Friday, 10 January 2025

aao hum bacca ho jayen

 ‘ आओ हम बच्चा हो जायें’


कोराना की वजह से छुट्टियाँ हो गई मां बाप की आफत आगयी  गर्मियों की छुट्टियाँ तो  दो महिने की होती हैं  होते ही झगड़ा टंटा शुरू हो जाता है।यह तो पता ही नहीं कब स्कूल खुलेंगे। सब कुछ गड़बड़ सब कुछ झाला। न सोने का ठीक न जागने का। स्कूल बंद होने वाले है सोचकर ही मांओ को झरझुरी आ जाती है । सारा दिन ऊधम न तकिये का पता होगा न चादर का घर तो लगेगा ही नहीं कि साफ हुआ है । जिंदगी मंे चलते चलते जैसे तूफान आ जाये। सबसे पहला नियम सुबह उठने का टूटेगा। पाँच बजे बच्चों को तैयार कर बच्चों केा स्कूल भेजने के बाद चाय की चुस्कियों के बीच अखबार या एक झपकी नींद ,और दस बजे तक काम खत्म कुछ शापिंग वापिंग लंच ................ टीवी सीरियल कुछ काम। दोपहर तक जिंदगी सैट हो जाती है बच्चे आये खाना हुआ बच्चो के पंसदीदा चैनल चले मतलब एक रुटीन लाइफ सब कुछ फायदे में एक नियम के चलते। कामकाजी महिला तो उनका भी अपना रुटीन........ लेकिन छुट्टियाँ बाप रे बाप .......... एक तूफान .......... एक झंझावात जो सुबह से सब कुछ बिगाड़ देता है । नौ बजे तक बच्चे हिलने का नाम नहीं लेते........

.. 

‘‘मॉम छुट्टियाँ है सो लेने दो.............. मतलब इंतजार करो कि कमरा कब एक सा हो कब नाश्ता हो कब फ्री हो। उसके बाद नाश्ते में क्या बनाया है ............... नो ...बोरिंग...................... कुछ अभी अभी 

पती पत्नी कुछ भी खा लेते थे पर अब कुछ चाहिये बर्गर.............. कबाब पिज्जा चाउमिन......... और वो भी अकेले नहीं कुछ और भी साथ हो साथ ही .......... एक का कहना होगा पिज्जा तो दूसरा कहेगा उ्रत्तपम लगे रहो बेटा । आया ऊँट पहाड़ के नीचे बहुत अपनी मम्मीसे भी बनवा बनवा कर खाया है तुम कैसे झुझलाओगी। दूसरी समस्या है बोर होने की। उठते ही बोर होना शुरू कर देते है..................... बोर की समस्या में उलझने बढ़ जाती है........... और मोबाइल एक मात्र विकल्प रह जाता है .......अगर टीवी देखें तो.... देखेा भई टीवी देखो और रिमोट आपके कब्जे से गायब,कोई सास बहू का सीरियल नहीं , न बच्चो के पापा ष्षेयर देख सके  न न्यूज। आवाज सुनाई देगी षिंगषैंग ,डोरेमोन आदि आदि । 

