Sunday, 2 October 2022

ese the bapu

 ऐसे थे हमारे बापू


उन दिनों बापू बिहार के चंपारण जिले में थे ,आंदोलन अपने चरम पर था । बापू के पास   वाइसराय की  खबर आई कि षीध्र मिलें क्योंकि बात बहुत आवष्यकत है इसलिये हवाई  जहाज से आजायें  बापू ने कहा हवाई जहाज में भारत के   करोडों़ गरीब यात्रा नहीं कर सकते  तो वे कैसे सफर करेंगे, वे रेल मार्गं से ही  आयंेगे ।

गाॅधी जी ने मनु से यात्रा के लिये आवष्यक सामान लेकर रेल के तीसरे दर्ज का इतंजाम करनेके लिये कहा  साथ  ही   मनु बहन से कहा कि सामान कम लेना और तीसरे दर्जे का छोटा  डिब्बा लेना।

मनु बहन ने  डिब्बा तो छोटा चुना लेकिन वह दो भाग का था । एक में बापू के सोने का  इंतजाम था और दूसरे में सामान मनु बहन जानती थी कि जिसे भी पता चलेगा बापू वहाॅ से  गुजर रहे है लोगों की भीड़ होगी इसलिये बापू को असुविधा होगी ऊपर से खाना भी तैयार करना होता था।

पटना से रेल प्रातः 8 बजे रवाना हुई मार्च का महिना था । बापू 9 बजे भोजन करते  थे मनु बहन दूसरे डिब्बे खाना तैयार करने के बाद उस डिब्बे में आई जहाॅ बापू  बैठे थे वे कुछ लिख रहे थे बापू ने मनु बहिन से पूछा ,‘ कहाॅ थीं।’

‘दूसरे डिब्बे में खाना तैयार कर रही थी,’ ‘  जरा खिडकी से बाहर झांको ’ मनु बहन ने झांका तो देखा कई लोग दरवाजे के डंडे को पकड कर लटक रहे हैं । बापू ने मनु बहन को झिड़कते कहा,‘ इस दूसरे कमरे को तुमने कहा था ’मनु बहन बोली,‘ हाॅ मैंने सोचा यहीं खाना वगैरह बनेगा तो  आपको दिक्कत होगी।’

‘इसे कहते हैं ’’अन्धा प्रेम’’,’ बापू ने कहा ,‘तुम सैलून भी मांगती मिल जाता पर क्या षोभा देता है दूसरा कमरा भी सैलून के बराबर हो गया।’’

मनु बहन की आँखों से आंसू टपक पडे यह देखकर बापू बोले ’’अगर बात समझ रही हो तो ये आंसू मत टपकाओ, अगले स्टेषन पर स्टेषन मास्टर को बुलाना और सारा सामान यहीं लेआना’’।

मनु बहन ने सामान हटा लिया लेकिन मन नही मन घबरा रही थी कहीं बापू उपवास न कर बैठें उसकी भूल को वो अपनी भूल मान लेते हैं।

स्टेषन आया स्टेषन मास्टर के आने पर बापू ने कहा ’’यह लडकी मेरी पोती है भोली भाली है, इसे नहीं मालुम क्या करना है इसने दो कमरे ले लिये इसमें मेरा दोश है ,कहीं मेरी सीख में ही कोई कमी है पर अब दूसरा कमरा खाली कर दिया है बाहर जो लोग लटक रहे हैं उन्हें बैठाइये।’’

स्टेषन मास्टर ने कहा कि बापू परेषान न हों जो लटक रहे हैं उनके लिये दूसरा डिब्बा लग जायेगा।

बापू ने कहा ’’डिब्बा तो जरूरत है तो जरूर लगवाइये पर हमें भी जितनी जगह जरूरी है उतनी ही चाहिये बाकी आप उपयोग में लाइये।’’

