Sunday, 9 March 2025

jalti theen chingariyan

 

Hkkjr dks vktkn djkus fudy iM+h Fkha ukfj;ka

ugha Fkha vcyk] uktqd dksey]tyrh Fkha fpaxkfj;ka

vR;kpkj lgs muus vR;kpkj gVkus dks

tqYeksa ls oks Mjh ugha tqYeh dks ekj Hkxkus dks

ns'k gekjk ge gSa oklh]dksbZ ge ij D;ksa jkt djs

Hkkjr ns'k gekjk gS ge gh gSa mlds j[kokjs

dkV fn;s eka ds ca/ku gj ukjh cuh flaguh Fkh

VwV iM+ha Fkha nq'eu ij varj dh Tokyk /k/kdh Fkh

tqye fd;s vaxzstksa us mu ij ?kksM+s nkSM+k;s Fks

tks >qdha pweus ekVh dks mu ij dksM+s cjlk;s Fks

?kksM+ksa dh Vkiksa ls ?kk;y eu gqvk vkSj ladfYir Fkk

Hkkjr eka ds t; ukjksa ls dj fn;k vkleka xqaftr Fkk

vR;kpkj lgs fdrus ij ugha fMxk ik;k dksbZ

fgy mBk fQjaxh 'kklu Fkk txk fn;k turk lksbZ

xwat mBk gj vksj ;gh ;g Hkkjr ns'k gekjk gS

NksM+ks Hkkjr dh ekVh dks ;g fgUnqLrku gekjk gS A

'kf'k xks;y

 

Sunday, 9 February 2025

gandhi ji aur ahinsa

 एक बार काका कालेलकर ने गांधीजी ने अहिंसा के बारे में  तरह तरह के सवाल पूछे। इस पर वे नाराज हो गये,और बोले ‘मान लिया कि तुम्हें अहिंसा मुझसे प्राप्त हुई ,लेकिन जब तुमने उसे अपना लिया,तो वह तुम्हारी हो गई। अब हर बात में,हर क्षेत्र में मुझसे पूछ पूछकर अहिंसा के स्वरूप का निर्णय मत करो ।’

अहिंसा को जीवन में उतारने का प्रयोग मैं अपनी सारी जिंदगी कर रहा हूं,और मुझे उसका साक्षात्कार एक ढंग से हो रहा है। जब तुम अपने जीवनानुभव के बल पर अहिंसा के निजी प्रयोग करोगे,तब तुम्हें शायद दूसरा ही दर्शन होगा । अहिंसा है तो एक सार्व भौम जीवन सिद्धान्त,लेकिन उसके रूप अनेक हो सकते हैं। और वे सब रूप अहिंसा के ही सच्चे स्वरूप माने जायेंगे। सवाल पूछकर मेरी अहिंसा विशेष स्पष्टता से समझ जाओगे ,और उसी का प्रचार करोगे ,तो वह तुम्हारी अहिंसा नहीं होगी। अहिंसा को तुमने पूर्ण हृदय से स्वीकार किया है। अब अपने ही ढंग से ,जीवन द्वारा अहिंसा की उपासना करो 


Saturday, 8 February 2025

Bhartiy dharm

 अमेरिकी पादरी रेवेरेन्ड आवार भारत में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये आये थे। स्थान ,स्थान पर हिंदू धर्म की निंदा और ईसाई धर्म की प्रशंसा कर रहे थे। उनकी बातें सुनकर वहाँ उपस्थित सीताराम गोस्वामी ने उनसे कहा,‘ आप बिना जाने समझे हिंदू धर्म की निन्दा क्यों कर रहे हैं? आपको चाहिये हिंदू धर्म के संबंध में कहने से पहले उसे भलीभंाति समझ लें।’