तो क्यों न कुछ दिन बच्चो के साथ आप भी बच्चा बन जाये उस समय को एन्जॉय करें व कुछ दिन के लिये अपनी जिंदगी को बैग में बंद कर अलमारी में टाँग दे और निकाल ले बच्चो की टंगी जिंदगी आपकी अपनी पुरानी जिंदगी । सुबह बच्चों को लेकर पार्क में जायें अगर पास में खेत आदि हो तो वहाँ जाये, बच्चे पौधों को बढ़ता देखेंगे जब प्रतिदिन पहले दिन से बड़े होते पौधे को देखेंगे तो स्वयं मन कहेगा, मम्मा हम भी पेड़ लगायेंगे हम भी पौधे लगायेंगे और कुछ गमले कुछ पौधे आपके घर में सज जायेंगे । यदि जमीन हो तो नहीं तो गमले में कुछ सब्जियोें वाले पौधे लगायें एक एक बेल ही बच्चों में नवीन स्फूर्ति प्रदान करेगी । एक लौकी भी आयेगी तो ‘लौकी बाप रे बाप आप ही खाना वाक्य सुनने में महरूम हो जायेंगे।’ हमारी लौकी है........... उनका उस दिन का भोजन त्यौहारी हो जायेगा। बिस्तर ठीक करना है एक जिम्मेदारी देकर ठीक मत कराइये दूसरे दिन ही बिस्तर ठीक करने के नाम चेहरा उतर जायेगा। खेलते हुए ही ठीक कराइये। बच्चों को हर काम में खेल चाहिये वे सीधे ढंग से कुछ नहीं कर सकते चलो एक कोना उछाल कर बिछवाया साथ दूसरे दिन खुद कहेंगे मम्मा पलंग ठीक करते हैं। कुछ देर किचन मंे भी साथ लें चलो देखें आपसे आलू जल्दी छिलता है या मैं प्याज जल्दी काटती हूँ। किसके स्लाइस सबसे अच्छे कटते है........ अपने अनगढ़ हाथों से बनाये कटलेट चाहे तलने से पहले आप ने ठीक कर दिये थे उन्हें बहुत स्वाद आयेगा.......... जल्दी जल्दी काम समेटो ........ फिर खेलेंगे। गर्मी में बाहर नहीं निकल सकते इन्डोर गेम तैयार है नये खेल कम्प्यूटर बगैरह कुछ देर ही ठीक है आप कैरम, ताश आदि  निकालिये ......... लूडो चाइनीज चैकर, शतरंज सब ओर से उनका ध्यान हटा देंगे पर आपको भी खेलना होगा आप हटे कि कि चिपके टीवी से अब तो मोबाइल अधिक प्रिय है। 

चाइनीज व्हिस्पर, जापानीज व्हिस्पर, नेम प्लेस एनीमल  थिंग आदि  ऐसे खेल है जो कभी बोर नहीं होने देते ,रात को सब लोग इन्हें खेलंे बच्चे उस समय का इंतजार करेंगे। पढ़ने की आदत सबसे अच्छी होती है। बच्चों को कॉमिक्स आदि  देैं। साथ ही पढ़कर वैसा ही कुछ सोचकर लिखने का कहें किताबें खरीदना पैसा बर्बाद करना नहीं है पुस्तकें सबसे अच्छी मित्र होती है। वे आपको अनजाने मंे कितनी जिंदगियों के साथ जोड़ देती हैं । जितने पात्र है उतने पात्रों को जी लेते है। सच जब कथा का हम उम्र बालक पहाड़ पर चढ़कर गुफा में घुसकर बहती नदी के तेज वहाब में पैर रखता है तो खुद के पैरो में भी सनसनाहअ होने लगती है। किताबों में भी चिड़ियाँ चहचहाती हैं। झरने ऊँचाई से कलकल की ध्वनि करते गिरते हैं तो आँखों में उनकी फेनिल धार साकार हो उठती है हर पुस्तक के साथ एक नया संसार खुल जाता है........तो क्यों न सबसे अच्छे दोस्त को बच्चो का दोस्त बनायें। 

साथ ही मॉं बाप अर्थात् बच्चों के दादा दादी  भी घर में हांे तो सोने में सुहागा, मिलकर आइसक्रीम बनायें  मीठा बनायें बाजार का तो बंद खाना घर में ही तरह तरह के व्यंजन बनाये और बचचों को  ष्षामिल करें आज तुम कुछ बना कर दिखाओ । कुछ देर चहल कदमी, कुछ देर काम करायें खट्टा कुछ मीठा नमकीन कुछ तीखा करते बच्चों को बोर न होने दें खुद भी बच्चा बनकर जिन्दगी अपनी बढ़ाये क्योंकि हर दिन उठने के साथ हम अपने जीवन की किताब का एक पृष्ठ उलट लेते हैं, पीछे पलटिये बच्चा बनिये बच्चों के साथ। 


