Tuesday, 13 October 2026

Deepawali

 दीपावली


‘असतो मा सद्गमय,तमसो मा ज्योतिर्गमय्,मृत्योर्माऽमृतगमय।।


असत्य से सत्य की ओर,अंधकार से प्रकाष की ओर


मृत्यु से अमरता की ओर हमें ले जाओं ऊं षांति।’


ष्षुभ कर्म ष्षुभ लाभ ष्षुभ कामनायें ष्षुभदीपावली


दीपावली-पर्व नये धान के आगमन का भव्य और भक्तिपूर्ण अभिनंदन है,आदि षक्ति का                                   वंदन है। मन मंदिर का दीप आलोकित हो अज्ञान तिमिर का लोप हो। हम अपने हृदय के श्रद्धा सुमन विद्यावारिधि श्री गणेष और माता पदमासना के चरणों में अर्पित करते हैं माता महालक्ष्मी का न आदि है न अंत है वे आदिषक्ति हैं माहेष्वरी हैं योग सम्भूता हैं। उनके चरणों में हमारा षत ष्षत नमन।


हमारी मंगल कामना है कि माता विष्णुप्रिया हमारे मन मंदिर का अंधकार दूर करें। हमारे आंगन में हर्ष की फुुलझड़ियां छूट, राक्षसी प्रवृतियों का अन्त हो। धर्म की स्थापना हो सत्य की विजय हो । राष्ट्र में व्याप्त भ्रष्टाचार दुराचार और और तिमिर का नाष हो ।सर्वज्ञान का आलोक बिखरे। हर देहरी दीपों से झिलमिला उठे चाहे वह देहरी द्वारकाधीष कृष्ण की  हो या दीन हीन विप्र सुदामा की हो। सर्वत्र आलोक बिखरे तभी यह महापर्व सार्थक होगा और हम भक्त जन स्वर में स्वर मिलाकर कहेंगे ‘षुभदीपावली। दीपावली पर्वों का समूह है यह आवाजों नजारों कला और स्वाद का त्यौहार है ।


कार्तिक माह, भोर की सिहरन और उत्साह से भरे राधे राधे,राम राम करते जाते स्नानार्थी, कथकी का स्नान मोक्ष का रास्ता अर्थात् मोक्षदाता माह ,दीपावली भी कार्तिक माह में ही आती है,। कोजागिरी पुर्णिमा से माना जाता है लक्ष्मी घर घर झांकना षुरू कर देती है, कोजागिरी या षरत पूर्णिमा उस दिन चांदनी से अमृत झरता है जिसे आंखों में आंजने से नेत्र ज्योति बढ़ती है। घी बूरा और कालीमिर्च मिलाकर कोजागिरी पूणर््िामा की षीतल में चांदनी रखते हैं इसे नेत्र षक्ति का स्त्रोत माना जाता है। कार्तिक का स्नान अलस अंधेरे होता है। भोर से पहले सरसराती ठंड में नदी स्नान छापा तिलक और पितरों को देवमार्ग दिखाने के लिये आकाषी दिया दिखा कर तर्पण किया जाता है। आकासी दिया कार्तिक द्वितीया से आगामी मास की द्वितीया तक जलाये जाते हैं। ये दीप मनुष्य के बराबर पवित्र लकड़ी गााड़कर उसके ऊपर दो हाथ का बांस लगाया जाता है उसके ऊपर अष्टमुखी दीप जलाया जाता है। ये आठ दिये हैं 1 धर्म 2 महादेव 3 पृथ्वी 4 श्री राधा दामोदर 5 धर्मराज 6 प्रजापतिगण 7 पितृगण 8 अंधेरे में रहने वाले प्रेत। अब इसका स्थान कंदील ने ने लिया है ।


