माॅं तुम ज्ञान देने वाली हो
जब चारों ओर संषय होने लगता है
तब हम कहाॅं जाएॅं
तुम्हारी छवि का घ्यान ही हमारी
अज्ञानता को दूर कर देता है
ष्षारदे हम एक दीप जलाते हैं
और बस इतना जानते हैं
कई लयबद्ध सितार बज रहे हैं
तो वह भी आपकी उपासना कर रहे हैं
माॅं तुम ज्ञान देने वाली हो
जब चारों ओर संषय होने लगता है
तब हम कहाॅं जाएॅं
तुम्हारी छवि का घ्यान ही हमारी
अज्ञानता को दूर कर देता है
ष्षारदे हम एक दीप जलाते हैं
और बस इतना जानते हैं
कई लयबद्ध सितार बज रहे हैं
तो वह भी आपकी उपासना कर रहे हैं
तू है तेरे आस्तित्व के लिये दुनिया से लड़ा था मैं
दुःख आया तो तू कहाॅं है तू कहीं नहीं है अड़ा था मैं
जर्रे जर्रे में तू है तो बता ए ईष्वर
नन्हीं बच्ची को कुचलने वाले में नहीं था क्या तू ?
दरख्त पर बैठी चिड़िया को बाज लेकर उड़ गया
कुछ देर पहले चिड़िया ने भी कीड़े का घर उजाड़ा था।
लोग तो धरती से आसमान में उठ झूम उठते हैं
पर यह चांदनी देखो आसमान से धरती पर आकर खुष है ।
झूम झूम कर नृत्य कर गीत गा रहा था भगवान् तेरे
नीचे गड्ढ़ा आ गया तो मुॅह से गाली निकली।
भूखे पेट में अग्नि इस कदर घधकती है कि
कड़कड़ाते जाड़े में भी आसमान की चादर ओढ़ कर सो जाते हैं
डा॰ ष्षषि गोयल
मंहगाई डायन खाये जात है और केदारनाथ धाम में पट खुलने वाले दिन पांच लाख यात्री पहुंच गये । रहने की किराया होटल में बीस हजार रु रोज में भी उपलब्ध नहीं था ।
होटल की थाली पहुंच से बाहर ,प्रतिदिन एक नये होटल का उद्घाटन,मघ्यम वर्ग के होटलों वेटिंग, बीस पच्चीस मिनट इंतजार,
दोसौ रु का परांठा निम्न मध्य वर्ग का पूरा परिवार अपनी पसंद का परांठा मंगा रहा ।
जोमेटो आदि कंपनिया नई ऊंचाइयों पर। घर घर पहुंचा रहे पिज्जा आदि ।
जिस बस्ती से घर घर निकलती है सुबह बच्चों का खाना बनाकर,चैका बर्तन ,सफाई करने महिलाऐं उन हर घर में फ्रिज कूलर किसी किसी घर में एसी भी ।
पैट्रोल मंहगा चैराहों पर एक बार में बत्ती पार करना मुश्किल गाड़ियों की लंबी कतार, घर का हर सदस्य अकेला अपनी कार से एक ही आॅफिस पहुंचते हैं। बड़ी बड़ी गाड़ियों की बिक्री बढ़ी।
मदर टेरेसा
बारह वर्ष की नन्हीं बालिका जब कलकत्ता में सेवा कार्य कर रही मिशनरी संस्था के पत्र बल्गेरिया स्थित अपने स्कूल में सुनती पीड़ितो की व्यथा कथा सुन उसका कोमल हृदय व्यथित हो उठता और वह उनकी पीड़ा हर लेने का व्याकुल हो उठती बालिका ने तभी निश्चय कर लिया कि बड़ी होकर वे कलकत्ता जाकर पीड़ितो की सेवा करेगी। यही बालिका आज की ममतामयी माँ टेरेसा है
18 वर्ष की कैशोर्य अवस्था में सन 1928 में उन्हें भारत आने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यहाँ वे दार्जलिंग में शिक्षा ग्रहण करके कलकत्ता के सेंट मेरी हाई स्कूल में अध्यापन करने लगी। अध्यापन कार्य वे लगन और रुचि के साथ अवश्य करती थी परंतु अपने को संबंधित वह किसी सेवा संस्था से ही करना चाहती थी।
