Thursday, 17 September 2015

nari sashaktikaran

 नारी सशक्तीकरण

नारी सशक्तीकरण के रूप में महिलाओं ने ऐसा वातावरण तैयार किया है जो स्वयं उन्हें कंदराओं में धकेल रहा है । वह खुली हवा में सांस लेने के लिये उड़ी लेकिन उड़ान में वह आंधी से बंजर जमीन की ओर गिर रही है । एक ऐसे तर्क के साथ कि वह कुछ भी करने के लिये स्वतंत्र है ,लेकिन स्वयं के लिये तोड़ी दीर्घा में यदि वह देखे तो स्वयं उसके अपनी कोई परिभाषा नही हैं। उसने अपने चारों ओर अनेकों वलय खड़े कर लिये है और उन्हें वह एक एक कर न तोड़ कर एकदम से आक्रामक ढंग से तोड़ने को आतुर है जिसमें अच्छे बुरे को सुख दुःख को एक किनारे कर बस बाहर आना है वह अपने आपको स्त्री नहीं कहना चाहती है।
   लेकिन क्या वह अपने को पुरुष समकक्ष कह कर हर उस बात से इंकार कर सकती है जिसमें प्रतिब.ध्द
हैं। क्यों महिलाएं अपने आपके लिय आरक्षण मांग रही है ? क्या महिला होने के नाम पर ? क्यों नहीं पुरुषों के साथ खड़ी होकर उसी पंिक्त में आगे बढ़ना चाहती ? क्यों अपने लिये एक नई पंक्ति चाहती है जहां उन्हें प्राथमिकता मिले क्योंकि वे स्त्री हैं 

Tuesday, 28 July 2015

balatkar

बलात्कार जीवन भर की यंत्रणा है अगर इस यंत्रणा को देने वाले  को बचाने  के लिए  माँ  बाप थैली भर रूपया  लेकर पहुंचे  और न्याय करने वाले उस थैली को

Abdul Kalam Azad ko salam

    

Thursday, 16 July 2015

sabse Accha Kya

सबसे अच्छी  कहानी वह है
जो मेरी माँ मुझे सुनातीं  है '
सबसे मधुर गीत वह है
माँ जब लोरी   गाती है
सबसे प्यारी नींद  मुलायम  गद्दे पर नहीं
माँ की गोद  मैं आती है
सबसे  अच्छा खाना पांच  सितारा
होटल का  शैफ  नहीं  मेरी माँ है
 सबसे  मीठी  आवाज  वह है
जब माँ लाडो  कह कर बुलाती  है
जब भी कोई दुःख आता है
मुझे बस  माँ की याद आती  है 

Friday, 9 January 2015

balatkaar ek vimarsh

हमारे यहाँ एक लहर सी चलती है। कभी दलित विमर्श कभी नारी विमर्श  और इसी के साथ सब जुट जाते है उसके उठान के लिए  नारी पर विमर्श के लिए अब रपे के मामले भी उतनी तेजी से बढ़ रहे हैं। बेटी बचाओ अभियान चल रहा है हर भाषण  पत्र पत्रिकाओं मैं भ्रूण हत्या की बात चल रही है कोख मैं बेटी मारने को हत्यारा    कहते हैं और पर  बेटी को नोचने खसोटने को उसे जिल्लत मैं जीने को मजबूर करने को जरा जरा सी बच्चियों को रौंद  डालने को लड़के हैं भूल हो जाती है कह कर नकारने को उस माँ से पूछें जिसने अरमानों  से उसे पैदा किया की बेटी भी जीने का अधकार रखती है पर क्या  कुछ लफंगों की हवस का शिकार बनना उसकी नियति है। रबर की गेंद भी दबने पर दर्द भरी चीख निकालती है  जरा जरा सी बच्चियों के  घिनोने हत्यारों को  ऐसे ही  छोड़ दिया जाता है सौ  सौ सवाल लड़कियों से किये जाते हैं  और लड़के शान से मूँछों  पर ताव  देते हैं असली धिक्कार के पात्र हैं           

beti ke liye

भोर  जब भी  मुस्कराती है
ख्यालों मैं तू मुस्कराती है
दुपहरिया का फूल जब भी  खिलता है
तेरी बाँहों का एहसास  मिलता है
शबनमसे रात जब नाम होती है
रेशमी गुल सी  मखमली छुअन होती है
रात मैं आकाश मैं तारे टिमटिमाते हैं
तेरी चाँद मागने की जिद याद आती है

Wednesday, 22 October 2014

bhagwaan ki Insaan se prayer

मुझ  पर दया करो इंसान
मुझ पर दया करो  इंसान

मंदिर मैं घंटे बजते हैं
मस्जिद मैं हो रही अजान
चारो ओर  पुकारे हा हा
देदे देदे हे  भगवान्।

कोई कहता लक्ष्मी देदे
कोई कहता आसन
कोई कहता छाया देदो
कोई कष्ट निवारण।

अल्लाह भी हैं मेरे भाई
लेकिन उनमें है चतुराई
कहाँ की जन्नत कैसी जन्नत
 देती नहीं दिखाई  …

पैगम्बर है वन मैं अटके
 ईसा  रूप मैं क्रॉस पर लटके
ऐसे मैं बस दया दिखाएँ
कैसी जुगत  भिड़ाई।

लेकिन मेरी मुश्किल कैसी
दिखते  हाथ अनेकों
अपने सब हाथो से दाता
किरपा सारी  फेंको।

चंदा को भी जा घर भेजा
जिससे सब हो जाये अँधेरा
ब्रह्माजी ने कृपा करी और
देने बैठे पहरा

डर जायेंगे शेषनाग से
उसका पलंग बनाया
सागर मैं जा छिप  कर लेटा
पर मानुष को चैन न आया

जल जल कर दिए अनेकों
मुझको घेर लिया था
सोने की मेरी इच्छा को
उसने ढेर किया था।

उठ जाओ बस बहुत सो लिए
देदो हमको दान
देदो देदो की आवाजें
फोड़ रही थी कान।

लेकिन इससे ज्यादा मुश्किल
लक्ष्मी को लेकर है आई
देदो देदो लक्ष्मी देदो
करते यही दुहाई

अपनी पत्नी कैसे देदूं
कैसा तू नादान
अपने घर को  सूना कर लूँ
सोच जरा इंसान

दर्शन से यदि हो जाये तो
घर घर  लक्ष्मी जाए
सौ सौ ताले लगा लगा कर
करते अंतर्ध्यान।