जब हम एक पड़ाव पर ठहरा हुआ महसूस करते हैं तब मन स्वाभाविक रूप से पीछे भी देखता है और आगे भी । वही क्षण है यह स्वीकार करना चाहिये जो बीत गया उसने हमें कुछ सिखाया ही होगा । भूलें जीवन की सबसे बड़ी शिक्षक होती हैं,अपनी गलती समझ लेना उसे दोहराने से बचना है और यही सीख भविष्य की ताकत बन जाती है ।
अधीरता हमें भटका देती है संयम हमें स्थिर रखता है यदि दिशा सही हो तो धीरे धीरे चलना कमजोरी नहीं है। छोटे शांत और ईमानदार प्रयास समय के साथ बड़े बदलाव की नींव रखते हैं। सच्चा परिवर्तन बाहर नहीं भीतर से शुरू होता है। दुनिया व्यवस्था और लोग इन पर प्रश्न उठाना सरल है पर स्वयं से प्रश्न करना कठिन है जब तक विचार और आचरण के बीच दूरी बनी रहती है तब तक कोई सुधार टिकाऊ नहीं हो सकता। क्रोध और अहंकार तत्कालिक संतोष दे सकते हैं लेकिन भीतर रिक्तता छोड़ जाते हैं। संयम और अनुशासन धीरे धीरे चरित्र निर्माण करते हैं
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