Tuesday, 6 September 2016

जिन्न हाजिर हो

मोदीजी के पास जिन्न है जो चराग घिसा और जिन्न हाजिर कि भारत के भ्रष्टो को बदल दो कूड़ा फांकने वालों के साथ एक उठाने वाला चलेगा क्योंकि यहाँ की जनता तो इतनी जल्दी नहीं बदलेगी हाँ यदि सरे नेता बदल जाये तो शायद जिन्न कुछ कर पाए नहीतो वह भी वापस बोत्तल मैं घुस जायेगा कि जितना बदलूँगा नए सिरे से उनका घर भरना पड़ेगा  जवान चलने वाले तो चलाएंगे क्योंकि अबतक उसी का खाया है हाथपैर चलने का तोखाया नहीं है कला धन तो मोदीजी के आते ही गायब अब लेट रहेंगे  कहने मैं क्या जाता है 

और अरबों पानी मै

आज  समाचारपत्र मैं पढ़ा गणपति तैयार  किसी ने सजी १० फूट ऊँची प्रतिमा किसी ने पंद्रह फूट ऊँची १० लाख की प्रतिमा हर शहर मैं एक दुसरे को नीचा दिखाते गणपति को ऊँचा उठाते हैं  अरबों रूपये की प्रतिमाये बनती हैं क्या पैन  होता है रंग बिरंगे जहरीले रसायनों से गणपति चमकाए जाते हैं  उनकी जोर शोर से पूजा की जाती है  फिर उसे नदी समदर  मैं बहा आते हैं पानी को जहरीला बनाते हुए पहले यह केवल महाराष्ट्र का उत्सव था वह भी मिटटी की मूर्ती का जो घुलनशील होती थी व् चूने से ओउती होती थी जो पानी साफ ही करता था  एनी प्रदेशों मैं गणेश चतुर्थी मानते थे पर बहुत छोटी सी मिटटी की डली रखकर। लेकिन अब श्रद्धा  का नहीं ये अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा दिखने का उत्सव हो गया है यह गणपति श्राद्ध हो गया है कैसे एक साधक अपने आराध्य को कह सकता है की अब घर से जाओ होगी पूजा
नेता भी जब विसर्जन करने वाली लाखों की मूर्ती के सामने हाथ जोड़ कर खडे होते हैं तब अपनी सोच पर दुःख होता है की मैं कैसे जो हथ्जोद रहा है उसे आराधक मान लूं वह तो वोट को हाथ जोड़ रहा है 

Monday, 5 September 2016

खाली हाथ


 भारतीय संस्कृति में जीवन में सोलह संस्कार मनाये जाते हैं अर्थात सोलह बार परिवारीजन उसको होने का एहसास और वे हैं उसके लिये अभिव्यक्त करते रहते हैं कि आप हमारे हैं । भरतीय संसक्ृति में उत्सव त्यौहार और संस्कार सबका नियमन केवल पारिवारिक रिश्तों को एक दूसरे को जोड़े रक्षने के लिये हैं और इसमें विवाह सर्वाघिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यह जीवन का एक ऐसा मोड़ है जहॉं जिन्दगी बदल जाती है नये जीवन का आरम्भ होता है इसके लिये जन्मदाता भी अपने जीवन की संचित पूंजी न्यौछावर कर देते हैं
एक पुत्री का पिता धन जोड़ता है कि बेटी को अच्छे सुपात्र को सौंपे और सुखमय जीवन हो इसके निये अपनी निधि अर्पण करता है मॉं भी बेटी के लिये जोड़ जोछ़कर रखती है । अगर नये गहने न गड़वा सके तो अपने गहने देदेती है और अपने खाली होने पर भी उसे संतोष रहता है कि बेटी को दिये ।यदि बेटी का पिता समर्थ है जो करोड़ों रूपये  विवाह में खर्च करता है । शाही खर्च कि दुनिया देखे कि कैसा विवाह किया है । लड़के वाला भी अपना वैभव दिखाने के लिये खर्च करता हैलेकिन जब करोड़ों फूंक कर कुछ ही दिन में बेटी वापस आजाती है और एक वाक्य बोल देती है कि मैं नहीं रह सकती ।या तब भी वर पक्ष असन्तुष्ट हे और दो प्राणी नयी जिन्दगी के लिये एक पथ पर जाने की जगह दो अलग अलग पथ पर चल पढ़ते हैं तो सर्वाधिक नुकसान किसका होता है । 