जब बाहर लटकते लोग बैठ गये तब बापू चैन से बैठे।बात 1909 की है बापू अफ्रीका में थे वे गोरों के विरूð लड रहे थे उनका यष चारों और फैल गया था उनका  नाम बहुत आदर से लिया जाता था इसी प्रसंग में वे लन्दन गये वहाँ भारत की आजादी के लिये अनेक नवयुवक आगे बढ रहे थे उनमें सावरकर भी थे। सावरकर को ज्ञात हुआ कि गाँधी जी लन्दन में हैं उनहीं दिनों भारत के कुछ प्रमुख नेता भी लंदन में थे। उन नवयुवकों ने एक समा बुलाने का निष्चय किया और उसके लिये गाँधी जी को सभपति बनाया सभा  करने के लिये एक खुले स्थान का चयन किया गया जहाँ पहले सभी के लिये भोजन उसके बाद सभा का आयोजन था।

हर प्रंात के युवक वहाँ जुड़ने लगे ,आते और कोई न कोई काम अपने हाथ में ले लेते कोई झाडू लगा रहा था  कोई सब्जी साफ कर रहा था कोई काट रहा था उन्हीं में एक दुबला पतला हिन्दुस्तानी बैठकर सब्जियाँ काटने लगा। सभी हिन्दुस्तानी भारत के अलग-अलग राज्यों के थे कोई पहचानता नहीं था पर काम में लगे थे सब।

       दोपहर का खाना बनते खाते षाम हो गई वह दुबला पता हिन्दुस्तान थालियाँ साफ करने लगा। आखिर में सभा के उपप्रधान वहाँ आये उनकी नजर उस दुबले पतले हिन्दुस्तानी पर पडी वे चैंक पडे और आंखे फाड़ कर उस हिन्दुस्तानी को देखने लगे तो आसपास के नवयुवकों ने उपप्रधान से पूछा कौन हैं ये, क्यों?’

धीरे से उपप्रधान बोले,‘ गाँधी जी,’ एकदम से वह हाॅल भ्न भननाहट से गूॅज उठा,‘ गाॅधी जी गाॅधी जी’’

‘गाॅधी जी तो हमारे सभपति हैं वे यहाॅ ’सारे युवक दंग रह गये कोई उनके हाथ से थाली लेने लगा कोई जूना पर गांधी जी ने बराबर सबके साथ काम किया फिर सभापति बनकर भाशण दिया।.       .   .

आश्रमों में बापू का नियम था कि सब अपना काम अपने आप करें या मिलकर करें पर कोई सेवादार नहीं होगा। कोचरब आश्रम में भी सब काम अपने आप ही करते थे। आश्रम के लिये पानी भी कुएॅ से लाया जाता था कुॅआ सडक के दूसरी तरफ था पानी वहीं से भरकर लाया जाता था।

एक रात बापू को काम करते देर हो गई। सुबह नियमित समय पर उठकर आटा पीसने लगे पानी भरने का समय हुआ तब उस समय गाॅधी थकान महसूस कर रहे थे। साथ ही उनके सिर में दर्द भी होने लगाा।

आश्रम के लोगोें ने बापू से कहा कि अब बहुत काम कर लिया वे आराम करें पानी वे भर लेगें। लेकिन बापू  कुॅए पर पहुॅच गये और घड़ा मांगने लगे । एक भाई आश्रम से छोटे-छोटे बरतन उठा लाया और छोटे बालकों को बुला  लाया छोटे-छोटे बरतन बालकों को पकडा देते वे दौडकर आश्रम में बडे़ बरतन में डाल आते बापू की बारी वे भाई आने ही नही दे रहे थे बच्चे भी यह समझ गये थे कि बापू से इस समय वे काम नहीं कराना चाह रहे हैं तो पहले खड़े हो जाते और बापू की बारी से पहले ही बरतन हाथ में ले लेते।

   पर बापू भी कहाॅ मानने वाले थे वे आश्रम में कोई बरतन देखने लगे उन्हें कोई बरतन नहीं दिखा बच्चों को नहलाने का टब रखा था वे ही उठा लाये और उसे लेकर खडे हो गये भर दो इसे।’’