फरवरी 1948 में उन्होंने रोम के पोप को एक आवेदन पत्र भेजा। उसमें उन्होंने निवेदन किया था कि वे कलकत्ता की झोपड़पट्टियों में काम करना चाहती है। सेवा कार्य हेतु पटना जाकर नर्स का प्रशिक्षण किया दिसम्बर में उन्होंने अपना स्कूल खोल लिया। उनकी सहायता के लिये दस सिस्टर अन्य भी आईं।
अब माँ टेरेसा दुनियाँ द्वारा टुकराये और फेंके गये शिशुओं को ले आती। जिन रोगियों को घर वाले भी हाथ लगाने से कतराते थे उनकी सेवा करने लगी। उनके महत्त्व कार्य से प्रभावित होकर कलकत्ता महापालिका ने 1952 मंें काली माँ के मंदिर से सटे हुई धर्मशाला को मदर टेरेसा को सेवाकार्य के लिये दे दिया। माँ ने उसका नाम रखा ‘निर्मल हृदय’ उसमें माँ ने मृतप्राय सड़क पर फेंके व्यक्तियों को लाकर रखा और उनकी सेवा की।
काली माँ के मंदिर का पुजारी इनका विरोधी हो उठा क्योंकि ये सभी जाति के व्यक्तियों को लाकर सेवा करती थी। उनके लिये उसने जोर लगाया कि धर्मशाला खाली करे दे। एक बार तो भीड़ इतनी उग्र हो उठी कि पुलिस बुलानी पड़ी जब प्रुलिस अधीक्षक आये तब उन्होंने देखा माँ टेरेसा एक संड़ाध भरे कीड़े पड़े व्यक्ति के घावों को साफ कर रही है और ऐसे कई रोगी वहाँ और उपस्थित है। वे भीड़ से बोले जो कार्य यह महिला कर रही है अगर तुम लोगों के घर की कोई स्त्री करने के तैयार हो तो मैं इन्हें अभी यहाँ से निकाल दूँ।
भीड़ सिरे झुकाकर चली गई। स्वंय काली माँ का पुजारी हैजे से पीड़ित होने पर घर से निकाल दिया गया। वह माँ की शरण में आया। अतः तब माँ तुमि काली कहता चिर निद्रा में सो गया।
धीरे धीरे मदर टेरेसा ने भारत के उन शहरों में अपने आश्रम खोल रखे है निराश्रितों के लिये 25 आश्रम है। 25 आश्रम अनाथ बच्चों के लिये, 70 स्कूल, 285 चिकित्सालय और 58 कुष्ठ रोग केन्द्र खोले है। उनके महत काय्र के लिये लगा न मुक्त हस्त दान किया और उन्हें पुरस्कार दिये।
सन् 1962 में उन्हें पदम्श्री से सम्मानित किया गया। उन्हें अनेको राष्ट्रीय एवम् अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार लेकिन पुरस्कार की राशि उन्होंने आश्रमों में लगादी।
6 जनवरी 1971 को उन्हें शांति पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार में उन्हें 21,500 डालर की राशि मिली अक्तूबर 1981 में उन्हें 50 हजार पौंड का कैनेडी अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला 1972 में 34 हजार पौंड का टेपलेशन पुरस्कार दिया गया तथा अक्टूबर सन् 1979 को उन्हें नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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हम भारतवासियों का यह दुर्भाग्य है कि हम विदेशी आक्रान्ताओं को सदा अपना सिरमौर बना कर अपनी सभ्यता संस्कृति को छोड़ उनकी विरासतों को ओढ़कर खुश होते हैं कि हम कितने विद्वान हैं कि हम आक्रान्ताओं की भाषा उपयोग में ला रहे हैं हम आक्रान्ता की पंक्ति में आ गये हम विद्वान हो गये हैं। यही हम हिंदी के साथ कर रहे हैं ।