पादरी आवार को भी लगाा कि बिना किसी धर्म को समझे उसकी निंदा करना ठीक नहीं। उनहोंने संस्कृत मराठी भाषा का अध्ययन किया। जैसे जैसे उनके आगे हिन्दू धर्म के अगाध ज्ञान के पन्ने खुलते गये वे हिन्दू धर्म के प्रति नत मस्तक होते गये। अंत में उनहोंने अमरीकन मिशन को पत्र लिखा‘ भारत मेंसैंकडों ईसाई हैं अर्थात् ईसा जैसे अनेकों संत हो गये हैं। अतः भारत में ईसाईधर्म के प्रचार का औचित्य नहीं है । भारत वर्ष सत्य धर्म का अगाध समुद्र है। अतः मैं मिशन से त्याग पत्र देता हूं। आज के बाद मैं ईसाई धर्म का प्रचार नहीं करूंगा। इतना ही नहीं अपनी आठ लाख की संपत्ति जो अमेरिका में है उसे मैं भारतीय इतिहास शोधक मण्डल को अर्पित करता हंू जिससे मण्डल द्वारा भारतीय सद्ग्रन्थों का अनुवाद होता रहे।


Wednesday, 29 January 2025

tatayya aur madhumakhi

 ततैया और मधुमक्खी

ततैया और मधुमक्खी दोनों मित्र संग संग रहते थे लेकिन। जहॉ ततैया का स्वभाव रूखा और कठोर था मधुमक्खी बहुत मधुर स्वभाव की थी वह ततैया को अधिकतर टोकती कि इतने बुरे ढंग से सबसे व्यवहार मत किया करो। ततैया कहता तुम नहीं जानती मधुमक्खी बहन उसकी कोई सुनता भी नहीं है।‘ होगा लेकिन जबरदस्ती किसी का खाना पीना छीनना  भी अच्छा नहीं लगता।’ एक दिन दोनांे एक गुलाब के पौधे पर बैठे थे। पौधा पराग से भरा था उन्हें प्यास लग रही थी । आस पास कहीं पानी नहीं था। उन्होंने वही पराग पी लिया । पराग बेहद मीठा ंठडा था । उसे पीकर उनमें अदभुत् शक्ति, जाग गई। अब तो उन्होने निश्चय कर लिया कि रोज पानी की जगह पराग ही पिया करेंगे। ततैया को जब भी प्यास लगती वह उड़ता किसी भी फूल पर जा बैठता और उसमंे डंक चुभो देता और पराग पी जाता। मधुमक्खी टुकुर टुकुर देखती रहती । वो न मॉंग पाती न डंक चुभा पाती । एक दिन वह चमेली के फूल से बोली,‘ बहन प्यास लगी हैं जरा सा पराग दोगी’ तो चमेली बोली,‘ ऊपर से पी सको तो लेलो अंदर  डंक मत चुभाना तुम्हारा साथी ततैया तो आता है, जब देखो लंबा सा डंक चुभा कर पराग ले जाता है। मधुमक्खी दौड़ी दौड़ी गई और दो खोखली पतली नलियंॉ ले आई । अपने मुंह में लगा कर पीने लगी। उस दिन उसे इतना रस मिला कि उसका पेट एकदम भर गया । उसने ततैये से कहा कि जब रात को फूल बंद हो जाते है। तब रस नहीं मिलता ।  दोपहर में भी फूलों का रस सूख जाता हैं उसने छोटे छोटे घडे़ बनाने शुरू कर दिये और उनमें रस भर देती। अपने संगी साथी भी उसी काम में लगा लिये क्योकि फूल कहते कि रस लेलो नहीं तो बेकार जायेगा। ततैया ने भी घड़े बनाने शुरू किये लेकिन उसके डंक को देखते तो फूल डर जाते और उनका रस सूख जाता। उसके  कटोरे खाली ही रह जाते जबकि मधुमक्खी के हजारों घड़े भर जाते हैं।


Monday, 27 January 2025

Jeevan ka aarambh

 जीवन  का आरम्भ


यद्यपि विज्ञान ने इतनी तरक्की की है कि इंसान चांद पर जा पहुँचा है, परख नली शिशु उत्पन्न हो रहे हैं, अर्थात् प्रकृति के कार्यों पर, उसकी रचना पर, मानव अधिकार करना चाहता है। प्रारम्भ में पृथ्वी आग का गोला थी। जीवन उसमें असंभव था,लेकिन लाखों साल में जब ठंडी हुई उस पर पर्त दर पर्त चढ़ती गई, फिर भीषण वर्षा ने चारों और पानी ही पानी कर दिया और वातावरण में कार्बनडाई आक्साइड और अमोनिया भर गई। बिजली गिरने से सूर्य की प्रखर किरणांे से अनेकों रासायनिक परिवर्तन हुए तो छोटे छोटे जीवणुओं की उत्पत्ति हुई। लेकिन फिर भी पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ कैसे हुआ नहीं जान पाया है ? जीवन का आरम्भ जैली के से नन्हे कण से हुआ या किसी और तरह से यह केवल अनुमान मात्र है।

