुली के सामने एक अखबार फेंक दिया इस अखबार के पहले पन्ने पर गांगुली का साक्षात्कार छपा हुआ था।  साक्षात्कार में लिखा था कि हरभजन चकर है और गेंद से  छेड़छाड़ करना उसकी पुरानी आदत है । उसे टीम से बाहर कर देना चाहिये। युवराज का तो लाइफ स्टाइल ही ऐसा है कि वह खेल पर ध्यान दे ही नहीं सकता । जहीर का समय तो खत्म हो चुका है ।  द्रविड़ के बारे में भारतीय कप्तान ने कहा कि मेरी कप्तानी में द्रविड़ ने कभी भी अपना सौ प्रतिषत नहीं दिया  उसका ध्यान मेरे फैसलों के विरोध में रहता है इतना ही नहीं  राइट के बारे में सौरभ के हवाले  से ही इस साक्षात्कार में छपा था कि राइट अब बूढ़े हो चुके हैं ,वे अब कोच की जिम्मेदारी संभालने  लायक नहीं हैं बीसीसीआई उन्हें निकालने का विचार कर रही है । इस साक्षत्कार को दखकर सौरभ हक्के बक्के रह गये  और साथियों को सफाई देने लगे  कि मैं बेकसूर हॅूं लेकिन कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं था । चारो ओर से जवाब तलब किया जा रहा था । गागुंली पसीने पसीने हो चुके थे इतने में हरभजन लिखित में देने लगे कि अब गांगुली की कप्तानी में नहीं खेलेंगे । परेषान गांगुली ने उसे पढ़ने के लिये खोला तो  उस पर लिखा था अप्रैल फूल । 

 कुछ वर्ष  पूर्व 31 मार्च को आगरा के  एक स्थानीय अखबार में प्रकाषित हुआ कि 1 अप्रैल को वी एलसी सी की वंदना लूथरा 4 बजे से होटल होली डे इन में त्वचा संबंधी विषयों पर बतलायेंगी। एक तारीख को 4 बजे से महिलायें एकत्रित होने लगीं ,कहीं भी किसी प्रकार का आयोजन न देखकर नोटिस बोर्ड की ओर देखा तो हंसकर मजा लेने लगीं । नोटिस बोर्ड पर लिखा था ‘ अप्रैल फूल’।

  सन् 2010 जार्डन के जाफर कस्बे के एक स्थानीय अखबार ने एलियन के घरती पर आने की खबर छाप कर लोगों को अप्रैल फूल बनाया तो वहॉं के मेयर को गुस्सा आ गया । अलधाद नाम के अखबार ने एक अप्रैल को पहले पन्ने पर एलियन के बारे में बड़ी सी खबर छाप दी। इसमें लिखा था कि बीती रात को दस ऐलियन जाफर कस्बे में आये उन्होंने कस्बे में आग लगा दी और लोगों को डराया। इस खबर को पढ़कर मेयर मुहम्मद म्लेहिहान चिंतित हो गये और आनन फानन में उन्होंने सुऱक्षा बलों को एलियन को पकड़ने का आदेष दे दिया । लेकिन फिर उन्हें सच्चाई पता चली तब उनके गुस्से का ठिकाना नहीं रहा । उन्होंने कहा ‘खबर का असर इतना बुरा था कि अभिभावकों ने डर के मारे अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजा । कस्बे में रहने वाले 13 हजार भयाक्रांत लोगों ने अपने घर खाली कर दिये । जार्डन के सुरक्षा अघिकारी ने बताया कि खबर छपने के बाद कस्बे में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी, इमर्जेंसी लगाने  की तैयारी पूरी हो चुकी थी । मेयर ने गुस्से में अखबार के खिलाफ मुकदमा करने की ठानी लेकिन अखबार ने माफी मांगते कहा हमारी मकसद लोगों को हंसाना था न कि डराना ।

   वर्ष 2000 में पेटा द्वारा घेाषणा की गई कि टैक्सास झील में बेहोषी की दवा डाली जायेगी इसकी वजह से मछलियॉं काफी देर तक सोती रहेंगी फिषिंग टूर्नामेंट का समय था इससे आम जनता का गुस्सा भड़क उठा और सरकारी तंत्र के विरोघ में लोग सड़कों पर उतर आये बाद में मालुम चला कि यह पेटा का मूर्ख बनाने का तरीका था । 

एक बार समुद्र की लहरों से बिजली सप्लाई कराये जाने की घोषणा की गई तो एक बार मास्क पहनना आवष्यक है यह निर्देष दिया गया। एक बार ब्रिटेन और फ्रांस के बीच बनने वाले भूमिगत मार्ग का टेन्डर बम्बई के फोन विभाग को दिया गया बताया क्योंकि वह जमीन खोदने में एक्सपर्ट है।

