Monday, 13 May 2024

kirch kirch batene

 ☺झूम झूम कर नृत्य कर गीत गा रहा था भगवान् तेरे

नीचे गड्ढ़ा आ गया तो मुॅह से निकल हत तेरे।


☺भूखे पेट में अग्नि इस कदर घधकती है कि

कड़कड़ाते जाड़े में भी आसमान की चादर ओढ़ कर सो जाते हैं

☺अर्न्तघ्वनि

सिलैंडर से लगी आग पन्द्रह बचे ( मरे नहीं बच गये यह भी कोई बात हुई सब मरते )


☺हर व्यक्ति वर्तमान व्यवस्था से व्यथित है उसे बदलना चाहता है इसलिए सत्ता मैं आना चाहता है और सत्ता मैं आते ही वह बदल जाता है उसके हालात बदल जाते हैं

☺मंा की सबको फिक्र है क्योंकि मां चौकी दार है रसोई दारिन है नर्स है और खुद के लिये कुछ नहीं हैे

☺मंा वह चीज है जिसका मूल्यांकन मरने के बाद भी नहीं होता ।


Saturday, 11 May 2024

maa ka janm din

 मॉं का जन्मदिन

विदेश में बसे बच्चों ने  मां का जन्मदिन मनाया । बड़ा सा केक काटा और स्वदेश में अकेली बैठी मां को फोन किया ,‘मां, हम तुम्हारा जन्मदिन मना रहे हैं,  मॉं आप टैब चलाना जानतीं तो दिखाते।’ फोन पर माँ को सुनाया ,‘माँ हैप्पी वर्थ डे टू यू ’सबने मिल कर गाया । सुन सुन कर कल्पना कर रही माँ प्रसन्न थी , आर्शीवाद दे रही थी ,कितना ख्याल रखते हैं बच्चे, और बच्चे केक के साथ स्वादिष्ट खाना खाते कह रहे थे ,‘माँ बहुत बढ़िया खाना है ’ बच्चे तृप्ति से खा रहे  हैं ,मॉं प्रसन्न थी , और माँ सुबह की सब्जी से रोटी  खा, आशीष देती अकेली सो गई।


Friday, 10 May 2024

Mothers'day par maa kavitayen

 मॉं   

   माँ 

   मैं रोता सुबकता

   छिप जाताा था तेरे आंचल के साये में

   सो जाता था निश्चिन्त

   विलय हो जाता था मेरा आस्तित्व

   तेरी गोद के आश्रय में

   लगता है नितांत एकाकी हो गया हूँ

   उस साये के हट जाने के बाद


    द्वार पर बैठी ताकती रहती थी

    दो आंखंे मेरे आने की राह

    सुई का सरकता कांटा

    टिकटिका देता  था उसकी धड़कन

    आकुल प्राणों को मिल जाती थी राहत

    मेरी झलक मात्र से

    अब उन आंखों को ढूढ़ता हूँ

    उन आंखों के बंद हो जाने के बाद


    कितने साये चलते फिरते

    सरकते थे चारो ओर

    एक ही छत के नीचे

    हमारे दुःखों में खड़ी रहती थी

    एक स्तभ्म की तरह

    ठंडी छत का एहसास रहता था

    तपती  धुप में खड़े हैं

    उस छत के हट जाने के बाद  

   