Sunday, 4 September 2016

याद आता है

 याद आ जाती हैं माँ की कसकर दो चोटी बनाकर रिबन का फूल बनाना। तरह-तरह की फ्रिल वाली फ्रांके बनाना फिर पहना कर अपनी बिटिया को निहार कर प्यार करना और काला टीका लगाना, वो ममता भरी आँखें मेरा हर जगह पीछा करती हैं वह ममता मुझे झकझोर देती हैं जब कि भागती-दौड़ती सी माँए शर्टस और टॉप पहने बेटियों को  सुबह से शाम ट्यूशन पर भेजती अपेन माथे के पसीने के पोंछती रहती हैं । ममता के लिये समय है ही नहीं। उनका प्यार बर्थडे विश करते केक काटने में और गिफ्ट देने में झलकता है । प्यार एक कर्तव्य का वेष बदल कर आया है न कि तीज का त्यौहार मनाने के लिए बिटिया की हथेली को चूमती उस पर मेंहदी काढ़ती माँ । लंहगा-चुनरी पहना कर झूला आँगन में डालकर मॉं कजरी गाती तो कितना इठता इठला जाते। बार बार चिपका कर माँ गले में बांहे डाल लेती। पूरे सावन में आँगन के टट्टर पर पड़ा झूला हमारे अस्तित्व को स्वीकारता था। उस माँ की नरम-गरम गोद याद करते ।  पर कहाँ बन पाई वह माँ दो दो साल के बच्चों के मैंने भी भेज दिया था कान्वेंट में पढ़ने । जरा सा बड़ा होने पर चले गये बाहर फिर बाहर और बाहर, माँ होने का फर्ज निभाया है। दोनों सोये हुए बच्चों के माथे को चूमकर उस ममता को याद कर मेरा तकिया भीगने लगा है। 

Friday, 2 September 2016

सबको जीने का अधिकार होना चाहिए

क्या मानव होना सैक्स पर आधारित है त्र भारतीय संस्कृति में नर नारी किन्नर देव दनुज आदि मानवीय  आधार पर  विभाजित किये गये हैं या कर्म के आधार पर लेकिन किस आधार पर हम किन्नर या समलैंगिक आदि को समाज से बहिष्कृत करते हैं । उनमें मानवीयता नहीं है उन्हें छूत की बीमारी है उन्होंने दुष्कर्म किया है तब उन्हें बहिष्कृत करें हम निम्नस्तर तक गिरने वालों को आॅ।खें पर बिठाकर रखते हैं गरीबों के हक को खाने वालों को माननीय धोषित करते हैं और जो ईश्वरीय संरचना में कमी या कुछ व्यक्तिगत आदत वाले को बहिष्कृत करते हैं 
क्या सैक्स समाज का आधार है क्या किन्नर मानसिक विकलांग हैं जो समाज में रहने योग्य नहीं हैं ?तब दिन रात अखबारों में बलात्कार के केस आते हैं उन्हें हम सर्वोंच्च पद देदें और उनके पाॅंव पूजें कि आप जैसा कोई नहीं 
किन्नर समाज को क्यों हम केवल नाचने गाने के लिये मजबूर करते हैं उन्हें शिक्षा आदि देकर काम करने और समाज में उठने बैठने से रोका जाता है ।तब क्यों नहीं सभी कुंवारे साधु सन्यासी विधुर विधवा आदि को बहिष्कृत कर दिया जाता।किसी भी प्रकार के फार्म में सैक्स मेल या फीमेल के स्थान पर लिखा जाना चाहिये ‘क्या आप सैक्स करने में सक्षम है ं?’
अगर कोई भी मनुष्य मानसिक रूप् से ठीक है तो कोई भी वर्ण वर्ग जाति का हो उसे सामान्य जीवन जीने का अधिकार है आदर पूर्वक जीने का अधिकार 