इस प्रथा के मूल में जीवन की व्यस्तताओं, तनाव आदि के बीच कुछ पल हंसी के हैं। और कुछ नहीं। स्वस्थ मजाक स्वास्थ को अमरत्व प्रदान करता है। 


डॉ॰ ष्षषि गोयल चिदम्बरा ा3/28 ए/2, जवाहर नगर रोड, खंदारी चौराहा, आगरा-282002मउंपस रूेींेीपहवलंस3/हउंपसण्बवउ



Saturday, 21 February 2026

Manav

 मानव 


मानव की उत्पत्ति कैसे हुई यह दुनिया की हर संसृति के मन में सवाल उठता रहता है ? प्राचीन ग्रीक कथाओं में मनुष्य या तो देवता जब शापित हुए तो मानव बने या मिट्टी और पानी से मनुष्य का निर्माण किया। बाईबिल में देा भिन्न कथाऐं मिलती हैं। एक कथा में जब ब्रह्मांड का निर्माण हुआ तब उसकी मिट्टी से मानव का जन्म हुआ। दूसरी कथा में अदम को देवताओं ने मिट्टी से बनाया फिर उसमें जीवन डाला। उसके बाद जानवरों का निर्माण किया। यही धारणा सुमेरियन सभ्यता में मनुष्य के निर्माण की पाई जाती है। 

बेबीलोन की सभ्यता में मनुष्य का निर्माण किंगू (ापदहनष्े ) के रक्त से हुआ है। प्रारम्भिक सुमेररियन पौराणिक कथा में निम्नह ने मिट्टी से मानव बनाया। ऐंकी ने भी मानव बनाने का प्रयास किया ,लेकिन उसका मानव संपूर्णता के साथ नहीं बना। वह निम्नह के प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता था। वह खड़ा नहीं हो सकता था। झुक नहीं सकता था, वह रोटी तक नहीं पहुँच सकता था। इसी प्रकार ग्वाईमाला की पौराणिक कथाओं का मानव भी मिट्टी से बना था ओर खड़ा नहीं हो सकता था ,उसके पास अक्ल भी नहीं थी। उसे नष्ट कर दिया । दूसरी जाति मानव की लकड़ी से बनाई। यह प्रजाति ईश्वर में जरा भी विश्वास नहीं करती थी और उसका अनादर करती, बस अपने को ही मानती थी। दुनिया ने उनके प्रति विद्रोह कर दिया और वे अपने ही घरेलू जानवरों द्वारा नष्ट कर दिये गये। 

मनुष्य की तीसरी संरचना सफल हुई ,जिन चार व्यक्ति ने उनकी संरचना की वे मानव जाति के पूर्वज कहलाये। पत्थर, लकड़ी ,मिट्टी, दुनिया में अधिकांश स्थानों पर मानव के निर्माण में उपयोग में लाई गई। मनुष्य के शरीर में पाये जाने वाले रक्त, जीव, कीटाणु आदि सब बालू, पसीना, राख आदि समझा जाता है ,सब इन्ही से मनुष्य का निर्माण हुआ है। 

कहीं कहीं मानव का निर्माण किसी के बनाने से नहीं वरन् कहीं से प्रगट होने से हुआ। दक्षिणी अमरीका के रैडइंडियन मानते हैं कि मनुष्य कारू के कान से पैदा हुआ। दूसरी कथा है कि वह जमीन से निकला। दक्षिणी अमरीका में चाको मानव कुत्ते द्वारा जमीन खोदने पर निकला। कुत्ते  को जमीन में एक छेद में से गंध आई। वे मानव एक विशाल पेड़ की जड़ के अंदर थे जो कि बिखर गया, वे जड़ से बाहर मिट्टी में थे ,कुत्तों ने खोदा तो वो बाहर निकल आये। 

प्रथम मानव एक चिड़िया ने पहाड़ी पर बड़े से गड्डे में बने घोंसले में पाला। इंडोनेशिया में प्रचलित है कि पहला मानव अंडे से निकला। पूर्वी इंडोनेशिया का मानव कीड़े और लार्वा से जमीन से निकला। फिलीपींस में प्रचलित है कि पहले आदमी और औरत बांस के पेड़ के अंदर बने, जिसे समुद्र के किनारे एक चिड़िया ने चांेच से फाड़ा। फोरमोसा के अनुसार मानव का जन्म पहाड़ के दो भागों में फटने से उसके अंदर से हुआ। इंडोचाइना के  अनुसार मानव का जन्म टेडपोल के रूप में हुआ, फिर वह बढ़ता हुआ मानव हुआ। हर जाति का अपना विश्वास है , मान्यता है ,जितने मानव है उतनी ही उत्पत्ति कथायें हैं। 

