एक समय आता है जब हम अपने ऊपर से बड़ों के साये को झटक देते हैं और अपने फैसले अपने आप लेने लगते हैं तब अपनी सब बातों के हारजीत के सफलता के असफलता के स्वयं जिम्मेदार होते हैं।पर बहुत बार हम उसके जिम्मेदार स्वयं को नहीं और को मानते हैं,परंतु सफलता में वे अपनी मेहनत अपनी कुशलता को ही श्रेय देते हैं तब समाज,माता पिता भाई बहन, कहीं नहीं होते । अगर कहीं कुछ गलत हो रहा होता है तो उसकी जिम्मेदारी औरों की हो जाती है । नहीं मैं गेम खेलना नहीं छोड़ सकता,मुझे भी कुछ मनोरंजन चाहिये । उससे मेरा दिमाग फ्रैश हो जाता है। स्किल चाहिए उसके लिए भी ।कोई भी कार्य न कर पाने के लिए औरों पर छोड़ने के लिए बहुत विकल्प हैं ‘क्या करूं मै। चाहता तो बहुत था पर परिस्थिति नहीं बन पाई,अगर सब ठीक रहता तो देखते मैं क्या कर देता। बॉस बार बार टोकते थे नही ंतो एक से एक बढ़िया प्रोजेक्ट बनाता आदि आदि
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