’’पानी खींचने वाले भाई अचकचा गये इसे कैसे उठायेगें उठा लूॅगा भर दो इसे’’।

वह व्यक्ति समझ गया बापू नहीं मानेगें। चुपचाप उन्हें घड़ा पकडा दिया।

बापू नोआखली में गली-गली घूम रहे थे। नोआखली की गलियाॅ बहुत संकरी थी साथ ही साथ गंदी भी बहुत  थी जगह-जगह नाक थूक मल पड़ा रहता था। बापू नंगे पैर चलते थे उन्हें देख देखकर बहुत दुःख हो रहा था। एक जगह चलते चलते एकदम रुके आस पास से पत्ते उठाये और बीच राह में पडे मल को उठाकर फेंक दिया।

मनु बहन पीछे-पीछे चल रही थी वह अचकचा कर बोली बापू क्यों षर्मिन्दा करते हैं मैं उठा देती खुद ही क्यों  साफ किया।’’  ‘क्यों मैंने कर दिया तो ,बापू नेकहा’’ कहने की बजाय खुद करने में  कुछ तकलीफ है’’? मनु बहन ने कहा ,‘अब इतने गाॅव वाले देख रहे हैं।’’

बापू बोले ,‘यह तो और भी अच्छा है इन लोगों को सबक मिलेगा ,देखना कल मुझे ये काम नहीं करने पडेगें।’’

‘हो सकता है केवल कल गाॅव वाले रास्ता साफ कर दें फिर न करें तब।’’

‘तब फिर तुम्हें देखने भेज दूंगा और अगर रास्ता गंदा मिला तो साफ कर जाऊँगा।’

दूसरे दिन बापू ने वास्तव में मनु बहन को रास्ता देखने भेजा। रास्ता गंदा ही था मनु बहन खुद ही रास्ता साफ  करने लगी गाॅव वालों ने देखा और बहुत षर्मिन्दा हुए और सबने मिलकर रास्ता साफ कर दिया और मनु बहन को बचन दिया कि आगे वे हमेेषा सड़कें साफ रखंेगें।

लौटकर मनु बहन ने गाॅधी जी को पूरा वर्णन बताया तो बापू बोले,‘ अरे तुमने पुण्य ले लिये यह तो मुझे करना  था चलो दो काम हुए एक तो अब सफाई रखेगें। दूसरा देखते हैं वचन निभाते हैं कि नहीं।’

सबका हिस्सा


सन् 1916 की बात है। लखनऊ में कांग्रेस का महाअधिवेशन था। गांधी जी उसमें सम्मलित होने आये थे। चम्पारन जिले में बहुत गरीबी हैं एवम् लोगों को बहुत कष्ट हैं जानकर गांधीजी चम्पारन पहुँचे। साथ में कस्तूर बा भी थीं राजकुमार शुल्क ने वहाँ के लोगों की कष्ट गाथा गांधीजी केा सुनाई। कस्तूबा घर घर जाकर वहाँ की औरतों से मिलने लगी। 

एक दिन कस्तूबा भितिहरवा गाँव में गयी। वहाँ किसान औरतों के कपड़े बहुत गंदे थे। बा ने औरतों को समझाया कि गंदगी से तरह-तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं इसलिये सफाई आवश्यक है।

इस पर एक गरीब किसान औरत, जिसके कपड़े बहुत गंदे थे, कस्तूरबा को अपनी झोंपड़ी मेें ले गयी और अपनी झांेपड़ी दिखला कर बोली ,‘माँ हम बहुत गरीब है हमारे घर में कुछ नहीं है। बस एक यही धोती है जो मेरी देह पर है,क्या पहनकर इस धोती का धोऊँ। अगर गांधी जी से कहकर मुझे एक धोती दिलवा दे तो में धोती साफ रखूँ।’

गांधीजी यह बात सुनकर सोच में पड़ गये। गरीबी की अति से वह अवाक् रह गये थे। उन्होंने सोचा लोगोे के पास तन ढकने के लिए पूरे कपड़े नहीं हैं और हम धोती, चादर कुर्ता, बनियान इतने कपड़े पहनते हैं। जब सबके पास कपड़े नहीं है तो हमें इतने कपड़े पहनने का क्या अधिकार है। 