मानव का दोहरा स्वभाव है ,कभी वह अच्छा होता है कभी बुरा, ग्रीक के अनुसार मनुष्य का स्वभाव पषुवत् है, लेकिन जब कभी वह अच्छा हो जाता है तब उसमें प्रभाव उस राख का है जिससे वह उत्पन्न हुआ है। टिटान की राख जो डाइनोसस जगरस को खाने के बाद बनी वही कुछ देवत्व उसके अंदर आ जाता है। 

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रोमानिया में प्रचलित है दानवों को मानव बनाने का विचार आया । उसने मानव के शरीर को सजाया, उसके शरीर को सजाने में उन्हें देवताओं की सहायता लेनी पड़ी। इसीलिये मानव में कभी दानव कभी देवत्व का भाव रहता है। 

हर देश के अपने धर्म ग्रन्थ होते हैं जिनमें पौराणिक कथाऐं समानान्तर चलती हैं लेकिन साथ ही जनश्रुतियाँ भी चलती हैं। हर जाति की हर कबीले की अपनी मान्यता हेाती थी, उनकी अपनी कथाएँ चलती थीं। स्लोवान की कहानी में मनुष्य का निर्माण देवता ने बालू के कण से किया। सबसे पहले उसने नाखून बनाये, जब वह काम कर रहे थे तब कुछ पसीना बालू पर गिरा, उससे मनुष्य बनाया। सही कारण है कि मनुष्य को रोटी पसीना बहाकर ही मिलती है। औरत का निर्माण इन्ही कथाओं के अनुसार पुरुष की नस से हुआ। बहुत जगह कहते हैं कुत्ते की पूॅछ से या दानव की पूंछ से हुआ। बोर्नियो में प्रचलित है कि औरत का निर्माण तलवार की मूठ से या हत्थे से हुआ। 

उत्तरी अमेरिका के इंडियन्स का पृथ्वी के निर्माण पर अधिक जोर है, मानव के निर्माण पर कम। पृथ्वी के निर्माण के साथ मनुष्य का निर्माण हो गया और उसकी आवश्यकता अनुसार वनस्पति आदि बनती गई। बहुत सी जातियाँ ऐसी भी हैं, जिनकी इस प्रकार की न कोई जनश्रुति है न कोई पौराणिक संदर्भ। एस्किमो में मानव की उत्पत्ति के विषय में किसी प्रकार की कथा प्रचलित नहीं है। पृथ्वी की उत्पत्ति की और मानव की उत्पत्ति की जनश्रुति सबसे पहले अमेरिकन  इंडियन्स के मध्य पाई गई। अधिकांष जातियों में मानव और पशु सभी की उत्पत्ति जमीन के अंदर से हुई है। दक्षिणी कैलीफोर्निया में मानव की उत्पत्ति विधाता (धरती को बनाने वाला ) के शरीर की खाल, लकड़ी रगड़कर उससे हुई और नोवाहो के कान से हुई। स्वाही के अनुसार मिट्टी राख और मोतियों से मानव को धरती बनाने वाले ने बनाया। अमरीका की रैड इंडियन जाति का निर्माण लाल मिट्टी से हुआ। सफेद मनुष्य का जन्म समुद्र के झाग से हुआ या सफेद मिट्टी से, नीग्रो का निर्माण काली मिट्टी से हुआ। मानव के बनाने में कभी कभी उससे भूल हो गई, और गलती सुधारी। पहले मानव के हाथ लचीले नहीं  थे तब छिपकलियों ने मानव को कहा कि वह उसके जैसे हाथ लेले। तब से मानव के हाथ लचीले हो गये। 

उत्तरी अमेरिका में कथा प्रचलित है कि पहले विधाता ने पुरुष की पौरुष ग्रन्थि उसके माथे पर बनाई फिर अन्य भागों में बनाया पर कहीं मन के अनुसार नहीं हुआ तो अंत में वर्तमान स्थान पर स्थित किया। 