purane panne

 प्रधानमंत्री जापान

सैनफ्रैंसिसको में जिस सन्धि पर आपको हस्ताक्षर करने के लिये मजबूर किया गया है वह हम ऐशियावासियों के लिये बढ़े शोक और दुःख का कारण है। जापान जैसे वीर राष्ट्र को अपने बचाव के लिये अमरीकन सेना की आवश्यकता पडेगी,यह तो सफेद झूठ है । अमरीका को विश्वास हो चुका है कि एक न एक दिन रूस के साथ युद्ध होगा ही और इसलिये वह आपकी जन्म भूमि में अपने अड्डे बनाना चाहता हे। अमरीका ने पहलेएशिया में मित्रों की खोज की किन्तु उसने दोस्मी का हाथ यों बढ़ाया जैसे दासों को इशारे से बुलाया जाता है। 

अब कही कोई मित्र न मिला,तो अब डालर और एटमबम के बल पर एशियाई राष्ट्रों को अपने फन्दे में लाना चाहता है ।जापान शीघ्र ही फिर अपने पैरों पर खड़ा होगा ,ऐसा मुझे पूरा विश्वास है ।एशिया का कल्याण जापान चीन और भारत की मै़ी में है ।


Tuesday, 7 January 2025

astha parv Mahakumbh

 आस्थापर्व महा कुंभ

कुंभ मेला हिन्दुओं का सबसे अधिक दिन चलने वाला सबसे बड़ा मेला है। यह आस्था पर्व है अमृत की खोज। अमृत स्नान, एक महायज्ञ ,यह भारतीय संस्कृति का प्रतीक है जो एक अभिलाषा का संधान है, जिसके लिये एक स्थान पर सबसे बड़ा मानव समागम होता है । हर वर्ग ,हर वर्ण के लिये समान श्रद्धा का संगम है। हर व्यक्ति को अमृत संधान का हक है इस मेले को देखकर लगता है कि यह विराट का एकाकार स्वरूप है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार मृत्युलोक में राजाओं  की सभा में दुर्वासा ऋषि को सुगन्धित पुष्पों की माला भेंट की गई। दुर्वासा ऋषि साधु संत थे। इतनी सुगंधित माला उन्होंने सोचा यह तो राजा महाराजाओं के योग्य है। उन्होंने देवराज इन्द्र को वह माला भेंट कर दी। इंद्र ने वह हार  अपने हाथी की सूंड पर पहना दिया। तभी दुर्वासा किसी कार्यवष लौट कर इंद्र के पास आये तो उन्होंने अपने द्वारा दिये हार को हाथी को दिये जाने पर अपमानित अनुभव किया। दुर्वासा तो अपने क्रेाध के लिये प्रसि़द्ध हैं ही ,उनहोंने इन्द्र कोष्षाप दे दिया कि वे अपना तेज खो देंगे ।

देवतागण परेषान हो उठे अपना तेज खोने का अर्थ आस्तित्व की समाप्ति। वे षिवजी के पास आये। षिवजी ने समस्या समाधान विष्णुजी के पास बताया। विष्णु भगवान् ने कहा तेज प्राप्ति का मात्र उपाय अमृत पान है, वह समुद्र के गर्भ में है। समुद्र मंथन अकेले देवताओं के बस में नहीं था ,वैसे भी वे अपनीष्षक्ति खो चुके थे इसलिये उन्हें दानवों से समझौता करना पड़ा। समुद्र मंथन देवता और दानवों की आपसी सहमति से किया गया। समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकले। सबसे अंत में धन्वन्तरि अमरत्व पेय का घड़ा लिये अवतरित हुए। देवताओं ने छल से सभी रत्न हस्तगत कर लिये थे अंत में अमृत कुंभ को भी जब देवता स्वयं ही ले लेना चाहते थे । तब देवासुर महासंग्राम हुआ। महासंग्राम के समय असुरों से बचाने के लिये अमृतघट की रक्षा का दायित्व देवराज इंद्र के पुत्र जयंत को सौंप दिया गया था । सूर्य चंद्र वृहस्पति और षनि इस कार्य में जयंत के सहयोगी बने ।