बस गांधीजी ने उसी दिन से केवल लंगोटी पहनकर तन ढकने की प्रतिज्ञा कर ली।




डाॅ॰ शशि गोयल

3.28ए/2, जवाहरनगर रोड 

खंदारी चैराहा, आगरा-282008








Tuesday, 30 August 2022

chitthi

 


मां 

एक समय आता है जब कोई हमें टोकता है रोकता है तो हमें बुरा लगता है। हम अपने केा इतना बड़ा और समझदार समझने लगते हैं कि हमें किसी का भी कुछ हमारे लिये करना एहसान लगता है। लेकिन वह एहसान  सा समझी जाने वाली भाषा कितनी प्यारी हो जाती है तब वो नहीं रहती ।

लक्ष्मी

हर कोई चाहता है उसके पास अपार दौलत हो समृद्धि हो। इसके लिये सारे प्रयत्न करता है। यहां तक कि टोने टोटके भी । कितनी ही पूजा धन की प्राप्ति के लिये लक्ष्मी जी की की जाती हैं। लेकिन कभी विष्णुजी की व्यथा भी समझी है ?

चिट्ठी

एक लड़की घर छोड़ देती है तब वह अपने पीछे न जाने कितनी निषानियां छोड़ जाती है जिन्हें पीछे से विदा करने वाले सहेजते रहते हैं। अब चिट्ठियां नहीं लिखी जाती बातें फोन पर हो जाती हे लेकिन पहले लिखी चिट्ठियां कागज के नीचे आलमारी के अखबार के नीचे सा पुस्तक में मिल जाती हैं तब जीवन लौट आता है विषेष जब मां की चिट्ठी मिलती है ।


Friday, 26 August 2022

bheed

 आप भीड़ में जा रहे हैं या भाड़ में आपकी मनःस्थिति पर निर्भर करता है

आपकी ईमानदारी डिगती है कपड़े मंहगे हो जाते हैं, आप खुद सस्ते हो जाते हैं ।
भाग रहा है हर आदमी उधर ही जिधर भीड़ है फिर कहता है उफ किस कदर भीड़ है ।

Wednesday, 17 August 2022

Lottery

 लाटरी

रोमन सम्राट आगस्टस व नीरो ने निर्माण कार्य के खर्च के लिये लाटरी आरम्भ की। इंगलैंड की रानी ऐलिजाबेथ प्रथम ने लाटरी पर पुरस्कार की अनुमति दी थी। हमारे भारत में केरल के साम्यवादी मंत्रिमंडल ने लाटरी षुरू करके खूब पैसा कमाया है इसके पूर्व रूस की साम्यवादी सरकार ने दूसरे महायुद्ध का खर्च निकालने  के लिये लाटरी चलायी और एक लाख रूबल पुरस्कार की घोषणा की। भारत में ब्रिटिष राज्य में ही लाटरी का पा्ररम्भ हो चुका था। 1789 में पीटर मैसे कैसीन नामक व्यापारी ने स्टाॅक एक्सचेंज की इमारत बनवाने के लिये लाटरी की योजना सोची। उस समय स्टार पागोडा वाला 3.50 रु॰ कीमत का सिक्का चलता था। ऐसे एक लाख पगोडा के इनाम की घोषणा की गई जिसमें पहला इनाम पांच हजार पागोडा का था,फिर ढाई ढाई हजार के दो, एक हजार के पांच, पांच सौ के दस,,ढाई सौ के बीस ,एक सौ के पचास और पचास के  सौ था बीस पागोडा के 3212 यानि कुल 3400 पुरस्कार रखे गये थे। इसके अलावा पहला टिकिट लेने वाले को 500 और आखिरी टिकिट खरीदने वाले के लिये 360 पगोडा का पुरस्ैकार रखा गया था ।


Sunday, 7 August 2022

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Thursday, 14 July 2022

kaun bhiterghati

 बार बार यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान धोखेबाज है। वह भितरधाती है। एक तरफ वहाँ मोदी जी से मिल रहा है दूसरी तरफ आंतकी भेज रहा है पर एक बार सोचिये भितरघाती कौन हैं? भितरघाती पाकिस्तान नही हमारे अपनों देशवासी हैं जो चंद टुकड़ों के लिये इतने उच्च पद पर होते हुए देश को आंतक के हवाले कर रहे हैं। हमारे देश का अफसर हैं जिसने उन्हें साधन दिया व राह दिखाई पाकिस्तान नही। 