    तेरा थाली लेकर बैठना, 

    उबा देता था मुझको 

    क्यों जागती है मेरे लिये

    झंुुझला देता था मुझको,         

    अपराध से भर उठता था मन 

    जब रात में सेकती गर्म रोटियाँ

    बहुत याद आती है वे 

    ममता भरी रोटियॉं, 

    उन रोटियों के ठंडी हो जाने के बाद।


   पहचान लेती थी, 

   मेरे हर कदम की चाप से

   कैसा हूँ मै  कैसा बीता है दिन

   झिझकते हुए सहला देती थी 

   चुपचाप धीरे से सिर 

   आंखें मेरी चिंता से जाती थी घिर

   बहुत याद आते हैं वे नरम गरम हाथ  

   उन हाथों के ठंडे हो जाने के बाद























2

मुझे मालुम है मां


मुझे मालुम है माँ तू बहुत रोई होगी

मेरे घर से चले जाने के बाद

मुझे मालुम हैं माँ काँप जाते होंगे तेरे हाथ

मेरे मन की चीज बनाने के बाद

नही चल पाता होगा कौर तेरे मुख में

खिसका देती होगी थाली आंसुओं के बहने के बाद


रोशनदान पर जब चिड़िया ने तिनके सजाये होंगे

छोटे छोटे से कोमल बच्चों को देखा होगा

मुँह में दाना लाकर डालती होगी दाना

उड़ना सिखाते ही हो गया होगा घांेसला खाली

मैं जानता हूँ माँ तू बहुत रोई होगी उनके उड़ जाने के बाद


मैंने देखी है तस्वीर के पीछे दो छोटे हाथो की छाप

सफाई के बाद भी तूने वह तस्वीर नहीं उतारी

मैंने चूमते देखा है उन नन्हीं छापों को

मेरे बड़े हो जाने के बाद

मुझे मालुम है तू बहुत रोई होगी छूकर उन छापों को 

मेरे जाने के बाद














3


माँ तू चली गई


सूना घर आंगन है अब

ममता चली गई


तेरी गोद़ी में सर रख

कभी कभी सो जाता था

जैसे दुनिया के सब दुःख से

दूर बहुत हो जाता था।


वर्षा की बूंदों की टपटप

सुनकर बाहर जाता था

भीग न जाऊँ इस डर आंचल

बनता सिर पर छाता था


देर अगर हो जाये जरा भी

दरवाजे पर आ जाती थी

सारे देवी देव मनाकर

मेरी खैर मनाती थी


बस मैं खा लू सारी दुनिया

तब खाना खा लेती थी

कितनी भी खालूं मैं तब भी

थाली भरती जाती थी


जाने कैसे सुन लेती थी

हल्की सी मेरी आहट

जाने कैसे पढ़ लेती थी

मेरे मन की हर चाहत


छींक अगर आ जाये जरा भी

उसका दिल घक धक करता था

नजर लगाई किसी बला ने

राई नॉन उतरता था।



4


माँ बड़ी प्यारी है


कहने को माँ बड़ी प्यारी है

ईश्वर का रूप दुनिया में न्यारी है


बूढ़ी होने पर माँ नहीं सुहाती

पत्नी ही अच्छी जब घर में आ जाती

उसकी ही आवाज अच्छी लगती है

माँ तो करेले का साग लगती है

सुबह दिख जाये तो दिन भारी है

कहने को माँ बड़ी प्यारी है।


घर को सबने बाँट लिया

अच्छा अच्छा छाँट लिया

माँ केा सबने छोड़ दिया

उससे मुँह को मोड़ लिया

बूढ़ी माँ केवल जिम्मेदारी है

कहने को माँ बड़ी प्यारी है।


माँ  बस तभी याद आती है

तस्वीर पर माला चढ़ जाती है

जब तक माँ प्यार से पकाती रही

तब तक घर में सुहाती रही

बूढ़ी माँ की एक रोटी भी भारी है

कहने को माँ बड़ी प्यारी है।


जिस बेटे का मुँह देख जीती थी माँ

जो था उसकी आंख का तारा

सारी दुनिया में केवल वही था वही

बुढ़ापे में उसने माँ को दुतकारा

माँ दुनिया में बस बेटे से हारी है

कहने को माँ बड़ी प्यारी है।







5


माँ तो चली गई



माँ तो चली गई दुनिया से

छोड़ गई सब कपड़े गहने

एक एक ईटों को बांटा

बांट लिये आभूषण सबने

प्यार दुलार नेह ममता की