दीपावली दीपों से जगमगाती यह भारत भूमि आकाष में फैले अंधेरे को दूर करती यह धरती मुख्यतः हिन्दुओं का पर्व है, हिन्दू धर्म पर्वो और उत्सवों से लबरेज है, यह प्रतीक है आनंद और उत्साह का। हर पर्व के पीछे,हर मान्यता के पीछे वैज्ञानिक तथ्य हैं । 


 दीपावली क्यों और कब मनानी प्रारम्भ हुई इसकी बहुत सी कथायें हैं और दीप ही क्यों जलाये जाते हैं,तंत्र विद्या में दीप के ही अनेक भेद बताये गये हैं


दीपो ज्योति परब्रह्म, दीपो ज्योति जनार्दनः ।


दीपो ज्याति तमोहारी,दीपः सर्व सुखः प्रदः ।।


श्री विष्णु ने वामन अवतार के रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि  मांगी और तीन पग में तीन लोक नाप लिये तो देव लोक में दीप जला कर खुषियां मनाई गईं।


दूसरी दीपावली की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है जब देवासुर संग्राम हुआ तब तेरस के दिन धन्वतरि और अमावस्या के दिन लक्ष्मीजी प्रगट हुई इसलिये लक्ष्मी जी के आगमन की खुषी में दिये जलाकर उनकी पूजा की जाती है। छोटी दीवाली अर्थात चौदस के दिन श्री कृष्ण ने जरासंध का वध किया।


त्रेता युग में  राम चौदह वर्ष बाद पुष्पक विमान में रावण का वध करके लौट रहे थे,उनके स्वागत में नगर सजाया गया,खुषियां मनाई गईं और राम मार्ग न भटक जायें अंधेरी अमावस्या को रोषनी से जगमगा दिया था। उसी परंपरा को कायम रखते हुए हम राम का वनवास से लौटना दीपोत्सव के रूप में मनाते हैं।


राम ने सर्वप्रथम गणेष एवम लक्ष्मी की वंदना एवम पूजा की थी। कैकयी ने दुर्गा मां का आवाह्न किया इस प्रकार नव जीवन का प्रारम्भ हुआ। 


दीपावली पंच महोत्सव है। इसका प्रारम्भ दो दिन पहले धनतेरस से हो जाता है इस दिन बर्तन लक्ष्मी के भरने  के लिये खरीदते हैं। इससे संबंधित कथा है ‘ एक दिन यमराज ने अपने दूतों से पूछा ,‘क्या जीवों का प्राण हरण करते तुम्हें दया भी आई?’


दूतों ने कहा ‘ आपकी आज्ञा का पालन करना ही हमारा धर्म है,फिर भी कभी कभी विचलन होती है ।’


यमराज ने कहा ,‘कब और क्यों ?’


उत्तर देते हुए दूत ने हंस नामक राजा की कथा सुनाई जो जंगल में षिकार खेलते हुए हुए भटक कर पड़ोसी राजा की सीमा में चला गया जिसकी पत्नी का नाम हेमा था। जिसने कभी एक पुत्र को जन्म दिया था । जन्म समय के नक्षत्रों की गणना करने के बाद राज्य ज्योतिषी ने बताया  कि इस राजकुमार का विवाह होने के ठीक चार दिन बाद राजकुमार की मृत्यु हो जायेगी। यह सुनकर राजा ने यमुना के तट पर एक गुफानुमा घर में अपनी पत्नी और राजकुमार को रख दिया और यह निर्देष दिया कि राजकुमार पर किसी स्त्री की दृष्टि न पड़ जाये। समय बीतता गया। राजकुमार वयस्क हो गया। राजा हंस की नवयौवना बेटी एक दिन घूमती अपने पिता की तरह भटक कर उसी गुफा के पास से निकल। उसे देखने राजकुमार बाहर आया। राजकुमार ने यौवना को देखा राजकुमारी भी उस आकर्षक युवक को देखकर उस पर मोहित हो गई । दोनों ने वहीं गंधर्व विवाह कर लिया। जैसा कि राज ज्योतिषी ने बताया था विवाह के चौथी रात्रि राजकुमार की मृत्यु हो गई। यम दूतों ने कहा,‘ धर्म राज आपकी आज्ञा से हमने प्राणहरण तो कर लिये परन्तु उस नव परिणीता का रोदन सुनकर हमारा हृदय भी कंपने लगा ,वास्तव में युवावस्था की मृत्यु बड़ी दारुण होती है। इस मार्मिक दुर्धटना से युवकों की प्राणरक्षा का उपाय भी होना चाहिये।’