जूनी की कथाओं अनुसार जब मानव पाताल से बाहर आया तब वह कुछ खा नहीं सकता था। उसके साथ उसका बड़ा भाई और छोटा भाई भी था। उन्होने उसके सिर को दो हिस्से में काटा दिया। जिस चाकू से काटा ,लाल पत्थर पर तेज किया था ,इसलिये होेठ लाल हो गये। बड़े भाई ने दो छेद बना दिये जिससे हवा अंदर जा सके। हाथ जालीदार थे उंगलियां काट कर अलग कर दीं। मानव के पंूछ और सींग तब भी थे। दोनों भाई हर घर में गये और पूंछ और संींग काट दिये जिससे मनुष्य बहुत खुश हुआ कि मुसीबत से छुटकारा मिला। 

मानव उत्पत्ति की बहुप्रचलित  कथा दक्षिणी अमेरिका के इंडियन्स मंे मिलती हैं। मानव का निर्माण मिट्टी से हुआ, वे अन्य स्थान से आये। कथाओं के अनुसार वे पाताल से आये। चाको मानव के निर्माण की जो कथा कहते हैं वह माया सभ्यता से मिलती हुई है। प्रकृति पुरुष ने मानव का निर्माण पहले पत्थर से किया, तब लकड़ी से अंत में मिट्टी से । वीराकोचा सभ्यता के अनुसार इंका देवता ने पहले सफलता पूर्वक दो जातियाँ बनाईं। पहले उस बनाये

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मानव को उसने पत्थर मंे बदला उसके बाद उसने एक दूसरी प्रजाति बनाई जो वर्तमान में पृथ्वी पर मिलती है। ताउलीपैंग इंडियन्स के अनुसार पहले मानव मोम से बनाया लेकिन वे सूरज की गर्मी से पिघल जाते थे, तब उसने उन्हें मिट्टी से बनाया। 

मुंडू यारूयारू विटोटा जातियों के अनुसार मानव आकाश मार्ग से आया। आकर प्रथम पुरुष गुफाओं में रहा। कास्नोवा के अनुसार मानव का जन्म विशाल दानव के अंदरूनी अंगों से हुआ जो बाद में डूब गये थे या वे बीज से उत्पन्न हुए। 

पहला मानव अंडे से हुआ, यह दक्षिणी अमरीका की धारणा है। उनकी पौराणिक कथाआंे में मानव अपने समाज में स्थान के अनुसार तीन अंडांे से उत्पन्न हुआ। तॉबा चांदी और सोने के अंडे से उसी प्रकार का वैभव उसे मिला। ये अंडे सूर्य देवता ने पृथ्वी पर भेजे। ये विशाल चिड़ियाओं द्वारा लाये गये और उन्होंने उसे सेया। 

भारतीय वेद , पुराणों के अनुसार मानव की उत्पत्ति ब्रह्मा जी द्वारा पंचतत्वों ( अग्नि ,जल, वायु,पृथ्वी और आकाश ) से की गई। ब्रह्म से आत्मा ,आत्मा से जगत की उत्पत्ति हुई । पृथ्वी सूर्य से निकला एक अग्नि पिंड है जो कालांतर में ठंडा हुआ और उस पर वर्फ और जल का निर्माण हुआ,जैसे जैसे धरती ठंडी होती गई चारों ओर जल ही जल हो गया और प्रथम जीव की उत्पत्ति जल में हुई। ब्रह्मा ने पंचतत्वों से निर्मित आत्मा का रूप धारण किया और वे ब्रह्मा नाम से जाने गये । ब्रह्मा ने अपने को दो भागों में विभक्त किया ,स्वयंभू मनु और शतरूपा। इस प्रकार भारत खंड  में मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई ।

कुछ दिन पूर्व न्यूयार्क टाइम्स में समाचार  प्रकाषित हुआ कि इस्त्राइल की एक खंडहर गुफा में मानव जबड़े का जीवाष्म मिला है। इसका अध्ययन करने पर वैज्ञानिकों ने मनुष्य की उत्पत्ति 1 ़77 लाख वर्ष से 1़94 लाख साल पहले होने का अनुमान जताया है। साइंस पत्रिका के अनुसार पहला इंसान अफ्रीका से करीब 2.20 लाख साल पहले बाहर गया होगा । इस़्त्राइल की इस गुफा से वैज्ञानिकों को जबड़े की हड्डी के अलावा कुछ सख्त पत्थरों वाले औजार भी मिले हैं,जिनसे पता चलता है कि आधुनिक मानव अफ्रीकी महाद्वीप को काफी पहले छोड़ चुका था। इसका मतलब यह हुआ कि अफ्रीका में आस्तित्व करीब तीन से पांच लाख साल पहले प्रकाष में आया । 




