हम अपने अंदर बुनियादी बदलाब चाहते हैं। चेतना जाग्रत होती है पर कैसे के सवाल के साथ ही इब जाती है,कारण मन सोचता कुछ और है लेकिन जब कभी कार्यान्वित करने का अवसर आता है तो मन बदल जाता है अपने पुराने ढर्रे पर चल देता है। असली बदलाव युवा वर्ग में आ रहा है,रोमांच फन और पैसों के दुरुपयोग का शान शैकत आदि की ओर अधिक घ्यान दे रहे हैं। यहां विचार और विचारक बदल जाते हैं । भारतीय संस्कृति उच्चतम पायदान पर थी अब धीरे धीरे वह एकदम निचले स्तर पर आती जा रही है । बेटा बाप का कत्ल कर रहा है ,बेटी पूरे परिवार को मौत की नींद अपनी हवस के कारण सुला रही हैं भाई भाई को मार रहा है बहन हिस्से के लिये लड़ रही है ,इकलौते भाई को मार रही है,जिससे अकेली वह जमीन जायदाद की वारिस बन जाये ।
Shashi Goyal
Wednesday, 22 April 2026
Tuesday, 21 April 2026
shabd ko nishabd ki abha cahiye
आजकल आम बोलचाल की भाषा में नये नये शब्द गढ़कर आ गये हैं। अगर उनका शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। मीडिया को बाइट चाहिये ऐसा लगता है मीडिया काटखाने के लिये दौड़ती ह या हम चबा चबा कर शब्द बोल रहे हैं कि कुछ मंुह से गलत न निकल जाए जो अखबारों की सुर्खियां बन जाऐं। पर फिर भी जब दो विरोधी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती हैं तो उस समय ऐसा लगता है कि अंडरवर्ल्ड के लोग हैं जो एक दूसरे को शब्दों से नहीं मार रहे चाकू छुरे घोंप रहे हों फिर बाद में माफी मांगते दिखेंगे कि कुछ अनजाने में शब्द निकल गये जब कि वे जानबूझ कर बोले गये होते हैं पर दिखाते हैं कि गलती से निकल गए।जैसे भोजन खायें या ठूस लें । आहत को राहत चाहिये न कि कटु शब्दों की मार कि ऐसा होना चाहिये। विष भरे शब्द घायल के घाव को कुरेद कर उसे नासूर बना देते हैं। अर्न्तमन से निकला शब्द असर करता है। मन में शब्द पलने चाहिए उन्हें परिपक्व होने देना चाहिए कि आप बोल रहे हैं वह कहां तक उचित हैं। आपके शब्दों का प्रभाव पड़ेगा या नहीं । आपके भाव और मन की ऊर्जा शब्दों में प्रवेश करती है और आपका वाक्य वजनदार हो जाता है। शब्द को भी निशब्द की आभा चाहिये ,कौन से निकले शब्द घायल मन के लिये औषधि होंगे ,वजनदार होंगे
Saturday, 18 April 2026
boliye magar sambhal kar
बोलिये मगर संभल कर ,मुंह से निकला शब्द और तरकश से निकला तीर वापस नहीं आ सकता,जब दोनों की दिल पर लगते हैं तो घायल कर देते हैं इसलिए अच्छा है कि बोलते समय ही संभल कर बोलिये। मन में कुछ और जुबां पर कुछ भी कभी कभी आवश्यक है
एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव
शब्द संभल कर बोलिये शब्द के हाथ न पाव
कबीर दास जी ने एक दोहे में पूरा जीवन का फलसफा सामने रख दिया । शब्द घायल मन पर मलहम का काम भी कर सकते हैं और उसे कुरेद कर नासूर बना सकते हैं । वे शब्द ही आपकी धारणा का इजहार करते हैं आप सामने वाले के प्रति कितनी आस्था रखते हैं ।
Tuesday, 14 April 2026
admi ke andar jaungal
स्वच्छ हवा जैसी चीजें बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं, क्योंकि ये सबकी भलाई के लिए होती हैं
आज के डिजीटल गणतंत्र में डिजिटल साक्षरता पारंपरिक साक्षरता की तरह ही महत्वपूर्ण है।
आदमी के अंदर भी जंगल उग आते हैं और उसमें कटीली झाड़ियां सिर उठाने लगती हैं। आंतरिक क्रोध दुश्चिंता से कुछ हरकत एसी हो जाती हैंजब मन शांत हो जाता है तब बहुत ग्लानि होती है कि यह हमने क्या कर दिया? हम अवसाद में धिरने लगते हैं। इससे अच्छा है उस स्थिति से उबर जाना न कि यह सोचते रहना कि हमने यह क्या कर दिया। हमसे ऐसा कैसे हो गया। अपने को समझायें कि जो कुछ हुआ परिस्थ्तििवश हो गया,परंतु जहां तक है उस स्थिति पर काबू पायें । यह जरूरी नहीं कि इसके लिए आप अपने को सजा दें बल्कि परिस्थिति को सुलझाने का प्रयास करें । एक मुस्कान बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिला देती है
