जीवन में अच्छे बुरे दोनों अनुभव मिलते हैं यदि मीठी स्मृतियां होती हैं तो कड़वे अनुभव जो कांटे की तरह चुभते रहते हैं ,आंख खुल जाए तो सीधे उसी दुनिया में पहुंच जाते हैं जहां कटु अनुभव मिले थे ,वे हमें झकझोरते रहते हैं । हुआ तो हुआ क्यों ? हमने क्या कमी करदी ऐसा करते तो ऐसा होता,वैसा करते तो वैसा हो जाता। उसने हमारे साथ ऐसा क्यों किया फिर अपनी गलती का ऐहसास भी होता। हमको यह करना चाहिये था। तब आत्म बोध होता है अगर अपनी गलती होती है कि हमसे यह गलती हुई ऐसा नहीं करना चाहिये था ,यह आत्मा की स्वीकृति है ,अन्तर्मन की स्पष्टता है,शुद्धि है। इसका बीज पड़ा है तो उसे वृक्ष बनने देना है उसे मसलना नहीं है,यही आत्मा का विरेचन है। जीवन की कटुता को कम कर शोधन करना है। अपनी अपंगता को स्वीकारना फिर उसका शोधन करना ही आत्मा का संज्ञान है। नकारात्मकता को नकार कर अपनी कमियों को स्वीकारना है । परिस्थितियों का सामना करना ही हमें जीवंत बनाना है।
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