Saturday, 14 February 2026

Adbhut hai sansar

 अदभुत् है संसार

जंजैहली से दो कि मी पीछे  मंडी जिले की ओर एक स्थन है पांडव शिला। एक चौड़ी चट्टान पर टिकी इस शिला की ऊँचाई लगभग 10 फीट तथा परिधि 42 फीट हे। इस शिला से संबंधित रोचक बात यह है आप इस भारी भरकम शिला को अपने हाथ की कन्नी उंगली से  हिला सकते हैं। इस चट्टान को बुलडोजर से गिराने का प्रयत्न किया गया क्योंकि डर था कि जो चट्टान उंगली से हिल जाती है कहीं गिर न जाये। गिरना तो दूर यह चट्टान अपने स्थान से खिसकी भी नहीं ।

ब्राजील में भूतल के नीचे अज्ञात लोक नगर - पुरातत्व अन्वेषण के इतिहास में पहली बार धरती पर अज्ञातलोक की सभ्यता होने का अकाट्य प्रमाण उस समय मिला जब ब्राजील में साओपोलो के निकट पहाडत्रों में प्राचीन कला शिल्पों की खोज करने वाले एक पुरातत्व दल ने पृथ्वी तल के नीचेएक ऐसे नगर की खोज की जहाँ आज से 6 हजार वर्ष पूर्व आात लोक के प्राणी रहते थे । 

जिस पुरात्त्व दल ने यह आश्चर्यजनक खोज की है उसमें बीस छात्र थे । इस दल के नेता डा॰जार्ज तिजोर थे । इन्होंने अपनी खोज का रोमांचक विवरण देते हुए बताया कि उनके दल का एक छात्र अनजाने में उस भूमि पर पहुंच गया जिसके नीचे अज्ञात लोक का नगर बसा था। 

अचानक वह ठोकर खाकर लड़खड़ाया तो देखा कि बीस फुट गहरी खड़ी ढ़ाल है । दल के सदस्यों के मन में यह जिज्ञासा हुई कि ढाल के नीचे क्या ह।  वे सब छात्र नीचे उतरे तो देखा ढाल सीलन भरी अंधेरी गुफाओं की ओर जाती है। नीचे गुफाओं में उन्हें एक विशाल कक्ष मिला जिसमें बर्तन जवाहरात और चतुष्पदी जानवरों के कंकाल थे। जिन जीवों के ये कंकाल थे वे न मनुष्य थे न पशु उनके प्रत्येक के हाथ में दो उंगलियां थीं उनके प्रत्येक के पैर में तीन अंगूठे थे उनके एक लम्बा कान था जो सर में लम्बबत् आगे निकला हुआ था । उनकी खोपड़ियां बड़ी थीं । उनकी आंखें मनुष्य की आंखों से अधिक सटी थीं । अन्वेषकों को गुफा में ट्रांजिस्टर जैसे उपकरण तथा संचारयंत्र भी मिले । उन सबने जिस अज्ञात लोक की सभ्यता का पता लगाया उसके संबंध में अनुमान है  िकवह विकसित थी और दक्षिणी अमेरिका में फली फूली थी । ये जाति 6000 वर्ष पूर्व रहती थी । इनके शरीर मानव के शरीर से बिलकुल भिन्न थे। यहां बसने वाले लोग बुद्धि और ज्ञान में मानव से कई प्रकाश वर्ष आगे थे । उनके अत्याधुनिक उपकरणों से यह विश्वास होता है  िकवे पृथ्वी पर केवल आया जाया करते 


Friday, 13 February 2026

Dimag ka kuda

 मेरी कामवाली अभी पन्द्रह दिन की तीर्थ यात्रा से होकर आई है पूरी बस उन्ही की बिरादरी की थी। स्वाभाविक है मैं बाल्मीकि बिरादरी की बात कर रही हूँ और सब मंदिरो में जाकर पूजा अर्चना की प्रसाद चढ़ाया गंगा नहाये पर कहीं न उन्हें रोका गया न टोका गया। वो सभी त्यौहार हम सवर्णाे से अधिक विधि विद्यान से करते हैं देवी पूजा करते हैं तब उनकी देवी अस्पर्स्य हुई और सवर्णो को शुद्ध यह समझ से परे बात है। 

जरा सा दिमाग खुला रखें तो जाति विरादरी सब खत्म हो जायेगी अब यदि घरों में शौचालय इस प्रकार के बन गये हैं कि इनकी सफाई घर के सदस्यों को ही करनी पड़ती है तब घर के सब लोग एक दूसरे को न छुए सब पर एक नजर डाली जाये तो समाज में छोटे छोटे विग्रह बड़े बड़े नासूर बने हैं वह केवल सोच को छोटी करके देखने के कारण। 