लंका विभीषण की बजह से ढही। हमारे यहाँ हजारों विभीषण हैं। शायद एक बार जिनके मंहगें शौंको को पूरा करने के लिये अतिथियों को निमंत्रण दिया क्या उस अफसर का परिवार समाज में मुँह दिखाने के काबिल रहेगा। बच्चे स्कूल में मुँह उठा कर चल सकेगें। और स्वयं उसका क्या? 

एक बार परिणाम की भी सोच लें पहले तो शायद ऐसे कदम उठाने से पहले सौ बार सोचेगें। लेकिन इंसान यह सोचता है कि वह तो कभी पकड़ा नही जायेगा। एक बार अपने बच्चों के लिये परिवार के लिये देश के लिये भी सोच लें। 


Tuesday, 12 July 2022

guru bhakti allokik udahran

 गुरू भक्ति शिष्य प्रेम का अलौकिक उदाहरण

स्वामी दयानन्द के हृदय में ज्ञानार्जन की अग्नि प्रज्वलित थी। उनके मन मस्तिष्क में अनेकों प्रश्न झंझावात की तरह उठते थे। उनका वे समाधान चाहते थे। ऐसा क्यों ............. वो ज्ञान तत्व तक पहुँचना चाहते थे। इसलिये घर को छोड़कर ज्ञान की खोज में गये। दुर्दान्त दलनकारी शिव के मस्तक पर चढ़कर चूहा अक्षत खा सकता है। तब वह मूर्ति में तो नहीं है, है तो अवश्य पर कहाँ है? किसमें है? शिव है मात्र पार्वती का पति नहीं है। गुरू मिले तो उनकी ज्ञान जिज्ञासा को अमृतमय का ज्ञान करायें । हिमालय की कंदराओं में महान संत रहते हैं वो बद्रीनाथ गंगोत्री गोमुख तक हो आये, पैदल कंटकाकीर्ण पथ चढ़ते गुफाओं को देखते नर्मदा के उद्गम स्थल तक गये। हरिद्वार, वाराणसी जहाँ उन्हें विद्वान सुनाई पड़ते वहाँ पहुँचते उनसे चर्चा करते । जिज्ञासाओं को शांत करने का प्रयास करते, लेकिन उन्हें कहीं भी संतोष नहीं मिला, लगता ज्ञान अधूरा है। विद्वानो की खोज करते करते मथुरा पहुँच गये। वहाँ सुना था कि कोई दंडी स्वामी विरजानन्द उद्भट विद्वान हंै। जा पहुँचे विरजानंद स्वामी की शरण में ,उन्हांेने सुना दण्डी स्वामी विरजानन्द की स्मरण शक्ति और धारण शक्ति अद्भुत है। विचार शक्ति प्रबल है। अनेकों ग्रन्थ  उन्हें कण्ठाग्र है। विरजानन्द की व्याकरण विद्या की दीप्ति अद्वितीय है। 

कार्तिक सदी 2 सम्वत् 1917 को स्वामी दयानन्द ने मथुरा में दण्डी जी की अट्टालिका पर चढ़कर द्वार खटखटाया। दण्डी जी ने पूछा ,‘कौन है ’।

 उत्तर मिला‘ दयानन्द सरस्वती ’।

‘तुम कुछ व्याकरण भी पढ़े हो।’ 

‘महाराज! सारस्वत् आदि व्याकरण ग्रन्थ पढ़ा है।’ 