    स्वयं हमारा षरीर छोटे छोटे करोड़़ांे जीवाणुओं से मिलकर बना है। कालचक्र से ये जीवाणु दो प्रकार के बन गये। काई वैक्टीरिया एक तरफ और दूसरी तरफ प्रोटोजा। प्रथम प्रकार से वनस्पति का निर्माण हुआ, दूसरे प्रकार से जीव जन्तु का। इस प्रकार से हम कह सकते हैं जीव जन्तुओं का पिता प्रोटोजा है, जिसका जन्म समुद्र में हुआ। सर्वप्रथम काई ने फोटो सिन्थेसिस षैली के आधार पर आक्सीजन का निर्माण आरम्भ किया ,लेकिन उसके भी कई लाख साल, अब से करीब बारह अरब वर्ष पहले पृथ्वी पर आया। 

जीवन का प्रारम्भ समुद्र में हुआ ,लेकिन पृथ्वी के स्थान पर उभरने से जमीन का और पहाड़ों का निर्माण हुआ और ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगी। पृथ्वी पर सर्वप्रथम जिस प्राणी का आविर्भाव हुआ वह था, एम्फीबियन जो पानी और जमीन दोनों पर जीवित रह सकता था। कभी एक बार यह जीवाणु अधिक विकसित फेफेड़ों के साथ उत्पन्न हुआ और सूखी जमीन पर जीवित रहने में सफल हुआ। धीरे धीरे उनकी मात्रा बढ़ी, साथ ही ऊँचाई बढ़ती गई। ये जन्तु करीब 70,000,000 वर्ष पहले उत्पन्न हुए। ये बहुत भयानक और षक्तिषाली जन्तु ब्रोन्टोसोरस कहलाया है। चमड़ा, माँस और हड्डियों का विषाल पिंड, करीब 25 मीटर लम्बा, यह जीव अपने अगले पैरों पर बड़ी मुष्किल से खड़ा हो पाता था। विषाल षरीर के मुकाबले दिमाग बहुत छोटा और अक्ल बहुत कम होती थी। कुछ जन्तु नीचे नीचे आकाष में उड़ने लगे थे, वे पक्षियों के पूर्वज पैट्रोसॉरस थे। 

कई लाख साल बाद इतने विषाल पषुओं के बीच स्तन पायी जीव उत्पन्न हुआ ,यद्यपि षरीर अधिक बड़ा नहीं था लेकिन दिमाग बड़ा था और इसलिये वह विषाल जीवों के बीच अपने को बचा सका। 

फिर हिमयुग आया जिसमें तापमान 0 डिग्री से भी चालीस पचास डिग्री नीचे चला गया यह उन विषाल पषुओं के लिये विनाषकारी रहा लेकिन स्तनपायी जीव और पक्षियों के लिये विषेष नुकसानदायी नहीं रहा क्योंकि उनकी रगों में गर्म ख्ूान था। प्रकृति ने उनका षरीर बालों ओर पंखों से ढक दिया था, जबकि विषाल षरीर और रेंगने वाले जीव ठन्डे रक्त वाले थे, साथ ही सादा चमड़ी से अपने को जीवित नहीं रख पाये और समाप्त हो गये। जो बच गये थे वे थे मगर ,कछुआ, साँप और छिपकलियाँ। हिम युग कई साल तक चला। बीच बीच में कुछ वातावरण गर्म होता उस समय स्तनपायी जीवों और पक्षियों की प्रजातियाँ बढ़ती गईं। एक प्रकार का दो मीटर लम्बा भेड़िया, नुकीले दाँतों वाला षेर, पाँच मीटर लम्बे डैने वाले 