अब मैला ढोने की प्रथा यदि सिमट कर कुछ स्थानों पर रह गई होगी तो इतना नहीं पता क्योंकि गाँवों में शौचालय जहाँ नहीं हैं वहाँ सारे खेत ही शौचालय होते हैं वहाँ मल उठाने का सवाल ही नहीं है कुछ घर अवश्य होंगे पर शहर अब बहुत दूर हो चुके हैं इस परिस्थिति से जितने भी वाल्मीकियों से रूबरू होती है सभी यह कहते हैं कि अब हमारी पीढ़ियों में यह काम नहीं होता है। सड़क झाड़ते हैं वहाँ कूड़ा उठाते हैं। सब कुछ उठा कर भरते हैं तो घरों में माँ अपने बच्चे का मल उठाती है। सब अपना मल हाथों से साफ करते हैं। घरों का कूड़ा उठाते हैं सड़को पर घरों का ही कूड़ा उठाते हैं जब कूड़ा घर से झाड़ने वाले नहाकर शुद्ध हो सकते है तो उठाने वाले क्यों नही ? 


Saturday, 17 January 2026

ek hi bhool kahani

 एक छोटी सी भूल,


                 प्रस्तुति. डा0 शषि गोयल


   रात के अंधेरे में एक्सप्रैस ट्रेन सरबरी नदी के लंबे पुल पर धड़धड़ाती चली जा रही थी। स्टीम इंजन से सीटी की तीखी आवाज और पहियों की घड़घड़ाहट के बीच एक आवाज और हुई वह थी नदी में छपाक की आवाज। प्रथम श्रेणी का दरवाजा खुला और उसमें से किसी वस्तु को बाहर धकेल दिया गया और उसी की आवाज पानी में हुई थी, लेकिन ट्रेन चलती रही और किसी ने भी ध्यान नहीं दिया  कि उसकी एक सवारी कम हो गई है । 

   घड़ी की सुई और ट्रेन दोनों चलती रहीं। समय का पहिया चलता रहा। सेकंड मिनट घंटे बीतते गये और सुबह ने बाहर झांका तो नहीं था हॉं तैयारी में थी। धीरे धीरे ट्रेन ने भी अपनी गति कम की और प्रषांतपुर से कुछ पहले जंगली इलाके में गाड़ी रुक गई आमतौर पर प्रषांतपुर स्टेषन पर एक्सप्रैस ट्रेन रुकती नहीं थी । संभवतः किसी ने जंजीर खींची थी ।

    सीनियर गार्ड अपनी लालटेन लेकर अपने डिब्बे से यह देखने के लिये उतरा कि किसने जंजीर खींची । वह ट्रेन के साथ साथ आगे बढ़ रहा था,दो टिकिट चैकर भी अब उसके साथ आ गये थे । शीघ्र ही तीनों ने वह स्थान ढॅूढ लिया था । वह था फर्स्ट क्लास का कंपार्टमेंट, वहीं से जंजीर खींची गई थी । अंदर गहन अंधेरा था । गार्ड ने अंदर की बिजली खोली,‘ यह क्या? डिब्बा खाली था ’। वहॉं की दषा देख तीनों व्यक्ति भय से जड़ हो गये। चारों ओर खून ही खून था गद्देदार सीट पर, कंपार्टमेंट की लकड़ी की दीवार पर ,फर्ष पर। पंखा फुल स्पीड पर चल रहा था। एक सूटकेस रस्सी के सहारे ट्रेन की जंजीर से लटका हुआ था। वे भयानक मंजर की स्थिति से उबरे  तब भयभीत गार्ड ने पुलिस के लिये फोन किया। गाड़ी को रोक लिया गया और पुलिस ने कई यात्रयों से पूछताछ की लेकिन कोई भी व्यक्ति हादसे पर प्रकाष नहीं डाल पाया। रक्तसना फर्स्टक्लास का डिब्बा ट्रेन से अलग किया गया बाकी की टेªन आगे बढ़ी ।अब पुलिस के सामने सवाल था वह कंपार्टमेंट किसने बुक कराया था। उन दिनों फर्स्टक्लास कंपार्टमेंट में कोई भी परिचालक नहीं चलता था।

 पता चला यह डिब्बा मिस्टर एन्ड मिसेज सोम गोस्वामी के नाम पटना से  रिजर्व कराया गया था ।  जंजीर से लटके सूटकेस में दो लम्बे फल वाले  चाकू एक भारी हथैड़ा और एक खूबसूरत बैग निकला । लग रहा था खून करने के लिये इन्हीं औजारों का प्रयोग किया गया है लेकिन न तो उन पर खून लगा था न किसी प्रकार के उंगलियों के निषान ।  डिब्बे में भी किसी प्रकार की उंगलियों के निषान नहीं मिले और पुलिस को यही परेषान कर रहा था। संभवतः हत्यारे  ने ग्लब्स पहन कर खून किया अर्थात सोच समझ कर पहले से बनाई गई योजना के तहत खून किया गया था ।

