आजकल मंदिर में दर्शन करने की होड़ सी लगी है। एकाएक जिन्हें शायद मंदिर के देवता के नाम भी नहीं मालुम होंगे मंदिर की सीढ़ी चढ़ रहे हैं किसलिये कि लोग यह न कहें कि अरे मंदिर नहीं गये दर्शन नहीं किये आज का श्रंगार गजब का था । मंदिर क्या भव्य सजा था । जैसे ज्ञानचक्षु खुल गये । जो साधारण आदमी है वह श्रद्धा से दर्षन करना चाहता है वह दर्षन में समय लगाना चाहता है वह ईश्वर की ऑंखों में झांक कर भाव देखना चाहता है । मन के साथ मूर्ति का भाव बदलता है पल पल पर आशा बढ़ती है कि भगवान् से तादात्म्य होगा पर वहॉं तो भीड़ ही भीड़ आगे बढो चाहे आगे वाले भक्त का सिर ही देखा हो पर रेले से बढ़ते जाओ । अंधेरे में खड़ी भगवान् की मूर्ति को ढू़ढने का प्रयास करते आगे बढ़ जाओ अगर जरा ठिठके कि पुजारी का हाथ सिर को सरकाने में लग जायेगा ,हो गये दर्शन मंदिर की सजावट निहारो और शान से कहो हम भगवान् के दरशन कर आये दुनिया को बताने लायक हो गया कि दर्शन कर आये भाव हीन ढंग से , पंडा पुजारी प्रसन्न आप प्रसन्न।
Monday, 17 August 2026
Sunday, 16 August 2026
ek shabd jgooth
हर व्यक्ति अपने चारो ओर एक घेरे का निर्माण करता है कि वह कैसा होना चाहिये या कैसा है? यदि वह उसके अनुरूप नहीं होता है तो झूठ का सहारा लेता है। जिससे वह समाज में अपने अनुरूप स्थान ले सके। आजकल मोबाइल ने सबसे अधिक झूठ बोलना सिखाया है। वह घर में बैठा होगा और कहेगा मैं दूसरे शहर में हूँ। लैंड लाइन फोन से तो यह निश्चित हो जाता था कि वह घर पर ही है। बात नही करनी है ,मैं मीटिंग में हॅूं, मैं गाड़ी चला रहा हूँ बाद में बात करूँगा और वह बाद फिर नहीं आता।
स्वंय की कमियों को छिपाना चाहता है श्रेष्ठ और श्रेष्ठ होना चाहता है अपनी कमियाँ होती हैं तो उसे झूठ के सहारे पूरी करता है। आमतौर पर यह सबसे अधिक डा॰ की डिग्री के लिये प्रयुक्त हो रहा है। किसी प्रसिद्ध डाक्टर के यहाँ नौकरी करके उसके यहाँ कम्पाउडरगिरी करने के बाद कुछ दवाओं के और बीमारियों के नाम सीख कर वह डाक्टर का बोर्ड लगा कर बस्तियों में दुकान खोल लेता है। ऐसे झोला छाप डाक्टर जनता के जीवन के साथ खिलवाड़ करता है।एक पी एच डी डिग्री प्राप्त डाक्टर होते हैं। अगर सहयोगी डाक्टर है तो वह क्यों नहीं है एकाएक वह डाक्टर लगाने लगता है। अब कोई डाक्टर की डिग्री देखने तो नहीं आ रहा है। एक लेख लिख कर उसे अपनी थीसिस बताकर डिग्री लगाने वाले उतने ही हैं जितने सड़क पर नीली बत्ती और हूटर लगाकर घूमने वाले आस पास अपने चारो ओर एक झूठ का वलय बनाकर आइ ए एस, पी सी एस अधिकारी के समकक्ष दिखाना।
परिवार में यदि एक व्यक्ति उच्च अधिकारी है उस घर का हर सदस्य अपने को अधिकारी ही बतायेगा और उसी ठसके से चलेगा। एम्बुलेन्स में सवारी बैठाकर टौल टैक्स बचाता सब बाधायें पार करना कितना आसान है बस एम्बुलेंस शब्द ही तो लिखा है और अधिक क्या झूठ बोला है। एक शब्द बस एक शब्द झूठ।