इस सुझाव पर ध्यान देते हुए यमराज ने कहा ‘ आज की तिथि में जो दीपदान करेगा उसके फलस्वरूप युवावस्था में होने वाली मृत्यु को टाला जा सकता है धनतेरस की रात दिया जलाने से यम को अनुकूल कर अपमृत्यु से बचा जा सकता है ।


धन तेरस के साथ दीपावली जिसे प्रकाषपर्व भी कहा जाता है का षुभारम्भ होता है। दीपावली अंधकार पर रोशनी की विजय,एक छोटा सा नन्हा सा दीपक भी मार्ग दर्शक बन जाता है बस अपने में विश्वास हो तो । वह भी घोर अंधेरे में राह दिखा देता है। नन्हा दीपक कह रहा है अपने को छोटा मत समझो असहाय मत समझो थेड़ी देर ही सही गहन अन्धकार को चीर कर कुछ कदमों के सहायक तो बनोगे । अर्थात् मन के अंधेरे को चीरने के लिये ज्ञान का दीपक जलाओ ,कुछ देर ही सही भला तो करेगा ही ।


अंधकार का भी अपना महत्व है ,अंधकार क्या होता है कितना कष्टप्रद है,यह तब ही ज्ञात होगा जब अंधकार है और दीपक का महत्व भी  तब ही ज्ञात होगा,नहीं तो उजाले में दीपक की क्या जरूरत? सब एक दूसरे पर आश्रित हैं,एक दूसरे का महत्व भी तब ही पता चलेगा ।


 नरक चतुर्दषी का दिन छोटी दिवाली के नाम से मनाया जाता है इस दिन के साथ छोटी बड़ी बहुत सी कहांनिया जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है देवताओं के राजा इंद्र को हराने के बाद नरकासुर ने देव माता अदिति के कर्ण फूल छीन लिये व देवताओं व साधुओं की सोलह हजार कन्याओं को कारागार में डाल दिया। नरक चतुर्दषी के दिन श्री कृष्ण ने नरकासुर को मार डाला और देव व ऋषिकन्याओं को छुड़ाने के साथ ही देवमाता के कर्णफूल भ्ी वापस पालिये । इस विजय के प्रतीक स्वरूप श्री कृष्ण ने राक्षसराज के रक्त से अपने मस्तक पर तिलक किया। छुड़ाई गई कन्याओं ने भी इत्र चंदन आदि से स्नान कर स्वयं को पवित्र किया तब से इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान की प्रथा चल पड़ी।


कृश्ण ने नरकासूर का वध किया। विश्णु ने नरसिंह रूप में हिरण्याकष्यपु का वध किया था । इसी दिन समुद्र मंथन में धन्वन्तरि और लक्ष्मी प्रकट हुए। विश्णु से लक्ष्मी का विवाह हुआ। स्वर्ण मदिर का षिलान्यास इसी दिन हुआ । स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों इसी दिन इुए। दीन इलाही के प्रवर्तक सम्राट अकबर ने दौलतखाने के सामने 40 गज ऊंचे बांस पर आकाषदीप लटकवाया था। जहांगीर और बहादुरषाह जफर भी दीवाली धूमधाम से मनाते थे। महाभारत के अनुसार इस दिन पांडवों की वनवास और अज्ञातवास केबाद वापसी हुई । जैनियों के लिये महावीर स्वामी को मोक्ष प्राप्ति हुई। दयानंद सरस्वती का अवसान हुआ । 