  पुलिस ने तहकीकात में अनुमान लगाया कि हत्यारे ने इतमीनान से क्रूरतम तरीके से हत्या की ।संभवतः महिला की हत्या कर उसेनदी में फेंक कर चेन पर सूटकेस लटका कर ट्रेन रोकी और स्वयं प्रषांतपुर के आस पास ही कहीं उतर गया। पंखा फुल स्पीड पर चला दिया जिससे कि रक्त जल्दी सूख जाये । लेकिन फिर भी एक बात उन्हें परेषान कर रही थी कि यदि महिला पर आघात किया गया होगा तो वह चीखी अवष्य होगी तो किसी न किसीने तो उसकी चीख सुनी होगी लेकिन किसी भी यात्री ने नहीं कहा 

कि उसने चीख सुनी है। प्रषांतपुर की पुलिस केवल हाथ मल कर रह गई उनके पास किसी प्रकार का कोई सबूत नहीं था यहॉं तक कि लाष भी नहीं  वे कह सकते कि खून हुआ है ।

  कुछ दिन बाद ही सरबती नदी में उफान आया और सरबती नदी के किनारे के गॉंव के पास अधगली अधसड़ी लाष आकर लगी यह गॉंव रेल के पुल से अधिक दूर नहीं था। एक धोबी कपड़े धो रहा था उसने देखा एक नंगी लाष उधर ही बहती आ रही है। लाष पानी में पड़ी रहने के कारण फूल गई थी । धोबी डर से अधमरा हो गया और भागा भागा समीप के थाने पर पहुॅंचा । पुलिस ने लाष अपने कब्जे में की और पोस्टमार्टम के लिये भेज दी । फोरेंसिक विभाग के एक्सपर्ट ने  बताया कि लाष किसी स्वस्थ नवयुवती की है जिसका चेहरा और सिर किसी भारी चीज से कुचल दिया गया है। पुलिस द्वारा निष्कर्ष निकाला कि यह 

लाष फर्स्टक्लास में यात्रा कर रहे यात्री की ही है ।मृत शरीर मिल गया था। अब प्रषांतपुर पुलिस ने सारा ध्यान सूटकेस में मिली वस्तुओं पर लगाया। गहन छानबीन से उन्हें एक सुराग हाथ लगा। बैग के अंदर पेंसिल से दो ष्शब्द लिखे मिले  । संभवतः दुकानदारका 

अपना मार्का था।

अब पुलिस ने अपना ध्यान पटना में केन्द्रित किया जहॉं से टिकिट बुक की गई थी। पटना पुलिस की सहायता से पुलिस दुकानदारोंको चिन्हित शब्द दिखा रही थी संभवतः पहचान जायें । एक एक  दुकानदार से पूछना बड़ा ही थका देने वाला काम था । कई महिने बाद अंत 

में मेहनत रंग लाई ।

एक छोटे से दुकानदार ने जो फैंसी टॉयलेट का सामान बेचता था पहचान लिया। वह बैग उसी की दुकान से खरीदा गया था। साधूराम नामक दुकानदार की याददाष्त अच्छी थी। उसे खरीददार तक की याद थी । वह बोला,‘ मेरी दुकान पर आने वाले आमतौर पर ऐसा बैग

 नहीं खरीदते इसलिये मुझे याद है । वह एक औरत के साथ था । वह उस औरत से इषारों में बात कर रहा था । संभवतः वह औरत 

गूंगी बहरी थी एक भी ष्शब्द नहीं बोली थी ं’।

  पुलिस के अफसर को याद आ गया कि किसी ने भी उस औरत की चीख नहीं सुनी थी । संभवतः वह गूॅंगी बहरी ही थी लेकिन प्रष्न यह उठ खड़ा हुआ कि वह कौन थी और उसके साथ वाला व्यक्ति कौन था ।

     यद्यपि केस के कुछ मुद्दे हाथ आ गये थे लेकिन फिर भी अभी भी आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिल रहा था। तभी पटना के एक हिस्से में आग लगी और पुलिस का ध्यान उधर गया। आग लगने में षडयन्त्र नजर आ रहा था इसलिये वहॉं रहने वालों के घरों की 