Saturday, 11 April 2026
manidhara
स्वच्छ हवा जैसी चीजें बाजार के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकतीं, क्योंकि ये सबकी भलाई के लिए होती हैं
आज के डिजीटल गणतंत्र में डिजिटल साक्षरता पारंपरिक साक्षरता की तरह ही महत्वपूर्ण है।
आदमी के अंदर भी जंगल उग आते हैं और उसमें कटीली झाड़ियां सिर उठाने लगती हैं। आंतरिक क्रोध दुश्चिंता से कुछ हरकत एसी हो जाती हैंजब मन शांत हो जाता है तब बहुत ग्लानि होती है कि यह हमने क्या कर दिया? हम अवसाद में धिरने लगते हैं। इससे अच्छा है उस स्थिति से उबर जाना न कि यह सोचते रहना कि हमने यह क्या कर दिया। हमसे ऐसा कैसे हो गया। अपने को समझायें कि जो कुछ हुआ परिस्थ्तििवश हो गया,परंतु जहां तक है उस स्थिति पर काबू पायें । यह जरूरी नहीं कि इसके लिए आप अपने को सजा दें बल्कि परिस्थिति को सुलझाने का प्रयास करें । एक मुस्कान बहुत सी समस्याओं से छुटकारा दिला देती है ।
Friday, 10 April 2026
man manidhara
गुरू गोविंद सिंह ने अनेक युद्ध जीते। युद्ध में घायल सैनिकों को पानी पिलाने का काम उन्होंने भाई कन्हैया को सौंपा। भाई कन्हैया केवल अपनी तरफ के सिपाहियों को ही नहीं बल्कि दुश्मन के घायल सैनिकों को भी पानी पिलाते थे । कुछ लोगों ने गुरू से इस बात की शिकायत की। गुरू गोविंद सिेह ने भाई कन्हैया से इसका जवाब पूछा तो भाई कन्हैया ने गुरू साहब को कहा,‘ मैं जहां आपकी ज्योति देखता हूं वहां पानी पिला देता हूं’। इस पर गुरू गोविंद सिह ने कहा कि यही एक व्यक्ति है जिसने मेरी शिक्षा को सही रूप् में समझा है और उस पर अमल किया है । उन्होंने भाई कन्हैया से कहा अब आगे से पानी ही नहीं बल्कि उन सिपाहियों की मरहम पट्टी भी किया करो ।धर्म की रक्षा के लिए गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने समस्त परिवार का बलिदान भी किया,इसलिए उन्हें सरबसदानी यानि पूरे परिवार का दानी भी कहा जाता है। उन्होंने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना कर समस्त मानव जाति को प्रेम और बलिदान का संदेश दिया, वो अपने उपदेश में कहा करते थे कि हम अच्छे कर्म करने मे कभी पीछे न हटें,नतीजा कुछ भी हो। धर्म की रक्षा की खातिर अपने परिवार के चारों ओर पु़त्रो को कुरबान कर दिया। उनहोंने प्राणि मात्र को समझाया कि जबयह अनुभाव करते हैं कि हम एक शरीर नहीं एक आत्मा हैं तब इस सृष्टि के प्रति और ज्यादा । हम धरती रहने वाले जागरूक हो जाते
Thursday, 9 April 2026
man manidhara
गुरू गोविंद सिंह ने अनेक युद्ध जीते। युद्ध में घायल सैनिकों को पानी पिलाने का काम उन्होंने भाई कन्हैया को सौंपा। भाई कन्हैया केवल अपनी तरफ के सिपाहियों को ही नहीं बल्कि दुश्मन के घायल सैनिकों को भी पानी पिलाते थे । कुछ लोगों ने गुरू से इस बात की शिकायत की। गुरू गोविंद सिेह ने भाई कन्हैया से इसका जवाब पूछा तो भाई कन्हैया ने गुरू साहब को कहा,‘ मैं जहां आपकी ज्योति देखता हूं वहां पानी पिला देता हूं’। इस पर गुरू गोविंद सिह ने कहा कि यही एक व्यक्ति है जिसने मेरी शिक्षा को सही रूप् में समझा है और उस पर अमल किया है । उन्होंने भाई कन्हैया से कहा अब आगे से पानी ही नहीं बल्कि उन सिपाहियों की मरहम पट्टी भी किया करो ।धर्म की रक्षा के लिए गुरू गोविंद सिंह जी ने अपने समस्त परिवार का बलिदान भी किया,इसलिए उन्हें सरबसदानी यानि पूरे परिवार का दानी भी कहा जाता है। उन्होंने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना कर समस्त मानव जाति को प्रेम और बलिदान का संदेश दिया, वो अपने उपदेश में कहा करते थे कि हम अच्छे कर्म करने मे कभी पीछे न हटें,नतीजा कुछ भी हो। धर्म की रक्षा की खातिर अपने परिवार के चारों ओर पु़त्रो को कुरबान कर दिया। उनहोंने प्राणि मात्र को समझाया कि जबयह अनुभाव करते हैं कि हम एक शरीर नहीं एक आत्मा हैं तब इस सृष्टि के प्रति और ज्यादा । हम धरती रहने वाले जागरूक हो जाते हैं ।