Tuesday, 11 August 2026
main hi sab kuch
एक समय आता है जब हम अपने ऊपर से बड़ों के साये को झटक देते हैं और अपने फैसले अपने आप लेने लगते हैं तब अपनी सब बातों के हारजीत के सफलता के असफलता के स्वयं जिम्मेदार होते हैं।पर बहुत बार हम उसके जिम्मेदार स्वयं को नहीं और को मानते हैं,परंतु सफलता में वे अपनी मेहनत अपनी कुशलता को ही श्रेय देते हैं तब समाज,माता पिता भाई बहन, कहीं नहीं होते । अगर कहीं कुछ गलत हो रहा होता है तो उसकी जिम्मेदारी औरों की हो जाती है । नहीं मैं गेम खेलना नहीं छोड़ सकता,मुझे भी कुछ मनोरंजन चाहिये । उससे मेरा दिमाग फ्रैश हो जाता है। स्किल चाहिए उसके लिए भी ।कोई भी कार्य न कर पाने के लिए औरों पर छोड़ने के लिए बहुत विकल्प हैं ‘क्या करूं मै। चाहता तो बहुत था पर परिस्थिति नहीं बन पाई,अगर सब ठीक रहता तो देखते मैं क्या कर देता। बॉस बार बार टोकते थे नही ंतो एक से एक बढ़िया प्रोजेक्ट बनाता आदि आदि
Monday, 10 August 2026
apne prati imandaar hain
क्या आप अपने प्रति ईमानदार हैं?एक बार अपनी क्रियाओं का विश्लेषण करें अपने प्रति ईमानदार बनना औरों के साथ ईमानदार होने से अधिक कठिन प्रक्रिया है। दूसरों की गलती का विश्लेषण बार बार और सबसे करेंगे पर अगर विवाद में स्वयं अपना विश्लेषण करने पर कई बातों पर पर्दा डालने का प्रयास करेंगे। अपने दोषों का विश्लेषण करना आसान नहीं है इसमें स्वयं का सामना स्वयं से होता है और तब अपने को बेचारा बताकर एकतरफ रखने का प्रयास रहता है। सामने वाला आपकी बात समझ ही नहीं पाया आपने ठीक किया था। गलती सदा दूसरे की ही होती है। अपने को बचाने का प्रयास रहता है। आप के अनुसार आप अयोग्य व्यक्ति से बात कर रहे थे। जागरूक रहें समय के साथ चलना चाहिये ,पिछली बातों के साथ चिपके न रहें ।
Friday, 7 August 2026
jeevan ek khel
गर्मी में ठंडी हवा ताजगी देती है तो सर्दी में धूप की गर्मी राहत,धूप तो गर्मी में भी निकलती है,सर्दी में भी पर उसकी नीयत बदल जाती है। हर मौसम का अपना आनंद है । बसंत में फूल का,वर्षा में भीगी भीगी सी धरती,पेड़ पौधे धुले धुले से जैसे प्रसन्नता से नाच रहे हों पर गर्मी में तपन में भी गर्म हवा के साथ लहराते ही व्यतीत करते हैं। अपने दुःखों के साथ भी जीना सीखिये। चुल्लू चुल्लू कर उन्हें उलीच दीजिये बसंत आयेगा अवश्य आयेगा ।
