Tuesday, 21 April 2026

shabd ko nishabd ki abha cahiye

 आजकल आम बोलचाल की भाषा में नये नये शब्द गढ़कर आ गये हैं। अगर उनका शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो  अर्थ का अनर्थ हो सकता है। मीडिया को बाइट चाहिये ऐसा लगता है मीडिया काटखाने के लिये दौड़ती ह या हम चबा चबा कर शब्द बोल रहे हैं कि कुछ मंुह से गलत न निकल जाए जो अखबारों की सुर्खियां बन जाऐं। पर फिर भी जब दो विरोधी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती हैं तो उस समय ऐसा लगता है कि अंडरवर्ल्ड के लोग हैं जो एक दूसरे को शब्दों से नहीं मार रहे चाकू छुरे घोंप रहे हों फिर बाद में माफी मांगते दिखेंगे कि कुछ अनजाने में शब्द निकल गये जब कि वे जानबूझ कर बोले गये होते हैं पर दिखाते हैं कि गलती से निकल गए।जैसे भोजन खायें या ठूस लें । आहत को राहत चाहिये न कि कटु शब्दों की मार कि ऐसा होना चाहिये। विष भरे शब्द घायल के घाव को कुरेद कर उसे नासूर बना देते हैं। अर्न्तमन से निकला शब्द असर करता है। मन में शब्द पलने चाहिए उन्हें परिपक्व होने देना चाहिए कि आप बोल रहे हैं वह कहां तक उचित हैं। आपके शब्दों का प्रभाव पड़ेगा या नहीं । आपके भाव और मन की ऊर्जा शब्दों में प्रवेश करती है और आपका वाक्य वजनदार हो जाता है। शब्द को भी निशब्द की आभा चाहिये ,कौन से निकले शब्द घायल मन के लिये औषधि होंगे ,वजनदार होंगे 

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