साथ ले गई छाया अपने

हम बच्चों के हित में बांधे

पुड़िया पुड़िया कितने सपने

सारा तम आंचल में बांधा

चाँद सितारे टांगे कितने

माँ का आंचल ठंडक देता

धूप दुपहरी लगती तपने

माँ की गोदी गरमी देती

शीत लहर से लगते कपने

हाड़ कांपते माँ के अपने

लेकिन गोद गर्म होती है

बालक को गोदी में लेकर

माँ कपती कपती सोती है।

माँ तो इक बहती नदिया है

दर्द बहा ले जाती है

ममता की लहरों के संग संग

भीगा तन मन दे जाती है

माँ का एक शब्द ही केवल

धर्मग्रन्थ बन जाता है

आशीष भरा हाथ हो सर पर

सारा जीवन तर जाता है

माँ का जीवन गहरा सागर

दर्द तहों में दब जाता है

केवल प्यार झलकता चेहरा

लहरों के संग आ जाता है

माँ की पहनी धोती छटकर

मेरे हिस्से आई

माँ के तन की खुशबू सारी

मैंने उनमें पाई

भीग गई आंखे पा माँ को

तन से उन्हें लगाई

इसी रूप में माँ तू मेरे

पास सदा को आई

आंचल का सा साया लगता

मेरे सिर पर छाया

माँ की ममता नेह प्यार सब

मुझमें आ के समाया।
















डा॰ शशि गोयल

सप्तऋषि अपार्टमेंट

जी -9 ब्लॉक -3  सैक्टर 16 बी

आवास विकास योजना, सिकन्दरा

आगरा 282010 ॰9319943446

म्उंपस दृ ेींेीपहवलंस3/हउंपसण्बवउ








मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार

दुः.ख ने दुःख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार

 इस तरह मेरे गुनाहों को धो देती है 

मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है

अभी जिन्दा है मां मुझे कुद नहीं होगा

मैं घर से चलता हूं दुआ साथ चलती है

सारे रिष्ते जेठ दुपहरी गर्म हवा आतिष अंगारे 

झरना दरिया झील समंदर झीनी सी पुरवाई अम्मा

घर के झीने रिष्ते मैंने लाखों बार उघड़ते देचो 

चुपके चुपें कर देती जाने कब तुरपाई अम्मा










cheen ke ve das din

 जीवन ही अनवरत यात्रा हैण् कहते है चौसठ लाख योनियों के बाद मनुष्य जन्म मिलता है जन्मसे जन्म की यात्रा बचपन से बुढ़ापे की यात्राए अर्न्तयात्रा यह चलती रहती हैं निरंतर चलती है इस यात्रा में कही भी पलभर रुकने कीए ठहरने की गुंजाइश नही है इस यात्रा के पलों को और यादों से सजा दे। धरती के अनेक रूप उसके रूपों को देखना जैसे ईश्वर के स्वरूप को देखना कैसी अदभुत रचना है कहीं समुंदर है तो कहीं ऊँचे पहाड़ कहने को समुंदर समुंदर है पर एक रंग रूप प्रकृति नहींए उसके भी अपने रूप हैं पहाड़ों पर कहीं सूरज पल पर ठहरा है तो कहीं उसकी चोटी पर बैठा चकित सा देख रहा है कि किधर जाऊँ कहीं हरियाली तो कहीं झरनेए नदी उनके साथ.साथ अपने पॉव जो छाप छोड़ते जाते हैं और यात्रियों के लिये प्रकृति से तादात्म्य होगी उसकी मनोहारी छटा के रस से सराबोर होंगे वे चलते.चलते जीवन के दर्शन का साकार करेंगे कुछ छुटेगा तो आगे नया मिलेगा कभी ऊँचे किले जो अब वीरान हैं तो कहीं बड़े बड़े महल जिनमें आज भी पुराने स्मृति चित्र शेष हैं। उनके साथ उस समय को जीवन में लौट जाते हैं कैसी थी उस समय की संस्कृति सभ्यता। यात्रा संस्कृति की यात्रा बन जाती है।

यात्रा के साथ जीवन के अनेक रूप साथ चलते है अनेक जीवन साथ चलते हैं या दिन जीवन यात्रा के पड़ाव होते है।

हम चौदह यात्री चौदह रंग सबका अलग स्वभाव अलग पसंद पर उस समय सब एक थे एक स्वर सबकी बातों में झलक रहा था।