Thursday, 1 September 2016

जी लेती हूँ

f चिप्स, कुरकुरे, पीज्जा, वर्गर के लिय माँ से जिद करते हैं तो मैं माँ से यादों में चिपक जाती हूँ दाल पीसती खाना बनाती माँ की पीठ पर लटकना फिर चुपचाप खटाई चीनी हथेली पर रख किसी कोने में छिप कर चाटना। वैसे दूसरी मंजिल का जीना इस सब कामों के लिये सुरक्षित था। कतारे, इमली, खट्टी-मीठी गोलियाँ यह छिपकर खाना हमारा मुख्य खाना होता। छुट्टियों में तो पेटों में जैसे भूत बैठ जाते जो भी घर में होता नहीं बचता डिब्बे के डिब्बे साफ होते। सारा दिन
धमा-चैकड़ी, बड़ा सा आंगन धूप हो या बारिश गरमी हो या सर्दी हम बच्चों के शोर से गुलजार रहता। जितनी महिलाएँ थी सब सब बच्चों की माँ थी कोई भी डांट जाता चिल्ला जाता खाने को पकड़ा जाता किसी भी का पल्ला खींच जो चाहते मांग लेते, याद आती है वो कई कई माँए और देखती हॅंू आज की माॅं बच्चे के मन पसंद खाने को भी लिये  उनके पीछे दौड़ती रहती हैं ।  

जी लेती हूँ

 जब कभी छोटे-छोेटे दोनों पोते-पोती ऊबकर अपने कम्प्यूटर केा बंद कर मोबाइल को एक तरफ फैक कर मेरे गले में बाहें डाल कर मेरे इधर-उधर लेट जाते हैं और कहते हैं दादी कोई कहानी सुनाओ ,जैसे अनेकों चाँद तारे मेरे सामने बैठ गये हों । पहुँच जाती हूँ अपनी दादी की दुनिया में, जब शाम झुकने लगती और जी लेती चाची, ताई, बुआ  और अपनी दादी की दुनिया। घर की महिलायें  रसोई के काम केा समाप्त कर मुँह हाथ धोने ,दिनभर के कामों की वजह से गंदलाए कपड़ों को बदलने अपने अपने कमरों में चली जाती । हम सब भाई-बहनें खाना खा चुकते दादाजी, बाबूजी, ताऊजी बड़े चाचा व्यापार आदि से वापस आयें तो घर की बहुएँ साफ सुथरी दिखें । थालियों में खाना खिलाते में सब वही बैठती थी और दादी केा घेर कर हम सब मुँह हथेली पर रख बैठ जाते,‘ दादी ! दादी कहानी सुनाओ।’ एक कहता दादी भूत वाली  तो एक दो सिकुड़ कर दादी से सट जाते कोई कहता परियों वाली और झट से सबके चेहरे पर जैसे चाँदनी नृत्य करने लगती।  ढिबरी की रोशनी ऊपर आले में जलती अपने घर को तो काला करती रहती पर हमारे चेहरों को रोशन करती रहती थी। अगर तिलस्मी कहानी होती या राक्षस की कहानी तो बस दादी की आवाज गूंजती और सब सिकुड़ते एक दूसरे से चिपके दादी के चेहरे को देखते रहते। वातावरण रहस्यमय और भी हो जाता यदि हवा से लौ काँप उठती कभी देर से लोटती चिड़िया चिचिया उठती तो सबके हाथ पैर सिकुड़ जाते पर नहीं दादी यही सुनाओ।
अपने पोते पोती को कहानी सुनाते चलती जाती हूँ उस रहस्यमय वातावरण में लेकिन उस जैसा वातावरण लाख कोशिश करने पर भी नहीं बना पाती। चंद लाइन बोल पाती हूँ कहानी का किरदार न अभी जंगल पहुँच पाया न पहाड़ी पर वह सो जाते पर मेरी दादी के किरदार न जाने कितने राक्षस कितने सिर वाले सर्पों को मारता जाता किर्रकिर्र करता दरवाजा खुलता। चीखते गि( निकलता। छोटे से छोटा बच्चा भी नहीं सोता था कथा खत्म होने लगती छोटे-छोटे बच्चे एक एक कर वही लुढ़कने लगते तो माँए दूध लेकर आ जाती । दूध के गिलास सबको देकर छोटे बच्चों को ले जाती और बड़े वहीं दादी के बड़े से तख्त पर लेटने लगते कोई भी ताई, चाची, माँ आती सबको चादर आदि ओढ़ा जाती और बच्चे सपनीली दुनिया में परियोँ के साथ नाचते तलवार लेकर राक्षसों का संहार करते जाते कहानी सुनाते-सुनाते में उस दादी को जीने लगती हूँ।