असुर अमृतघट की खोज कर रहे थे जब ज्ञात हुआ कि घट जयंत के पास है तो असुर उसको ढूंढने लगे । जयंत अमृतघट को लेकर भागा । वह बारह स्थानों पर विश्राम के लिये रुका इनमें से चार मृत्युलोक में थे। वे स्थान थे हरिद्वार ,प्रयाग,गोदावरी तट -नासिक और क्षिप्रा का 

1

तट- उज्जयनी। अमृतघट को रखने में उन चारों स्थानों पर अमृत की कुछ बूंदें छलक गईं और वे  स्थान कुंभ क्षेत्र बन गये। दुर्वासा ऋषि के ष्षाप से जुड़ा था इसलिये विषेष रूप से धर्म संम्प्रदायों से जुड़ता चला गया। साधु सन्यासी संत मोक्ष की प्राप्ति की आकांक्षा से यहां कल्पवास करने के लिये पहुंचते हैं। श्रद्धा और विष्वास ने साधु सन्यासियों के साथ साथ गृहस्थों को भी आकर्षित किया और आस्था विष्वास का महामेला बन गया । कल्पवास के समय पूर्ण संयम श्रद्धा विष्वास के साथ ईष्वर का स्मरण करते हुए चालीस दिन गंगा के तट पर बिताते हैं, इस समय आहार संयमित होता है। कल्पवास के समय षिविर के बाहर तुलसी का बिरवा लगाते हैं और जौ बोते हैं। विष्वास है कि जौ के पौघे के बढ़ने के साथ उनके घर की सुख समृद्धि का विकास होगा ।

स्कंद पुराण में कहा गया - पृथिव्यंा कुंभ पर्वस्य,    चतुर्थ भेद उच्यते,

                    चतुः स्थले निपतनात्,    सुधा कुम्भस्य भूतले

                    विष्णु द्वारे प्रयागे व अवन्तयां गोदावरी तटे

                    सूर्येन्दु गुरू संयगात      तद्राषो तत्वसरे ’

पुराण में ब्रह्मा जी कहते हैं- चतुरः कुंभाष्चतुर्घा  ददामि

 कुंभराषि पर वृहस्पति का और मेषराषि पर सूर्य का योग होने में हऱिद्वार में कुभ का योग बनता है। सिंह राषि पर वृहस्पति एवम् मेष  राषि पर सूर्य का योग होने  पर उज्जयनी में कुंभ योग बनता है। वृष्चिक राषि पर वृहस्पति का योग होने पर नासिक में कुंभ योग बनता है। माधमास की अमावस्या को वृहस्पति का वृषराषि में संचरण होता है तब प्रयाग में कुंभयोग बनता है । यह स्थिति बारह वर्ष बाद बनती है। चंद्र सूर्य और वृहस्पति कोणात्मक स्थिति में होते हैं तब प्रयाग की पावन पुण्य भूमि पर अमृत वर्षा होती है ।

इनमें स्नान के लिये सूर्य के उत्तरायण होने की विषिट तिथियों को स्नान का योग बनता है वह है मकर संक्रान्ति,मौनी मावस्या बसंत पंचमी । इन तिथियों पर ष्षाही स्नान होता है स्नान की परंपरा छ तिथियों को है मकरसंक्राति ,पौष पूर्णिमा,मौनी अमावस्या,बसंत पंचमी,माघ पूर्णिमा,महाषिवरात्रि।

 ष्षाही स्नान के लिये महामंडलेष्वरों में अनबन होने लगी थी । कभी कभी लड़ाई झगड़े तक की नौबत आ जाती थी। हर पीठ के मठाधीष अपने को श्रेष्ठ कह पहले स्नान करना चाहते थे। तब ब्रिटिष काल में उनके स्नान का क्रम तय हो गया था। सबसे पहले महा निर्वाणी का 