इस उत्तर के साथ ही द्वार खुल गये। प्रणाम कर स्वामी दयानन्द विनीत माव से बैठ गये। विरजानन्द पूछते रहे कि आगन्तुक का ज्ञान कहाँ तक है। दयानन्द से जानकर बोले ‘दयानन्द अब तक जो कुछ अध्ययन किया है। उसका अधिक भाग अनार्ष ग्रन्थ हैं। ऋषि शैली सरल और सुंदर है परन्तु लोक उसका अबलम्बन नही करता। जब तक तुम आनार्ष पद्वति का परित्याग न करोगे तब तक आर्ष ग्रंन्थांे का महत्व और मर्म नहीं समझ सकोगे। पहले सब अनार्ष ग्रन्थ यमुना में बहा आओ और आर्ष ग्रंथ पढ़ने के अधिकारी बनो।’दूसरी बात जो शिष्य बनाने से पहले दण्डी स्वामी ने दयानन्द से कहीं वह थी कि सन्यासियों को विद्यार्थी बनने में बाधा पड़ती है। भोजनाच्छादान की चिन्ता से मुक्त हुए बिना विद्याभ्यास कैसा अतएव अपने आवास और खानपान की व्यवस्था करके आओ। 

मथुरा में प्रवेश के साथ दयानन्द ने अपना डेरा रंगेश्वर मंदिर में डाला था । लेकिन योग्य गुरू से शिक्षा प्राप्त करनी थी । वे विश्राम घाट के ऊपरी भाग स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर की एक छोटी सी कोठरी में रहने लगे। कोठरी आज भी है, लेकिन उसे देखकर विश्वास नहीं होता मात्र लेटने भर की जगह है। वहीं उन्होंने अपना डेरा डाला। बाबा अमरलाल जो ज्योतिष बाबा के नाम से जाने जाते थे । प्रतिदिन सौ ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। उनके द्वारा भोजन व्यवस्था हुई और दयानन्द सारा दिन गुरूशरण में रहते। 

दण्डी स्वामी जी के यहाँ प्रातः ही दयानन्द पहुँच जाते थे। उन्हें ज्ञात हुआ विरजानन्द ब्राह्म मुहूर्त में पुष्कल पानी से स्नान करते हैं तो वे बड़ी रात उठकर गुरू स्नान से पूर्व ही यमुना जल के कई घड़े अपने कन्धे पर उठाकर  लाते और स्नान योग्य जल एकत्रित कर देते तथा सांयकाल को भी स्नान के लिये जल ले आते थे। पीने के लिये पानी बीच जल धारा से लाते आंधी होती तूफान चाहे वर्षा लेकिन गुरू कार्य में दयानन्द में कभी व्यवधान नहीं हुआ। 

स्वामी जी की गुरू सेवा, प्रतिभा, स्मरण शक्ति, ग्राह्य शक्ति से दण्डी स्वामी बहुत प्रभावित हुए और अपने इस योग्य शिष्य से अतिशय प्रेम करने लगे। लेकिन प्रेम का अर्थ नहीं था कि वे अध्ययन में किसी प्रकार की कोताही करते। एक दिन दण्डी स्वामी दयानन्द पर कुछ क्रुद्ध हो गये । उनका स्वभाव उग्र था वे शिष्यों पर लाठी भी उठा देते थे। उन्होंने उन्हें कठोर शब्द कहते हुए लाठी मारी। स्वामी दयानन्द पर लाठी के प्रदार से किसी प्रकार का असर नहीं हुआ। वे पाठ याद करते रहे, लेकिन निकट बैठे नयनसुख ने हाथ जोड़कर विरजानन्द जी से निवेदन किया ‘‘महाराज ये दयानन्द सन्यासी है। उन्हें मारना तो उचित नहीं होगा । दण्डी स्वामी बोले ‘बहुत अच्छा आगे हम इसे आदर से पढ़ायेगें। बाद में संध्या काल कक्षा समाप्ति पर दयानन्द ने नयनसुख से कहा,‘ मेरे गुरू से कुछ भी क्यों कहा। अगर वे मारते हैं तो हित बुद्धि से जैसे कुम्हार घड़े को पीटपीट कर सुडौल बनाता है। उसी प्रकार गुरूदेव हमारी कल्यान कामना से वशीभूत हमें ताड़ित करते है।’ पूर्व में भी क्रोधवेश में दण्डी स्वामी ने कसकर एक बार लाठी उनकी भुजा पर मारी वह चोट जिंदगी भर बनी रही। इसे जब तब सिर माथे लगा लिया करते थे। वह उसे गुरू प्रसाद मानते थे। 