हिन्दी में काव्य की अनेक पद्वतियां हैं लेकिन हम हिन्दी काव्य विधा में जब तक चार छः उर्दू के कठिन शब्द नहीं डाल लेंगे तब तक कविता अपूर्ण मानेंगे । संभवतः मैं उर्दू भाषा जरा भी नहीं जानती केवल जो शब्द स्वतः आ गये हैं वे ही प्रयोग में लाती हूं, शायद विरोध का एक कारण हो सकता है अज़ल गज़ल से मैं विरक्त हूं परन्तु जब मैं हिन्दी कविता में अत्यधिक उर्दू के शब्दों का प्रयोग सुनती हॅू तो मेरा उस कविता से मोह भंग हो जाता है चाहे कितनी भी अच्छी हो मेरे हाथ ताली बजाने से इंकार कर देते हैं । संभवतः मुझे हिन्दी से मोह है खिचड़ी बीमारों के लिये होती है।
महिला सशक्तीकरण
एक पिंजरे में कैद चिडिया और आसमान में उडान भरती चिडिया के स्वभाव में खासा अंतर हेाता है। पिंजरे में कैद चिडिया संुन्दर भले ही हो मगर वह चहचहाती नहीं है। झालक जाती है आॅखे में समाई मजबूरी सहमेपन का सा भाव जबकि आसमान में उडान भरती चिडिया की आॅखों में झलकती है आत्मविश्वास की चमक ।,वह दिल खोलकर चहचहाती है। उसमें चुनोंतियो से जूझने का हौसला भी पैदा होता है। यही हौसला महिला में शक्ति पैदा करता है। उसे कभी कल्पना चावला तो कभी इंदिरा नुेहरू तो कभी किरण बेदी बनाता है। वह पूरे दम खम से संघर्षरत है। वह अपने चारो ओर बंधी अर्गला को काटकर अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुई है। वह पायलट बनकर देश की आर्थिक प्रगति में भागीदार बनती है। राजनेता बनकर देश की नीतियांे और विकास कार्य में अपना पक्ष रखती है। घर और बाहर दोनों का भार बखूबी निभाती है, आज की नारी अपने आस्तित्व को पहचानने की पहल कर रही हेै अपने अधिकारों के लिये सजग है। प्रंेम जबतक आकर्षण के रूप में है तब तक प्रेमी प्रेमिका दोनों मालिक होते हैं विवाह में परिवर्तित होते ही मालिक नौकर का भाव आ जाता है और नारी नौकर होने का सुख भोगती है उसमें ही मस्त रहती है पर जहाॅं जरा सा मलिक बनने की ओर कदम बढ़ाना चाहती है या हक की बात करती है तो झगड़ा होने लगता है। तब प्रेम युद्ध की स्थिति पैदा कर देता है सन् 1960 के दशक में महिला सशक्तीकरण एक मुद्दा एक विचार बना । यह आंदोलन भारत ही में नहीं विश्व में फैला । अर्थात नारी पुरुषों के समान किसी भी देश में सक्षम और सशक्त नहीं है। उसे दोयम दर्जो का स्थान मिला हुआ है । विश्व भर में अनेक योजनाऐं महिला सशक्तीकरण के लिये चलाई गयी हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ ने तो एक पृथक कार्यक्रम चलाया हेै।
यद्यपि अभी भी शारीरिक हिंसा और उत्पीडन की शिकार हैं लकिन अब सामाजिक न्याय और आर्थिक संबलता की ओर कदम बढ़ा कर गरीब अनपढ और पिछडें समाज की महिलाएॅं जो अधिक उत्पीडन का शिकार होती हैं, अब अन्याय के खिलाफ उठकर खडी हो गई हेैं वे अपना हक मांग रही हैं। उसके लिये हर चुनौती का सामना कर रही है। उदाहरण है बुदेलाखंड की पांच सौ औरतों का गुलाबी गिरोह। एक अर्धशिक्षित महिला संपतदेवी द्वारा संगठित यह गिरोह है। सरकारी महकमे में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ खडा हुआ है। इस गिरोह की सबसे बडी उपलब्धि-,, राशन काला बाजार में जाने से रोकना है। संपत देवी का कहना हेै देश आसानी सें तो आजाद हुआ नही हैं अरे जान एक बार जायेगी दस खलनायक हमें परेशान करे क्या ? पूरा बुदेलखण्ड हमारे साथ हेै। देश के कई राज्यों में महिलाओं ने स्वशक्ति स्वयं सहायता समूह बना लिये हैं इसने आर्थिक आत्मानिर्मरता के क्षेत्र में क्रंाति लादी है।