जीवन एक ऐसा खेल है जिसमें सांप हैं तो सीढ़ियां भी हैं । सांपों से बचना आना चाहिये,जितनी तेजी से समय का सदुपयोग करेंगे सीढ़ियां भी उतनी तेजी से चढेंगे ।कभी अनेक कठिनाइयां एक के बाद एक सामने आ जाती हैं,कभी हंसते हंसते समय गुजरने लगता है,अगर चाुनौतियों से घबराने लगेंगे तो जीवन के इस खेल में हार जायेंगे। साहस से काम लेना ही चुनौती है। अगर निराशा होती है जो अपने ऊपर से आत्मविश्वास डगमगाने लगता है। हर व्यक्ति के आगे फूल तो हमेशा नहीं रहते और फूल होते हैं तो वो सूखते भी हैं,पर उन सूखे फूलों को भी सुगंध में परिवर्तित करते जाना यही जीवन है। कचरे की तरह फेंक देना हताशा है। जीवन की चुनौतियों से भागना है । सामना करने से घबराने से तो जीवन की हर घड़ी झेलने लायक नहीं रहेगी ।
Monday, 3 August 2026
sukh
मीठा मीठा मैं खाऊं कड़वा कड़वा थू । हर व्यक्ति सुख चाहता है ,अच्छा अच्छा चाहता है ,जरा सी भी विपरीत परिस्थिति आई कि वह दुःखी हो जाता हैऔर दुःखों की तकलीफ की पर्तें एक एक कर जमती चली जाती हैं। अपने दुःख हर किसी से कहते हैं कहने से दुःख हल्का लगने लगता है । पर हर किसी से दुःख कहा भी नहीं जा सकता,अगरकिसी से आप दुःख कहोगे तो लोग रास्ता बदल लेते हैं,‘ कौन हर समय रोना सुनें। दुःख की बात नहीं सुख भी बताना मुश्किल है,सुख सुनकर अनेक दुखी हो जाते हैं।खुशी दुःख की वजह से ही छिपाते हैं। परंतु दुःख सुख तो धूप छाांव है वे दिन तो देखने ही पड़ेंगे सदा खुशी तो नहीं रह सकती,तो दुःख भी नहीं रहता है। अगर पर्वत विशाल और मन मोहता है और ऊंचाइयों को प्रेरित करता है ,तो घाटी भी बहुत सुंदर होती है पर्वत की चढ़ाई कठिन है तो घाटी की उतराई भी सहज नहीं है ।
Wednesday, 29 July 2026
man
मानव मन में अनेक इच्छाऐं जन्म लेती हैं,और वे इच्छाएं कल्पना में बदलती हैं ।कल्पना और इच्छाशक्ति मिलकर यथार्थरूप धारण करती हैं । जब तक इच्छाशक्ति प्रबल नहीं होगी कल्पना यथार्थ में नहीं बदलेगी। मन के अंतरतम कोने में जब कल्पना रूप लेना आरंभ करती है,और जब तक वह बाहर आती है वह प्रबल रूप धारण कर लेती है और यही प्रबलतम इच्छा सफलता की नींव रखती है। व्यक्ति उन आवश्यकताओं की ओर देखता है उसकी दृष्टि वहीं घूमती रहती है कि किस प्रकार से कल्पना यथार्थ में बदल सकती है और जब अत्यधिक बैचेनी होने लगती है तब वह कल्पना यथार्थ की ओर बढ़ने लगती है। लेकिन अपने ऊपर विश्वास रखना होगा,अगर अपने विश्वास से डगमगा गये तो इच्छा अधूरी रह जायेगी,और कल्पना आकाश की ऊचाइयां को तो छुएगी पर धुंआ बनकर उड़ जायेगी।
अगर अपनी क्षमताओं पर अपनी कल्पना पर विश्वास नहीं करेंगे तो अवचेतन में नकारात्मक तत्व जुड़ने लगेंगे जो आपके पंखों को अवश कर देंगे । वे फड़फड़ायेंगे पर उन पंखों को लगेगा कि नहीं ये नहीं उड़ेंगे और कहीं बिखर जायेंगे। यदि विश्वास नहीं डगमगायेगा तो असफलता आपको नया मार्ग दिखायेगी। असफलता से सीखेंगे जो छूटा है वह सामने आयेगा । असफलता ही सफलता का मार्ग दिखायेगी। अपने ऊपर अटूट वियवास रखें मस्तिष्क सकारात्मक रखें। जिन सपनों को देखा है उन पर डगमगायें नहीं सपने साकार होंगे ।