Thursday, 2 April 2026

drashtibadha

हम अपने अंदर कुछ धारणाऐं बना लेते हैं और उन पर ही चलते हैं उसी दृष्टि से संसार देखते हैं । ये धारणाऐं  है हमें कुछ नहीं दिखाई देता ,हम उन्हें खोलने की कोशिश नहीं करते। हम अंधेरा है उसे स्थायी मान लेहमारे  मन की खिड़कियां होती हैं,लेकिन जब इन खिड़कियों पर धूल जम जाती है तब हम आहत होते हैं बाहर अंधेराते हैं,उसके पार देखने की कोशिश ही नहीं करते । मन की परतों को समय समय पर साफ करने से दृष्टि बाधा समाप्त होती है,दृष्टिकोण बदलता है,और हम दुनिया को  साफ नजरों से देखने लगते हैं,दुनिया जब नये रंगों में दिखाई देती है, क्योंकि रोशनी बाहर है रोशनी की ओर देखेगो तभी दुनिया दिखाई देगी ।

मैक्स मूलर ने वेदों उपनिषदों और अन्य संस्कृत ग्रन्थों की दुर्भावनापूर्वक अंग्रेजी अनुवाद किया। मैक्समूलर ने 1836 में अपनी पत्नी को पत्र लिखा ,‘ मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे द्वारा किया गया अनुवाद भविष्य में भारत के भाग्य पर गहरा प्रभाव डालेगा । पिछले तीन हजार वर्षो में उससे जो भी उत्पन्न हुआ है उसे जड़ से उखाड़ फेंकने का यही एक मात्र उपाय है ।


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