दीपावली और जुए का चोली दामन का साथ है किसी अन्य पर्व पर द्यूतक्रीड़ा के विषय में नहीं सुना जाता। लक्ष्मी के साथ व्यापार का व्यापार अपने आप में जुआ है। लक्ष्मी पूजन के साथ साथ द्यूत क्रीड़ा या अक्ष क्रीड़ा को भी मान्यता मिली।ऋग्वेद में 63 पासों से खेले जाने वाले अक्षद्यूत का उल्लेख मिला है।पूजन के समय कौड़ी और पांसा फेंककर आगामी वर्षफल जानना चाहते हैं कि वह फल दायक रहेगा या नहीं। 


बरसात के बाद व्यापार फिर अपनी गति पकड़ता है कीट पतंगों को दूर करने के लिये सफाई पुताई और धंुआ किया जाता है।


सनातन धर्म ही में नहीं सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में दीपावली मनाई जाती है । जैन धर्म में लक्ष्मी सरस्वती की पूजा होती है और लाडू चढ़ाया जाता है जिसका न आदि होता है न अंत उसी प्रकार जीवन का न आदि है न अंत।


दीपावली का त्यौहा भारत तें ही नहीं विदेषों में भी धूमधाम से मनाया जाता है । मेलबर्न में दीपावली में रोषनी के साथ तिरंगा भी लहराया जाता है। यह सन् 2006 में फेडरेषन स्क्वायर पर पहली बार ष्शुरू किया गया । कई देषों में सार्वजनिक अवकाष रहता है। नेपाल में पांच दिन यह त्यौहार मनाया जाता है लेकिन कुछ फरक ढंग से 


हमें नये युग के हिसाब से दीपावली मनानी चाहिये। उसे क्या स्वरूप दिया जाय ? किस ढंग से मनायें । हम मिट्टी के लक्ष्मी गणेष की पूजा करते हैं और फिर जमुना में प्रवाहित करते हैं। अब प्लास्टर ऑफ पेरिस से लक्ष्मी गणेष बनाये जाते हैं और उन्हें रसायन युक्त रंगों से रंगा जाता है जो जहरीले होते हैं वे यमुना के पानी में घुल कर उसे जहरीला बनाते हैं । मूर्तियां घुलती नहीं हैं और यमुना तल को प्रदूषित करतीं हैं।


आतिषवाजी में जहां गंधक का उपयोग किया जाता था जिससे कीट पतंगे मर जाते थे । अब आतिषबाजी का रूप बदल रहा है,समाज तरक्की कर रहा है परंतु अनेक हानिकारक रसायन लगाये जा रहे हैं तथा अग्नि कांडों का भी कारण बन रही है। दीपावली के षुभकामनाओं वाले कार्डों पर लक्ष्मी गणेष की या अन्य भगवानों की तस्वीर लगाते हैं फिर वे कार्ड बेकार हो जाने के बाद पैरों तले रौंदे जाते हैं । आतिषबाजी पर भी लक्ष्मी जी आदि की तसवीर लगाते हैं फिर वे जलाये जाते हैं क्या अपने देवताओं का अपमान नहीं है । इच्छा तो होती है हर दिन होली हो हर दिन दीवाली ऐसे ही उल्लास उमंग हो लेकिन कैसे ?नीरज जी की पंक्तियां याद आ रही हैं -


जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना 


अंधेरा घरा पर कहीं रह न जाये ।’ 


नयी ज्योति के घर नये पंख झिलमिल


उड़े मृत्य मिट्टी गगन स्वर्ग छूले


लगे रोषनी की झड़ी झूम ऐसी


निषा की बली में तिमिर राह भूले


खुले मुक्ति का वह तिमिर राह जगमग


उषा जा न पाये निषा आ न पाये ।




डा॰ ष्षषि गोयल


सप्तऋषि अपार्टमेंट


जी -9 ब्लॉक -3  सैक्टर 16 बी


आवास विकास योजना, 

आगरा 282010 ॰9319943446


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