हम अपने को बदलने के लिए चमत्कार का इंतजार करते हैं,जीवन में कुछ जरूर ऐसा होगा जो हमारा जीवन बदल देगा। सब िदन एक से नहीं होते,लेकिन आवश्यकता है बदलाव के इंतजार करने का नहीं वरन् अपने अंदर बदलाव लाना स्वयं हमारी जिम्मेदारी है । हम अपने चारो ओर स्वयं एक वलय का निर्माण कर लेते हैं और उससे आगे निकलना नहीं चाहते पर अपने बनाये बंधन को स्वयं तोड़ना होगा । जो कुछ भी हो रहा है वे आपकी अपनी आदतों का परिणाम है,प्रतिबिंब है । गोल करने का श्रेय हर व्यक्ति लेना चाहता है पर पाता वही है जो लक्ष्य पर घ्यान केन्द्रित करता है और अवसर की तलाश करता है। अवसर आने पर उसे पकड़ लेता है । ‘मैं अपने को बदलने की कोशिश तो बहुत करता हूं पर बदल नहीं पाता‘यह केवल बहाना है,अनिच्छा अपने को बदलने की लेकिन वह तो आपका स्वभाव बन चुका है। आप अपने को बदलना नहीं चाहते । बदलाव क लिये कार्यशैली पर घ्यान केन्द्रित करना पड़ेगा जिस आदत को अदलना चाहते हैं उस पर भी ध्यान देना पड़ेगा कि उसे बदलने की नौबत क्यों आई है हम गलत थे यह स्वीकारोक्ति करते ही आप लक्ष्य की ओर बढ़ लेते हैं। यह घ्यान रहे कि पहले अपनी आदत को परखें कि कौन सी आदत बदलनी है । अच्छी आदत को बढ़ावा दें और बुरी आदतों को कम करने का प्रयत्न करें सोचलें उस पर अमल अवश्य करना है। आपकी यह छोटी सी पहल आपके सामन सफलता के द्वार खोल सकती है । निरंतरता बनाये रखने से सफलता का द्वार भी बड़ा होता जाता
Monday, 7 September 2026
Saturday, 5 September 2026
Anubhav
जीवन में अच्छे बुरे दोनों अनुभव मिलते हैं यदि मीठी स्मृतियां होती हैं तो कड़वे अनुभव जो कांटे की तरह चुभते रहते हैं ,आंख खुल जाए तो सीधे उसी दुनिया में पहुंच जाते हैं जहां कटु अनुभव मिले थे ,वे हमें झकझोरते रहते हैं । हुआ तो हुआ क्यों ? हमने क्या कमी करदी ऐसा करते तो ऐसा होता,वैसा करते तो वैसा हो जाता। उसने हमारे साथ ऐसा क्यों किया फिर अपनी गलती का ऐहसास भी होता। हमको यह करना चाहिये था। तब आत्म बोध होता है अगर अपनी गलती होती है कि हमसे यह गलती हुई ऐसा नहीं करना चाहिये था ,यह आत्मा की स्वीकृति है ,अन्तर्मन की स्पष्टता है,शुद्धि है। इसका बीज पड़ा है तो उसे वृक्ष बनने देना है उसे मसलना नहीं है,यही आत्मा का विरेचन है। जीवन की कटुता को कम कर शोधन करना है। अपनी अपंगता को स्वीकारना फिर उसका शोधन करना ही आत्मा का संज्ञान है। नकारात्मकता को नकार कर अपनी कमियों को स्वीकारना है । परिस्थितियों का सामना करना ही हमें जीवंत बनाना है।
Thursday, 3 September 2026
bcche aur mobaile
अब बच्चों का लालन पालन बिलकुल अलग ढंग से होने लगा है एकिताबी ढंग से एमां बच्चे को अपना दूध तो पिलाना चाहती ही नहीं है उस पर समय नहीं है । बोतल से दूध पिलाया जाता है क्योंकि एक तो मां पर समय नहीं होता िकवह बैठ कर बार बार बच्चे के लिये अपना समय और फिगर खराब करें दूसरे उनके हिसाब से डिब्बाबंद दूध में सारे विटामिन्स आदि मिलाये जाते हैं उनके हिसाब से वह फायदे मंद है ।एबोतल लगा दी बच्चा अपने आप दूध पीले बोतल हटाये नहीं एउसके सामने मोबाइल खोल कर रख देते हैं और बच्चा उन चलती फिरती तस्वीरों को देखते देखते बोतल खाली कर देता है। उसे अपने पेट का ज्ञान नहीं हो पाता है जब कि मां का दूध पीने पर बच्चा अपने आप पेट भरने पर मुंह हटा लेता है । बोतल पूरी खाली करने पर मां खुश है कि उसने दूध पी लिया उसे चाहे पहला दूध हजम हुआ या नहीं इसका संज्ञान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती । वह चलती फिरती तस्वीरें देखने में मगन हो जाता है। मां अपने काम में व्यस्त हो जाती हैएउसकी ड्यूटी खत्म और यहीं से बच्चे मोबाइल एडिक्ट होते जाते हैं। बच्चे जैसे जैसे बड़े होते हैं वो देखते हैं कि खाली समय में मां बाप मोबाइल देख रहे हैं तो वह भी उसे देखने की जिद करने लगता है और बच्चा रोये नहीं इसलिये मोबाइल पकड़ा दिया जाता है । मां बाप राहत की सांस लेते हैं कि बच्चा चुप है और वो अपना काम आराम से कर पा रहे हैंएयह नहीं जानते कि वो अपने बच्चे की जिंदगी संकट में डालदेते हैं।
Wednesday, 2 September 2026
umra ke padav
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है निष्क्रियता बढ़ती जाती है एक एक कर सब बिछड़ते तो जाते हैं रह जाती हैं स्मृतियां अच्छी और बुरी जिन्होंने गहराई में कहीं स्थान बना रखा होता है । जब नाते रिश्तेदार दूर हो जाते हैं तब साथ रहता है आंतरिक संसार जो एकाकीपन का साथी होता है ,यही असली संपत्ति है जो अंततक साथ रहती है,अगर किसी का बुरा नहीं किया होता है तो आत्म तुष्टि साथ रहती है। एकाकीपन जीवन की एक रिक्तता का कारण है जब ये स्मृतियां सुख या दुख का कारण बनती हैं शारीरिक शक्तियां साथ छोड़ देती है परंतु आंतरिक शक्ति जीवन को सहज बनाती है। सच्चा सुख बाहरी साधनों में नहीं मनुष्य के अपने अंदर निहित है