स्व॰डॉ॰ मनोरमा शर्मा के नेतृत्व में हम बिना किसी भय के घूम रहे थे जैसे अपने शहर में घूम रहे हो वतन से दूर अपने.अपने घर से अकेले आये हैं यह ऐहसास ही नहीं था लग रहा हैं सभा से उठकर सब चल दिये हों साथ में अरस्तू और शशांक प्रभाकर थे ही अगर कुछ भागदौड़ करनी हुई तो है हमें क्या करना है हम सबको तो बस पीछे.पीछे चलना है कहां जाना है कहां ठहरना है क्या लेना है क्या देना है इससे हमें कोई मतलब नहीं सब कुछ हाजिर। श्रीमती किरन महाजनए डॉ॰शैलबालाए डॉ॰ राजकुमारी शर्मा जैसे मित्र। शायद जिंदगी में इतना कभी नहीं हंसे होंगे जो चारों मिलकर हंसते रहते विशेष एक दूसरे की टांग ही खींचते रहते। संभवतः चाय की केतली का बटन दबाने में एक प्रतिशत कष्ट होात नब्बे प्रतिशत कष्ट इस बात के लिए कर लेते कहां है किरन भाभी चाय का मन है ढूँढ़ कर लाओ। सबसे अधिक मजा सबके खाने के समान के डिब्बों को खाली करने में आता था। डॉ॰ चित्रलेखा सिंहए डॉ॰ सरोज भार्गवए वंदना सकारिया झुककर आगे हो पीछे हो फोटोग्राफी ही करती चल रही थी शायद चीन का हर फूल हर कलात्मक वस्तु उनके कैमरे में कैद हो गई थी। उनका कैमरा पूरा चीन कैद कर लाया था। योग प्रशिक्षक नंदनी ने इतने दिन में सबको योग कौशल सिखा दिया उस समय तो सब यही सोच रहे थे कि अब प्रतिदिन योग करके अपने शरीर में फुर्तीला चुस्त बनायेंगे अब कितने संकल्प पूरे होते है कितने करते हैं यह तो दूध का ऊफान है घर पहुँचते ही ठंडा सब वहीं का वहीं ओशो तो सबका बच्चा था  सबका मातृत्व तृप्ति पा रहा था सबसे पहले उसे ही देखा जाता कहाँ है क्या खाया क्या पिया ठीक है अच्छा लग रहा है। रजनी जी मस्त मस्त सबके साथ थीं ही ऐसी यात्रा भुलाई नहीं जाती हो सकता है चीन का चमकदार रंग फीका पड़ जाय पर सहयात्रियों के साथ बिताये पल कभी नहीं स्मृति पटल से जायेंगे।

naya jeevan purtgali kahani

 पुर्तगाली कहानी

नया जीवन

एक धनी किसान के दो पुत्र थे। छोटा पुत्र पिता के कठोर अनुशासन से घबड़ाता था। उसे हाथ खोलकर खर्च करने का शौक था। वह समझता पिता उस के पास इतना धन है पर वो हम पर खर्च करना नहीं चाहते। वह प्रतिदिन पिता से झगड़ा करता। एक दिन उसने पिता से कहा, पिता् मुझे मेरा हिस्सा दे दो। मैं अपना जीवन अपने ढंग से निर्वाह करूँगा।

पिता ने सारा धन दो हिस्सें में बाँट दिया। छोटा पुत्र अपने हिस्से का धन लेकर विदेश चला गया। धनी व्यक्ति को देखकर अनेकों चापलूस उसके साथ मिल गये और सारा धन शौक मौज में खत्म कर दिया। शीघ्र ही वह बहुत गरीब हो गया। यहाँ तक कि उसे नौकरी करके पेट पालना पड रहा था। उसने सूअर चराने की नौकरी की। कभी कभी भूख से व्याकुल वह सूअरों के लिये बनाया खाना भी खा जाता था।

जब बहुत परेशान और दुःखी हो गया तो उसने सोचा मेरे पिता के यहाँ तो बहुत से नौकर हैं और बहुत अच्छा खाते पीते हैं। मैं यहाँ भूखों मर रहा हूँ क्यों न पिता के घर जाकर नौकरी कर लूँ। जाकर पिता से कहूँगा मैंने आपके और भगवान के प्रति गुनाह किया है ,मुझे माफ कर दीजिये तो अवश्य पिता मुझे माफ कर देंगे और मैं कहूँगा कि मुझे अपने नौकरों की तरह ही रख लीजिये।

वह वापस पिता के घर पहुँचा। लेकिन जब उसके पिता ने उसे देखा तो दूर से ही दौड़ कर उससे गले मिले। पुत्र ने पिता के गले में बांहें डाल दी और रोते हुए बोला, पिता मैंने पाप किया है, मैं आपका पुत्र कहलाने लायक नहीं हूँ। आप मुझे अपने यहाँ नौकर बना कर रख लीजिये।