विश्व महिला दिवस की घोषणा संयुक्त राष्ट्र ने 1975 में की थी, लेकिन इसका आरम्भ बहुत पहले ही हो गया था। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ मंे ही महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति सजगता आ गई थी । यूरोप में बदलाव आ रहा था। 1911 मंे काोपेनहेग जर्मनी मंे सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की क्लारा जेटिकन ने विश्व महिला दिवस का विचार रखा और 19 मार्च को यूरोप के बहुत से देशों में पहली बार विश्व महिला दिवस का आयोजन हुआ। इसमें 10 लाख से ज्यादा महिलाओं और पुरुषों ने भाग लिया । यह दिवस महिलाओं के ही नहीं एक तरह से सभी के लिये सामाजिक न्याय व समानता की आवाज उठाता रहा। अमेरिका मंे भी अपने अधिकारों के प्रति चेतना जाग्रत हो रही थी । 1908 मंे करीब 1500 महिलाओ ने सड़क पर आकर पहली बार यह आवाज उठाई कि उन्हें वोट का अधिकार मिले । 28 फरवरी 1909 को वहाॅ महिलाओं ने अपना पहला महिला दिवस मनाया और यह सिलसिला 1913 तक चलता रहा यूरोप मंे 1913 में विश्व महिला दिवस की तिथि 8 मार्च तय की गई और इसी तारीख को बाद में संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिली। इस एक शताब्दी का सफर महिलाओं के लिये आगे और आग जाने तमाम उपलब्धियों का सफर है।
जम्मू कश्मीर की महिलाओं ने अतंकवादियों के खिलाफ स्वयं हथियार उठा लिये हैं। अवामी नामक इस संगठन की महिआएॅं कहती हैं अपने ऊपर अत्याचार कराने से अच्छा मरना, मारना सीख लें। उत्तरांचल झारख्ंाण्ड मध्य प्रदेश मेें महिलाआंे द्वारा शराब विरोधी अंदोलन चलाये गये । आदमियांे की शराब खोरी की वजह से महिलाओं को जो उत्पीडन सहना पडता है, उसके खिलाफ लामबंदी कर हजारों लीटर शराब नष्ट कर दुकाने बंद कराई । यहाॅ महिलाओ ने अपनी शक्ति का उपयोग संगठित होकर किया अपने को कमजोर नही माना । एकता में संगठन में बहुत शवित हैं जो कमी प्राकृतिक रूप से महिला मंे है कि वह निर्बल रह जाती हैं अबला नही ,शारीरिक रूप से उसमें पुरुष का सामना करने की शाक्ति नही है तो उसे संगठित होकर पूरा किया जा सकता हेै । अरब देश की महिलाण्ें भी पुरुष सत्तात्मकता के खिलाफ उठ खड़ी हुई हैं। इसके लिये उन्होंने भीषण यातनायें सहीं । प्रताड़ना यौन उत्पीड़न आदि सहन किया। उनका कहना है पितृसत्तात्मक व्यवस्था के हटे बिना आजादी मुमकिन नहीं । इसके लिये उन्होंने जगह जगह प्रदर्शन कर कुछ कानून अपने हित में कराये ।