2

स्नान तय है , नागा गोसाई,वैष्णव वैरागी संत फिर उदासी और अंत में निर्मल अखाड़ा के संत महंत स्नान करते हैं।

आदि षंकराचार्य ने षैव सम्प्रदाय का गठन किया जिसकी दसष्षाखायें हैं इन षाखाओं में जिन व्यक्तियों को दीक्षित कर नाम दिये गये है उनके नाम के आगे अब वर्तमान दीक्षित संत का नाम लगाया जाता है। इसे योग पट्ट कहते हैं,ये नाम हैं गिरि ,पुरी ,भारती वन अरण्य पर्वत सागर तीर्थ ,आश्रम और सरस्वती । इन्हें दषनाम से संबोधित किया जाता था ।

आदि गुरू षंकराचार्य ने चार मठ या पीठ स्थापित किये ये भारत के चारो कोनों पर थे । गोवर्धन पुरी,द्वारकाष्षारदा पीठ,श्रंगेरी पीठ, और ज्योतिर्मय और हरपीठ पर एक मुख्य षिष्य को नियुक्त किया जिन्हें परमहंस कहा जाता था ,लेकिन 1800 से वे महामंडलेष्वर कहलाये जाने लगे । 

एक बार पार्वती जी ने षिवजी से पूछा क्या वास्तव में संगम स्नान करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है’ षिवजी पार्वती जी की बात सुनकर मुस्कराये और बोले ‘चलो परीक्षा करलें।’

गंगातट पर स्नान करने वालों की भीड़ लगी हुई थी,षिवजी वहीं तट पर षव की तरह लेट गये । देवी पार्वती विलाप करने लगीं। उनके चारों ओर भीड़ इक्कट्ठी हो गई। पार्वती जी भीड़ से कहने लगीं,‘ भगवान् षिव ने उन्हें वरदान दिया है कि ऐसे तीर्थयात्री के स्पर्ष से मेरे पति जीवित हो जायेंगे जो पापी न हो,परंतु यदि पाप जिसने किया हो वह व्यक्ति छुएगा तो वह मर जायेगा । मरने की बात सुनकर भीड़ छंटने लगी लेकिन एक आदमी आगे आया और बोला गंगा पाप मोक्षणी है कोई न कोई पाप तो किया ही होगा,मैं गंगा स्नान कर पाप मुक्त होकर आता हूं, फिर आपके पति को स्पर्ष करूंगा,अवष्य आपके पति जीवित हो जायेंगे। वह गंगा में डुबकी लगा कर आया जैसे ही षव को छूने को हुआ षिवजी अपने असली स्वरूप में प्रगट हुए और उस व्यक्ति को वरदान दिया ।

कुंभ के विषय में सबसे प्राचीन उल्लेख चीन यात्री हवेनसांग के समय का मिलता है जो हर वर्ष सपरिवार आता था और संगम स्नानकर जो कुछ अपने साथ लाता था वह दान कर जाता था। इस मेले का वर्णन विदेषी यात्रियों की पुस्तकों में भी मिलता है। हवेन सांग ने लिखा ,प्रयाग में मेला कड़कड़ाती ठंड में लगा था,मीलों तक गंगा के किनारे तंबुओं का नगर बसा था। ठंड में हिन्दुओं को नहाते देखा देखकर,उनकी दृढ निष्ठा आस्था से मन प्रभावित हो उठता है।1871 में रूस की हेलेना पैट्रोविना ने भारत भ्रमण के समय यह मेला देखा था और उसके विषय में 1812 में प्रकषित पुस्तक ‘फ्राम दी के बस एण्ड जंगल ऑफ हिन्दुस्तान में कुंभ 


3

मेले का वर्णन किया है‘ एक अदभुत् मेला देखा, हिन्दुओं की श्रद्धा आस्था और सांस्कृतिक एकता को पास से देखा ।