चोट इतनी तीव्र थी कि भुजा पर निशान बन गया लेकिन दयानन्द ने गुरू से कहा ‘गुरू महाराज मेरा शरीर कठोर है। आपके हाथ कोमल मारने से आपके सुकोमल हाथों में चोट आयेगी इसलिये मत मारा कीजिये ’स्वामी दयानन्द के यश की कीर्ति मथुरा नगर में फैल चुकी थी । एक बार दयानन्द पद्मासन लगाये समाधिस्थ थे एक महिला श्रद्धानत हो उनके चरणों में झुक गई उसके भीगे केश और वस्त्र दयानन्द जी के चरणों को स्पर्श करने लगे। स्वामी जी के नेत्र खुल गयें। वे माता माता कहकर उस स्थान से उठ गये। उनके हृदय में ग्लानि हुई और उन्होंने गोवर्धन के निकट एकान्त में निराहार तीन दिन तीन रात ध्यान चिंतन कर आत्म शोधन किया। दण्डी स्वामी बिना सूचना शिष्य की अनुपस्थिति से कुपित हो गये और  उनकी मत्र्सना की। शांति से दयानन्द गुरू के क्रोध को सहन करते रहे बाद में जब विरजानन्द शांत हुए तब उन्होने अपने प्रायश्चित की कथा सुनाई। स्वामी ने सुनकर भूरि भूरि प्रशंसा की और प्रसन्न हो गये। 

एक बार दण्डी स्वामी विरजानन्द का दूर का सम्बन्धी मथुरा आया उसने विरजानन्द से मिलना चाहा लेकिन उन दिनों विरजानन्द ने शिष्यों को आज्ञा दे रखी थी कि कोई भी हो मुझसे मिलने मेरे स्थान पर न आवे। वह दयानन्द जी से मिला और उनसे बहुत प्रार्थना की कि बस मैं दर्शन कर चला जाऊँगा बोलूँगा नहीं। दयानन्द जी ने बहुत कहा कि अगर बिना आज्ञा ले जाऊँगा तो गुरूजी अप्रसन्न हो जायेंगे । पर वह व्यक्ति बहुत प्रार्थना करने लगा। ‘अब दर्शन लाभ नहीं कर पाऊँगा तो फिर कभी नहीं कर पाऊँगा। बस चुपचाप दूर से दर्शन करके चला जाऊँगा।’ सहृदय दयानन्द उस व्यक्ति को अट्टालिका पर ले आये। उस व्यक्ति ने मौन रहकर दण्डी स्वामी के दर्शन किये और शनैः शनैः वापस चला गया । स्वामी दयानन्द भी आ गये लेकिन सीढ़ियाँ उतरते एक व्यक्ति मिला उसने विरजानन्द जी से पूछ लिया ‘दयानन्द के साथ जो व्यक्ति आया था कौन था।’’ यह जानकर कि दयानन्द किसी को लाये थे वह चुपचाप लौट गया’’ वे दयानन्द पर कुपित हुए ‘मुझे नेत्रहीन जान मेरे साथ छल किया तेरे लिये यह ज्योति हमेशा के लिये बंद होती है ।’ दयानन्द जी ने बहुत अनुनय विनय की लेकिन व्यर्थ। दयानन्द बहुत दुःखी हो गये। उधर विरजानन्द ने दण्ड तो दे दिया लेकिन अपने प्रिय शिष्य की अनुपस्थिति से बेचैन थे । जब नयनसुख ने क्षमा याचना की तो तुरंत दयानंद को क्षमा कर दिया। दोनों ही परम प्रसन्न हुए। 

दण्डी स्वामी दयानन्द को ‘कालजिह्य और कुलक्कर’ कहकर बुलाया करते थे। कालजिह्य अर्थात् जिसकी जिह्या असत्य के खंडन में काल के समान कार्य करे। कुलक्कर का अर्थ है खूंटा अर्थात् जो विपक्षी का परामूत करने में खूटे के समान दृढ़ हो। उनकी तर्क शैली पर विरजानन्द मोहित थे । वे कहते ‘दयानन्द’ मैने बहुत से विद्यार्थियों को पढ़ाया पर आनन्द तुम्हें पढ़ाने में आया। ऐसा आनन्द आज तक नहीं आया। गुरू शिष्य में घण्टो तर्क वितर्क होते रहते । अनेक गूढ तत्वों पर चर्चा परिचर्या होती। विरजानन्द कहते थे। मुझे अपना संचित ज्ञान सौपने में बड़ा संतोष हो रहा है। 

