Saturday, 18 April 2026

boliye magar sambhal kar

 बोलिये मगर संभल कर ,मुंह से निकला शब्द और तरकश से निकला तीर वापस नहीं आ सकता,जब दोनों की दिल पर लगते हैं तो घायल कर देते हैं इसलिए अच्छा है कि बोलते समय ही संभल कर बोलिये। मन में कुछ और जुबां पर कुछ भी कभी कभी आवश्यक है 

एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव

शब्द संभल कर बोलिये शब्द के हाथ न पाव

कबीर दास जी ने एक दोहे में पूरा जीवन का फलसफा सामने रख दिया । शब्द घायल मन पर मलहम का काम भी कर सकते हैं और उसे कुरेद कर नासूर बना सकते हैं । वे शब्द ही आपकी धारणा का इजहार करते हैं आप सामने वाले के प्रति कितनी आस्था रखते हैं । 


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