     एक अन्य चीनी यात्री होई लू पिन ने लिखा,‘हऱिद्वार में एक भव्य मेला देखा वहां अनेक राजा गरीबों को वस्त्र आदि दान कर रहे थे। हजारों लोगों को वस्त्र दान कर रहे थे। वे सोने की मुद्राऐं दान कर रहे थे । कुंभ मेला हिन्दू संस्कृति की आस्था विश्वास और एकता -अखंडता का महान पर्व है ।






डा॰ ष्षषि गोयल


Monday, 6 January 2025

purane panne

 

feŒfy;kdr vyh [kka

eqDdk izn'kZuh ds ckn vc vki xkyh xykSt ij mrj vk;s A ml jkst vkius QekZ;k fd d'ehj 'ks[k vCnqYyk ds cki dh fefyfd;r ughaA;fn cki dh feyfd;r dh nyhy esa vki ;dhu djrs gksa]rks Hkkjr ds fgUnqvksa ds cki gh rks ikfdLrku ds ekfyd Fks A

iz/kkuea=h tkiku

lSuÝSaflldks esa ftl lfU/k ij vkidks gLrk{kj djus ds fy;s etcwj fd;k x;k gS og ge ,sf'k;kokfl;ksa ds fy;s c<+s 'kksd vkSj nq%[k dk dkj.k gSA tkiku tSls ohj jk"Vª dks vius cpko ds fy;s vejhdu lsuk dh vko';drk iMsxh];g rks lQsn >wB gS A vejhdk dks fo'okl gks pqdk gS fd ,d u ,d fnu :l ds lkFk ;q) gksxk gh vkSj blfy;s og vkidh tUe Hkwfe esa vius vìs cukuk pkgrk gsA vejhdk us igys,f'k;k esa fe=ksa dh [kkst dh fdUrq mlus nksLeh dk gkFk ;ksa c<+k;k tSls nklksa dks b'kkjs ls cqyk;k tkrk gSA

vc dgh dksbZ fe= u feyk]rks vc Mkyj vkSj ,Vece ds cy ij ,f'k;kbZ jk"Vªksa dks vius QUns esa ykuk pkgrk gS Atkiku 'kh?kz gh fQj vius iSjksa ij [kM+k gksxk ],slk eq>s iwjk fo'okl gS A,f'k;k dk dY;k.k tkiku phu vkSj Hkkjr dh eS+h esa gS A

samajseva ya swseva

 

lekt lsok ;k Lolsok

izfrfnu ,d ubZ laLFkk v[kckj ds iUuksa ij mx vkrh gS A lekt ds dqN Bsdsnkj gj laLFkk esa utj   vkrs gSa D;k okLro rsa os brus ijfgr ljl gSa A ,d ckj  fdlh laLFkk esa ?kql dj ns[k yhft;s lekt lsok ds ihNs ds vlyh psgjs vk tk;saxs A ,d nwljs dks /kDdk nsrs ^rw dkSu \ eSa gh eSa * dSls dSls uqps[kqps psgjs ns[kus dks feysaxs lkeus ls eqLdjkrs ihNs ls eky ljdkrs ,d gkFk ls nku ysaxs vkSj ?kqekdj vanj A nku nkrk Jðk ls ,d ckj nsdj QksVks f[kapok ysxk vkSj nwljs fnu cklh v[kckj lk jn~nh esa  fQd tk;sxk vkSj vc iSlk nku ysusokys dk mlds cki dk  laLFkk esa in gfFk;kdj dqlhZ f[kldk;sxk vkSj  vius ;k nksLrksa ukrs fj'rsnkjksa ds lsoknkjksa ds bykt djk;sxk ]mudh 'kknh djk;sxk vc lsoknkj  mldk tj [kjhn xqyke mlds lkgc us yk[k #i;k [kpZ dj fn;k rks ukSdjh rks ctkuh gh gS Aftldk iSlk yxk ftldh esgur dh dekbZ yxh og fd/kj dksus esa gS vkSj lekt lsoh <wa< jgs gksrs gSa ^vjs!  Qykuk ckth ekj x;k dqN ge Hkh >Vd yk;sa dSlk v[kckjksa esa ped jgk gS *

