किशोरावस्था में बच्चे हर समय की टोकाटाकी से अपनी बातों को छिपाने लगते हैं कि पता नहीं किस बात के लिए माता पिता कह दें यह ऐसा क्यों किया वैसा क्यों किया। बच्चों का मन जानना समझना बहुत आवयश्क है इसके लिए उनसे बात करते रहना चाहिये।
देखा जाए तो मोबाइल पर गढ़ी आंखें परिवार का समय भी छीन रही हैं उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय भी छीन रही हैं क्योंकि इससे केवल हताशा निराशा और उच्छृखंलता के सिवाय कुछ भी नहीं मिलने वाला है। अब मस्तिष्क को श्रम करने की आवश्यकता नहीं है बस आंखें उस तक संदेश पहुंचाती रहती हैं और वो उनके साथ ही घूमता रहता है। जितना आप मस्तिष्क से काम लेंगे वह उतना सक्रिय होता है,पर रील देखने में मस्तिष्क को क्रिया का अवसर ही नहीं मिलता है तो वह भी आरामतलब हो जाता है उसे भी कुछ सोचने की और समझने की आवयश्कता नहीं रहती