गहन जॉच पड़ताल से एक नाम पुलिस की निगाह में आया वह था - बाबू सोम गोस्वामी ।

    पुलिस अफसर तुरंत उस व्यक्ति से मिलने के लिये चल पड़ा। गोस्वामी जहॉं काम करता था उसके मालिक का नाम  बलराम 

सिन्हा था। सिन्हा की पत्नी गूॅंगी बहरी थी। पूछताछ करने पर गोस्वामी ने बताया कि सिन्हा की पत्नी है नहीं इन दिनों इलाज के लिये इलाहाबाद गई है ।

  अब पुलिस का सारा ध्यान बलराम सिन्हा पर केन्द्रित हो गया। उसने  गोस्वामी से बलराम सिन्हा का पता लिया और मिलने चलदिया। दरवाजा एक खूबसूरत औरत ने खोला। नाम था ‘प्रीति मान सिंह ’ । पूछताछ पर ज्ञात हुआ प्रीति सिन्हा की नौकरानी थी । उसकी पत्नी

 के जाने के बाद से घर की देखभाल के लिये  वहीं रहने लगी थी ।

      बलराम सिन्हा को थाने लाया गया और पूछताछ की गई। पहले तो वह हर बात से इंकार करता रहा । बैग और दुकानदार के पहचाने जाने के बाद वह चुप हो गया। काम पर उन्हीं दिनों अनुपस्थित रहना जिन दिनों महिला का खून हुआ संदेह बढ़ा रहा था। अंत में उसने हथियारडाल दिये और स्वीकार कर लिया कि खून उसी ने किया है ।

‘ विमला मेरी दूर की रिष्तेदार थी उसके मॉं बाप बहुत अमीर थे उन्होंने ष्शादी में बहुत दहेज दिया। मेरे अनेकों महिलाओं से ताल्लुकात थे - विमला यह जानती थी फिर एक दिन मेरी प्रीति से मुलाकात हुई - वह मेरे ऑफिस में स्टेैनो थीकृ उससे मेरे नाजायज 

संम्बन्ध बन गये  उसे मैंने एक अन्य घर में रख लिया- प्रीति के रिष्तेदारों को यह पता लगा तो उन्होंने धमकाना प्रारम्भ कर दियावे चाहते थे कि मैं प्रीति से शादी कर लॅूं - मैंने वादा किया कि मैं प्रीति से शादी करुॅंगा ।

विमला से मुझे लगाव कभी नहीं हुआ था मैंने तो केवल उसके रुपयों की वजह से  उससे शादी की थी और उसका रुपया मेरे पासथा इसलिये  मैंने उससे छुटकारा पाना चाहा और एक ही तरीका था - उसकी हत्या ।

मैंने एक इंगलिष पिक्चर देखी थी जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की हत्या ट्रेन में की थी , मैंने उसी तरीके को अपनाने का फैसला किया। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि हम लोग घूमने चल रहे हैं । वह ट्रेन के सफर से उत्साहित थी । मैंने दो टिकिट अपने क्लर्क गोस्वामी के नाम से बुक किये । वह मेरे बहुत नजदीकी है । इसलिये मुझे उसके नाम का प्रयोग ही बहुत उपयुक्त लगा ,लेकिन मैं उसे किसी झंझट में नहीं डालना चाहता था इसलिये पता गलत लिखाया ।उस रात हमारे कंपार्टमेंट का आखिरी व्यक्ति भी उतर गया । हम अकेले रह गये । मैंने विमला के सिर पर हथौड़ा मारा । वह तड़पीऔर षांत हो गई। मैंने उसके कपड़े उतारे और नग्न शरीर नदी से बाहर फेंक दिया। हॉं बैग जरूर रख लिया सोचा प्रीति को उपहार में दे दूॅंगा लेकिन हड़बड़ी में उसे भूल गया । मैंने सारे हाथों के निषान पोंछे इसमें काफी समय लग गया फिर प्रषान्त पुर के पास उतरकर बस से वापस आ गया । मुझे जरा भी उम्मीद नहीं थी कि जिप बैग मुझे फंसा देगा ।’सिन्हा के खिलाफ पत्नी की हत्या का अभियोग सिध्द हो गया उसे दोषी पाया गया और उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई गई । 

उसकी पटना हाइकोर्ट में की गई अपील खारिज हो गई और मृत्युदंड बहाल रहा । अपनी मृत्यु से पूर्व उसने प्रीति से मिलने की इच्छा जाहिरकी लेकिन प्रीति ने आखिरी इच्छा पूरी करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई ।


प्रस्तुति द्वारा - ड0 ष्शषि गोयल