लेकिन पिता ने नौकरों को बुलाकर अच्छे वस्त्र मंगाये," मेरे पुत्र के लिये सर्वोत्तम वस्त्र लाकर पहनाओं। उसके हाथों में अंगूठियाँ पहनाओ और पैरों में कीमती जूते। आज हम अपने पुत्र की वापसी का जश्न मनायेंगे क्योंकि अब तक वह मृत था अब जीवित हो गया है वह खो गया था ,अब फिर से मिल गया है।

पुत्र पश्चाताप की अग्नि में जलता पिता के पैरों पर गिर पड़ा।


Wednesday, 8 May 2024

paheliyan

 

igsfy;k¡

      

 

 

 

                ,d fcjN gS Fkkid FkS;k

        iÙkk gS tatkyh

        xqfN;u Qj yxrs ehBs

        tkuks ehr xqikyh                                                       dsyk

 

 

        ,d ukj ds >qEed >wed

        lax gok ds Mksys

        rfud b'kkjs ij #d tk;s

        VsaV rqEgkjh [kksys                                                       rjktw

 

 

     

 

 

       ,d iSj gS lcjax /kksrh

       tkM+s esa gw¡ gjne lksrh

       xehZ eas gw¡ Nk;k nsrh     

       o"kkZ eas gw¡ gjne jksrh                                                Nrjh

 

 

 

       ,d liZ dh xtc dgkuh

       ehyksa yEch dk;k

       cgrk mlesa xank ikuh

       cPpks le> esa vk;k                                                           µukyh

 

 

 

       ,sls rks og cksy u cksys

       Qwadks dku rHkh og cksys                                                      µckalqjh

 

 

 

        

              1    xksy xksy dkyh esa jkuh

             igu dku esa ckyk

             gyqvk xje dpkSM+h iwjh

             lnk f[kykÅ¡ ykyk

             eFkqjk okyh pkV fujkyh

             ryrh gw¡ Hkj Bsyk

             uke crkvks esjk I;kjs

             xq# dgw¡ ;k psyk                                                               

 

       2   cpiu gjk cq<+kik yky

           tks Hkh [kk;s og csgky

           uke crkvks ckcw yky

           gks tkvksxs ekykeky                                                               

 

       3   fcuk iSj ds vkrh

           lq[k dh [kcj lqukrh

           dHkh dHkh nq%[k Hkh ns nsrh

           nke u dksbZ ysrh                                                            

 

 

       4   cj[kk lnhZ /kwi iM+h gks

           iFk esa iRFkj dhy xM+h gks

           bu lcls esa rqEgsa cpkÅ¡

           fQj Hkh gj fnu jxM+k tkÅ¡                                                         

 

       5   Å¡V tSlh cSBd

           e`x tSlh pky

           ,d tkuoj ,slk

           iwaN u ckds cky  

                                                         

       6      ,d uxj esa pkyhl pksj

              lcdk gS flj dkyk

              dku idM+ dj jxM+ fn;k

               rks gks x;k mtkyk                                                              

 

1 d<+kgh   2 fepZ 3 fpB~Bh4  twr  k5 esa<d6 ekfpl

 

 

 

 

 

Station mahila shochalay

 स्टेशन महिला शौचालय

मैं आगरा से भोपाल झेलम एक्सप्रेस से जा रही थी। साथ में कुछ छात्र केन्द्रीय हिंदी संस्थान के विदेशी छात्र झांसी घूमने जा रहे थे। एसी कोच के साथ समस्या रहती है झांक कर शीशे में से स्थान देखना पड़ता है। छात्रों के साथ दो शिक्षक भी थे। टेªन दस दस मिनट कर काफी देरी से चल रही थी इसलिये स्टेशन नियत समय पर ही आ रहे थें शिक्षक हर स्टेशन झांक कर देख लेते थे। ग्वालियर पर गाड़ी रुकी तो शिक्षक ने एक छात्र से कहा देखों। कौन सा स्टेशन है। छात्रा ने शीशे में से झांका। सामने लिखे को पड़ा और बोली, सर महिला शौचालय आया है। 

मैंने खिड़की से देखा सामने ही महिला शौचालय था हंसते हंसते दम निकलने लगा जब तक वह लड़के दिखते हंसी छूट जाती।

वे हिंदी सीखने आये थे अभी वर्णमाला और जोड़ जोड़ कर पढ़ना ही सीखा था। अटक अटक कर विदेशी उच्चारण से हिंदी बोलने की कोशिश कर रहे थे।

डॉ॰ शशि गोयल