इंसान का मन भी एक समुद्र है किसी को क्या मालुम कि कितने हादसे और कितनी यादें उसमें समाई हुई हैं। कभी कभी तैरकर उबर कर ऊपर आ जाते हैं और हमें डुबोकर खुद डूब जाते हैं फिर उभरती है एक नई तस्वीर कुछ लहरों पर उतराती और सूरज की किरणों से झिलमिलाती फिर बदल जाती हैं और उभर आते हैं साये कुछ काले कुछ सुनहरे कुछ अवशेष,कभी कभी वे उतराते ही रहते हैं ।
अतीत अर्थात् हमारा बीता कल जिसे हम जानते हैं कि कैसा बीता,क्या हमारी भूल थी, क्या हम और भी कुछ कर सकते थे ,और क्या करना चाहते थे पर नहीं कर पाये । लेकिन नहीं कर पाये । लेकिन भविष्य की क्ल्पना तो सहज है पर वह हमारे हाथ में नहीं है। पता नहीं होता है कि मुंह में जाने वाला ग्रास मुंह में ही जायेगा या गिर जायेगा। परंतु सोचते हैं थाली सामने है वह हम खायेंगे पर उस पर नाम है यह नहीं मालुम ।जो बीत गया अगर बहुत अच्छा बीता तो उसके चक्र में घूमते रहेंगे कि हमारा भविष्य भी कैसा हो लेकिन दाना गिरेगा और चिरैया खायेगी या आप यह भविष्य के गर्त में है।
लगता है जिंदगी सहज जायेगी लेकिन अनेकों समस्याऐं मुह बाये खड़ी होती हैं जिन्हें हल करने में समय निकल जाता है। ट्रेन का समय दस मिनट का रास्ताऔर गुजरता दो किलोमीटर लंबा जलूस रास्ता बंद बेचैन हैं इधर से उधर से पर सामने ट्रैफिक का सैलाब ,ट्रेन गुजर गई आपकी योजना रखी रह गई ।यह आपको समझना था कि रास्ते में कितनी रुकावट है पर समझकर चले दस मिनट का रास्ता है पर अवरोध पर अवरोध,समय पार हो गया,अब चुनौती सामने है कि कैसे फिर से समय को बांधा जाये जुड़ लेते हैं नजदीक दूसरे स्टेशन से या स्थगित करते हैं यात्रा ,अंतहीन समस्याओं से जूझने के लिसे परंतु आगे शिक्षा तभी मिलती है कि पार पहुंचना कठिन है परंतु असंभव नहीं है।कुछ संयोजन समय का आवश्यक है,स्थिति का,समाज का जिसमें आप रह रहे हैं ।
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