जहा तक अधिकारों की बात है, अधिकार लडकर नही प्राप्त किये जा सकते हैं महिलाओं को भी पूरे अधिकार प्राप्त हेैं पर क्या महिलाएं अपने हर अधिकार के लिये कानून का दरवाजा खटखटायेगी। क्योकि शोषण महिलाओं का हर कदम पर है और कारण हैं वह अपने को आश्रित मानती हेै। आर्थिक स्वतन्त्रता इतना आत्म विश्वास दे देती हैं कि वह अपने अधिकार अपने आप जान जाती हेै।
कुछ अधिकार ऐसे हैं जिन्हे माॅ को बच्ची को देने होंगे । स्वयं ही जब अपने को सीमित कर लेगी तो कैसे वह अपनी बच्ची को इस योग्य बनायेगी कि वह पुरुषेां के साथ कदम से कदम मिला कर चल सके। आर्थिक स्वतन्त्रता के लिए आवश्यक नहीं कि काम काजी ही हो जो कामकाजी महिलाएॅ दोहरी जिंदगी जी कर और भी पिसती ंहैं आर्थिक स्वतन्त्रता मिलती है, पर परिवार छिन जाता है। जहा एकल परिवार है वह्राॅ महिला नौकरी कर लेती हैं पर जब बच्चे होते हैं तब समस्या रहती है, तब परिवार की इच्छा होती है।वह चाहती है कि कोई बच्चे को संभाले तब वह नौकरी करे। घरेलू महिलाएॅं कम उपयोगी नहीं होती हैं। वह परिवार का पालन पोषण बच्चों की शिक्षा दीक्षा का पूरा भार वहन करती हैं ऐसे में उसे आर्थिक स्वतन्त्रता रहनी चाहिये। विवाह के साथ ही यह निश्चय रहना चाहिये कि यंिद परिवार चलाने की जिम्मेदारी उसकी है तो अर्थ की देख भाल भी उसकी जिम्मेदारी है। एक विश्वास ,एक आत्म विश्वास पैदा होगा और स्वतन्त्र निर्णय मी तब ही ले पायेगी बस दृढता होती चाहिये अपने आस्तित्व की लडाई, के लिये अपने को अंदर से मजबूत करना चाहिये। भारत की महिलाओं के सामने बहुत सी चुनौतियाॅं हैं । यद्यपि कदम दर कदम हर चुनौती का जबाव देती नारी आगे और आगे बढ़ती जा रही है । कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहाॅं नारी पुरुष से पीछे है। साड़ी कपड़ा जेवर चैके चुल्हे से कहीं ऊपर उसे दुनिया नजर आने लगी हैं
नारी में अदम्य शक्ति है वह जो मन में ठान लेती है पूरा ही करके मानती है । देश की प्रगति समाज की प्रगति महिलाओं की प्रगति पर निर्भर है । महिला समाज की निर्माता हैं ।महिलाऐं पुरुष की भाग्य रेखा हैं। समाज की राष्ट्र की घुरी हैं महिलाऐं । दूसरों की दया या मेहरबानी की ओर देखना यही स्त्री को कमजोर बनाता है। स्त्री अपने हाथ में महिला दिवस का झुनझुना पाकर उसे खुशी खुशी बजाती है पर क्या यह स्वर्य महिलाओं के लिये सार्थक प्रयास है। एक दिन क्यों 365 दिन महिलाओ के है और हर दिन को अपना दिन मानकर अपने को मजबूत किया जा सकता है। तब ही महिला सशक्तीकरण सार्थक होगा नही तो ऐसे ही महिला रिरियाती रहेगी अपने अधिकार मांगती रहेगी मांगने वाला तो हमेशा दोयम होता है। तो दोयम क्यों बने, दाता हैं जन्मदाता, जीवन दाता आगे भी दाता ही बने। महिलाओं को यदि अपना अधिकार लेना है तो दूसरी महिलाओं को अधिकार देेने होंगे । अपनी इज्जत कराने के लिये दूसरी महिलाओं को भी स्थान देना होगा तभी पुरुष वर्चस्व में सेंध लगेगी ।
डा॰ शशि गोयल
सप्तऋषि अपार्टमेंट
जी -9 ब्लाॅक -3 सैक्टर 16 बी
आवास विकास योजना, सिकन्दरा
आगरा 282010मो ॰9319943446
म्उंपस दृ ेींेीपहवलंस3/हउंपसण्बवउ