    xjhcksa ds fy;s xkfM+;kWa ?kk;y dks vLirky ds fy;s rqjar feys ekyqe iM+rk gS xkM+h Qykus lkgc ds ?kj dk lkeku <ks jgh gS Qykus lkgc dk Mªkboj Nqêh ij gS vkt lkgc o`nkou iq.; ykHk djus   x;s gSa nwljh xkM+h vHkh vkrh gS ejht ds [kwu cg jgk gS vc tYnh gS rks cktkj dh cqykyks A vc    brus jlw[knkj lnL; gSa fdlh u fdlh dh vko';drk rks jgrh gS vc mUgsa rks udkjk ugha tk ldrk vkSj Åij ls ukrs fj'rsnkjksa ij Hkh rks jkSc iM+sxk fd Qayk bruk izHko'kkyh gS pijdukrh vkSj        QksdfV;k  tqxkM okys tqVs jgsaxs gkFk iSj nckrs jgsaxs fd laLFkk ds uks izkfQV uks ykWl ;kstuk esa        rFkkdfFkr   xjhcksa dks   eky ljdrk jgsxk A 

 v[kckjksa ds QksVksxzkQjksa ls vf/kd dkSu tkurk gSa fd dSls i;kZoj.k lqj{kk gksrh gS A igys ls ekyh ls [kqnok;s xM<s esa  isM+ j[krs nfl;ksa gkFk] QksVks f[akph lc xk;c ml cspkjs ljdkjh ;kstuk esa izkIr   QksdV ds ltkoVh isM+ dks fdlh Hkh  rFkk dfFkr inkf/kdkjh dh cfx;k esa igqWapk fn;k tk;sxk A      i;kZoj.k ds Bsdsnkjksa ds ?kj dh cfx;k egd xbZ ihiy uhe dk isM+ gS rks yq<+drk iM+k jgsxk A gS u  vlyh lekt lsok ;s rks dqN uewus gSa A

 

 

Friday, 27 December 2024

purane panne

 जनाब किदवई साहब 

कुछ जानकारों  का कहना है कि यदि महात्मागांधी बटवारे से पहले जनबा आसिफअली को कांग्रेसलीग मन्त्रिमंडल में लेने के लिये जिद न करते,तो आज पाकिस्तान न बनता। जिन्ना साहब बहुत सी बातें मानने को तैयार थे किन्तु आसिफअली को मुसलमानों को प्रतिनिधि स्वीकार करने पर राजी न थे। अब जवाहरलाल जी ने ,ऐसा जान पड़ता है,केवल आपकी खातिर टण्झनजी को पदत्याग करने पर मजबूर किया है ।पहली बार देश का बंटवारा हुआ ,अब शायद कांग्रेस के टुकड़े टुकड़े होंगे।


naya varsh aa gaya

 नया वर्ष आ गया , फिर से हम अपनी अपनी दीवारों से कलैंडर उतार देंगे क्या वास्तव में कुछ नया होता है ,,।फिर नई तारीखें आयेंगी एक  साल पुरानी तारीख नई होकर झड पंुछ कर चमकेगी पर वही रहेगी कदन वही रहेगा वैसे ही़ । मौसम भी तो वही आता है पर कुछ बदलता नहीं है । एक नया संकल्पलेते हैं कि हम आने वाले वर्ष दुनिया बदल देंगे । चाहते हैं कि हमारे लिये संकल्प को निभायें दूसरे । हम अपने को नहीं बदलेंगे । वही 26 जनवरी आयेगी ,बड़े बड़े नेता अफसर देष भक्ति के गीत गायेंगे और नहीं बता पायेंगे कि यह गणतं़त्र दिवस है या स्वतंत्रता दिवस , झंडे का कौन सा रंग ऊपर रहता है और किसलिये ये रंग लिये गये हैं वे एक ही रंग जानते हैं वह है सत्ता का रंग और उसके लिये वे फिर से देश बेचने के लिये तैयार हो जायेंगे ।