He has an axe to grind
Selfish motive to advance
He has an axe to grind
Selfish motive to advance
हमारे अंदर अनुभूतियों का सागर है,प्रवाह है। ये जीवन का बैरोमीटर है,ये हमारे अंदर की षक्ति को प्रदर्षित करता है। हमारी कल्पना को आगामी जीवन की कल्पना कहता है, यह तो प्रकृति का सुंदरतम उपहार है, इसे अभिव्यक्ति देना ईष्वरीय सत्ता को नमन करना है । हम जीवन को कैसे देख रहे हैं ? हम कैसा महसूस कर रहे हैं ?इस छोटी सी बात पर ही सारा जीवन टिका है। हमारी सफलताऐं असफलताऐं सब में यह बात निहित है, तो उसे हम बाहर आने दें ।
हमें अपने अंदर की इस षक्ति को उपयोग में लाना है, एंड्र कार्नेगी ने भट्टी बनाई और स्टील मिल की नींव रखी, जब कि हिटलर ने वही भट्टी लाषों को ठिकाने लगाने में काम में लाई ।
जब तक जीवन कार्यषील है, तब तक ही उपयोगी है, नहीं तो मिट्टी है। मिट्टी कितनी ही उपयोगी हो, रोंदी पैरों तले ही जायेगी ,जब वह कोई आकार ले लेती है तो सिर माथे भी रखी जाती है। सड़क का पत्थर ठोकर खाता है,जब वह मूर्ति रूप ले लेता है तो देवता बन जाता है ।
यद्यपि मोबाइल,‘दनिया मेरी जेब में ,तकनीकी विज्ञान का चमत्कार है इसने पूरी दुनिया को सबके सामने एक क्लिक पर ला दिया है और यदि कहा जाए तो एसा छोटा सा डिब्बा वह जो अगर आपके पास है तो आपको न मोटे मोटे एनसाइक्लोपीडिया,डिक्शनरी,कुछ भी नहीं चाहिए । वैसे ही पुस्तके अपना आस्त्त्वि खोती जा रही है। इस छोटी सी डिबाइस ने पुस्तकों को धूल खाने को विवश कर दिसा है। मोबाइल ने न जाने कितनी चीजों को डिब्बे में बंद कर दिया है। बच्चे जहां रंग बिरंगी किताबों को खोल कर पढ़ने बैठते थे अब गर्दन झुकाए छोटी सी स्क्रीन पर देखते रहते हैं? संभवतः एक दिन गर्दन टेढी वाले ही पैदा होने लगेंगे ।आंखें अपना आस्त्त्वि खो देंगी पर मोबाइल की दुनिया बच्चे छाड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे ,
सिमटते परिवारों ने बच्चों का एकाकीपन बढ़ा दिया था उसकी वजह से बच्चे चिड़चिड़े हो रहे थे पर अब बच्चे एकाकीपन अधिक पसंद करते हैं आपके बोलने तक ये चिढ़ने लगते हैं। अब बैट बल्ला नहीं खेलना चाहता। वे गेम वीडियो पर खेलते हैं। वर्चुअल दुनिया में समा गये हैं। आपका किसी काम का कहना या बुलाना उन्हें झुंझला देता है ।
हम अपने अंदर बुनियादी बदलाब चाहते हैं। चेतना जाग्रत होती है पर कैसे के सवाल के साथ ही इब जाती है,कारण मन सोचता कुछ और है लेकिन जब कभी कार्यान्वित करने का अवसर आता है तो मन बदल जाता है अपने पुराने ढर्रे पर चल देता है। असली बदलाव युवा वर्ग में आ रहा है,रोमांच फन और पैसों के दुरुपयोग का शान शैकत आदि की ओर अधिक घ्यान दे रहे हैं। यहां विचार और विचारक बदल जाते हैं । भारतीय संस्कृति उच्चतम पायदान पर थी अब धीरे धीरे वह एकदम निचले स्तर पर आती जा रही है । बेटा बाप का कत्ल कर रहा है ,बेटी पूरे परिवार को मौत की नींद अपनी हवस के कारण सुला रही हैं भाई भाई को मार रहा है बहन हिस्से के लिये लड़ रही है ,इकलौते भाई को मार रही है,जिससे अकेली वह जमीन जायदाद की वारिस बन जाये ।