जिस समय दयानन्द ने पाठशाला छोड़ी उन्होंने आधा सेर लौंग दण्डी स्वामी के चरणों में रखते कहा ‘आपकी असीम कृपा रही। आपने मुझे विद्वान बना दिया। अब मैं देशाटन पर निकलना चाहता हूँ। आपकी सेवा में मेरे पास कुछ नहीं है। बस ये कुछ लौंग भेंट कर रहा हूँ। विरजानन्द ने नत शिष्य के  सिर पर स्नेह से हाथ रखा। उनकी वाणी रूद्ध हो गई, जी भर गया,‘ वल्स मैं ईश्वर से आपके लिये मंगलकामना करता हूँ । पर गुरू दक्षिणा में कुछ भिन्न वस्तु मांगता हूँ।’ 

दयानन्द ने कहा,‘ गुरूदेव आज्ञा दें यह सेवक आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके मन वचन कर्म से निभायेगा’ । विरजानन्द ने कहा ‘मैं तुमसे तुम्हारे जीवन की दक्षिणा मांगता हूँ तुम प्रतिज्ञा करो। जब तक जीवित रहोगे आयविर्त में आर्षग्रन्थ का प्रचार, अनार्ष ग्रन्थों का खंडन करोगे तथा भारत मंे वैदिक धर्म की स्थापना हेतु अपने प्राण तक न्यौछावर कर दोगे, गुरू  दक्षिणा में यही वस्तु मुझे दान करो। सांसारिक किसी पदार्थ की मुझे चाह नहीं है। ’

स्वामी दयानन्द ने गद्गद् कंठ से कहा,‘ श्री महाराज देखेंगे कि उनका प्रिय शिष्य प्राण पण से आज्ञा का पालन किस प्रकार करता है।’ स्वामी दयानन्द ने अपने बाजुओं मंे गुरू के चरणो को भरा और नत सिर कर अंतिम प्रणाम किया। गुरू ने भी स्नेहिल हाथ फेरते कहा,‘ जाओ दयानन्द ईश्वर आपको सुख सफलता प्रदान करे। आपके मनोरथ सिद्ध हों’। इसकि पश्चात् संवत् 1923 को स्वामी दयानन्द आगरा होते हुए मथुरा गुरू के चरणों मं वंदना करने गये। एक सुवर्ण मुद्रा और एक मलमल का थान भेंट किया। भागवत खंडन की पुस्तक के विषय में बताया। गुरू अपने सुयोग्य शिष्य से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए। गुरू चरणों में कुछ दिन बिताने का लोभ दयानन्द नही छोड़ पायें और कई अपनी शंकाओं का समाधान करते रहे। फिर वहाँ से दयानन्द कुम्भ मेले                 में चले यह गुरू शिष्य का अंतिम मिलन था। 

क्वार वदी 13, 1925 को स्वामी दयानन्द को अपने गुरू की मृत्यु का समाचार मिला। सुनकर सन्न रह गये। कुछ देर कुछ न कह सके फिर बोले ‘आज व्याकरण का सूर्य अस्त हो गया’’ जिस दयानन्द को सगे सम्बन्धियों का विछोह न हिला सका गुरू से विछोह की सुनकर हिल गये । सच्चे गुरू शिष्य के सम्बन्ध की अलौकिकता का अनुपम उदाहरण है।


डा॰ शशि गोयल

सप्तऋषि अपार्टमेंट

जी -9 ब्लाॅक -3  सैक्टर 16 बी

आवास विकास योजना, सिकन्दरा

आगरा 282010 ॰9319943446

म्उंपस दृ ेींेीपहवलंस3/हउंपसण्बवउ