आजकल आम बोलचाल की भाषा में नये नये शब्द गढ़कर आ गये हैं। अगर उनका शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। मीडिया को बाइट चाहिये ऐसा लगता है मीडिया काटखाने के लिये दौड़ती ह या हम चबा चबा कर शब्द बोल रहे हैं कि कुछ मंुह से गलत न निकल जाए जो अखबारों की सुर्खियां बन जाऐं। पर फिर भी जब दो विरोधी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती हैं तो उस समय ऐसा लगता है कि अंडरवर्ल्ड के लोग हैं जो एक दूसरे को शब्दों से नहीं मार रहे चाकू छुरे घोंप रहे हों फिर बाद में माफी मांगते दिखेंगे कि कुछ अनजाने में शब्द निकल गये जब कि वे जानबूझ कर बोले गये होते हैं पर दिखाते हैं कि गलती से निकल गए।जैसे भोजन खायें या ठूस लें । आहत को राहत चाहिये न कि कटु शब्दों की मार कि ऐसा होना चाहिये। विष भरे शब्द घायल के घाव को कुरेद कर उसे नासूर बना देते हैं। अर्न्तमन से निकला शब्द असर करता है। मन में शब्द पलने चाहिए उन्हें परिपक्व होने देना चाहिए कि आप बोल रहे हैं वह कहां तक उचित हैं। आपके शब्दों का प्रभाव पड़ेगा या नहीं । आपके भाव और मन की ऊर्जा शब्दों में प्रवेश करती है और आपका वाक्य वजनदार हो जाता है। शब्द को भी निशब्द की आभा चाहिये ,कौन से निकले शब्द घायल मन के लिये औषधि होंगे ,वजनदार होंगे
बोलिये मगर संभल कर ,मुंह से निकला शब्द और तरकश से निकला तीर वापस नहीं आ सकता,जब दोनों की दिल पर लगते हैं तो घायल कर देते हैं इसलिए अच्छा है कि बोलते समय ही संभल कर बोलिये। मन में कुछ और जुबां पर कुछ भी कभी कभी आवश्यक है
एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव
शब्द संभल कर बोलिये शब्द के हाथ न पाव
कबीर दास जी ने एक दोहे में पूरा जीवन का फलसफा सामने रख दिया । शब्द घायल मन पर मलहम का काम भी कर सकते हैं और उसे कुरेद कर नासूर बना सकते हैं । वे शब्द ही आपकी धारणा का इजहार करते हैं आप सामने वाले के प्रति कितनी आस्था रखते हैं ।
स्वच्छ हवा जैसी चीजें बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं, क्योंकि ये सबकी भलाई के लिए होती हैं
आज के डिजीटल गणतंत्र में डिजिटल साक्षरता पारंपरिक साक्षरता की तरह ही महत्वपूर्ण है।
आदमी के अंदर भी जंगल उग आते हैं और उसमें कटीली झाड़ियां सिर उठाने लगती हैं। आंतरिक क्रोध दुश्चिंता से कुछ हरकत एसी हो जाती हैंजब मन शांत हो जाता है तब बहुत ग्लानि होती है कि यह हमने क्या कर दिया? हम अवसाद में धिरने लगते हैं। इससे अच्छा है उस स्थिति से उबर जाना न कि यह सोचते रहना कि हमने यह क्या कर दिया। हमसे ऐसा कैसे हो गया। अपने को समझायें कि जो कुछ हुआ परिस्थ्तििवश हो गया,परंतु जहां तक है उस स्थिति पर काबू पायें । यह जरूरी नहीं कि इसके लिए आप अपने को सजा दें बल्कि परिस्थिति को सुलझाने का प्रयास करें । एक मुस्कान बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिला देती है