3

गिद्ध । अन्य नई प्रजातियां उत्पन्न हुईं वे थे भैसें, बैल ,घोड़े और मैमथ, (हाथी का पूर्वज) गंेडा, हिप्पो, हाथी , ये बच गये। नई कुत्ते बिल्लियों की जातियाँ उत्पन्न हुईं। इस प्रकार आधी से अधिक पषु पक्षियों की जाति 30,000,000 साल पहले मौजूद थीे। 

हिम युग के समय ही जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण उत्पत्ति हुई थी वे थे आदिमानव, ये कुछ कुछ वनमानुष जैसे थे। अफ्रीका के मैदानों मंे घूमते थे तथा सीधे दो पैरों पर चलते थे। ये अपने हाथों का उपयोग करना जानते थे। ये करीब 101, 120 सेन्टीमीटर लम्बे होते थे। पहला आदि मानव करीब 5000,000 साल पहले प्रगट हुआ, लेकिन आधुनिक मानव 35,000 साल पहले बन पाया। 

मनुष्य का प्रादुर्भाव कैसे हुआ इसके विषय में वैज्ञानिक कुछ भी कहें या चार्ल्स डार्विन कि मनुष्य पहले बंदर था, परंतु मनुष्य की उत्पत्ति विष्व के लिये एक उपलब्धि है। संसार की हलचलों का केन्द्रबिन्दु, ईष्वर की कल्पना की पूर्णता। जिसे हम कल्पना के अलग अलग रूपों

में पाते हैं।

ग्रीक मानते हैं मनुष्य की उत्पत्ति देवों के साथ साथ हुई । देवों या उनकी उत्पत्ति मिट्टी से हुई। उनके अनुसार मानव का निर्माण प्रामिथियस ने मिट्टी पानी से किया। बाइबिल में मनुष्य की उत्पत्ति दो प्रकार से दी है, ब्रह्मांड के पुनर्निर्माण के समय हुई उथल पुथल से । दूसरी मान्यता है कि मनुष्य का निर्माण मिट्टी से हुआ । पहले जीवन कैसा था, वैसा ही था जैसा आज है या किसी अन्य रूप में था। बहुत से प्रश्न उठ खड़े होते हैं, जिनमें से कुछ के उत्तर प्राणियों के प्राप्त जीवाश्मों से ज्ञात होता है। सबसे पुराना जीवाश्म पचास करोड़ वर्ष पुराना है। ये जीवाश्म पत्थर पर पड़ी छाप, हड्डियाँ या बर्फ में दबे कंकालों से बने हैं। पत्थर पर या अन्दर जमीन पर जीव की अनुकृति छप जाती है और जीव मिट्टी बन जाता है। इसी प्रकार कहीं-कहीं ऐसे विशाल प्राणियों के जीवाश्म प्राप्त हुए हैं या बिखरे कंकाल प्राप्त हुए हैं जिन्हें जोड़ने से विचित्र प्राणियों के आस्तित्व  के विषय में आधार बना।

अधिकतर जीवाश्म बलुआ मिट्टी में पाये जाते हैं। बालू एवं अन्य पदार्थ जब एक जगह एकत्रित होकर कठोर हो जाते हैं तब उसके अन्दर पड़ा पदार्थ भी उसी अवस्था में पत्थर बन जाता है। इसी प्रकार जब बालू मिट्टी पर पड़े जीव पर मिट्टी पड़ जाती है और कठोर हो जाती है तब जीव का जीवाश्म प्राप्त हो जाता है।समुद्री जीव मरकर समुद्र में डूब जाता है। पृथ्वी पर होती उथल-पुथल में कभी समुद्र का हिस्सा ऊपर उठ जाता है और उसमें पडे,़ पड़े मृत पदार्थ जीवाश्म के रूप में ऊपर आ जाते हैं।

कुछ जीवाश्म जीव के ही पत्थर बन जाने पर प्राप्त होते हैं। पत्थर पर पड़े मृत जीव पर पानी पड़ पड़कर उसका मांस मज्जा बह जाता है और तरह-तरह के रासायनिक पदार्थ उस पर पड़-पड़कर उसकी आकृति कठोर हो जाती है। कभी-कभी रासायनिक पदार्थ एकत्रित नहीं होते, लेकिन खाली ढांचे का आकार मात्र रह जाता है। इससे जीव की आकृति ज्ञात हो जाती है। कभी-कभी पूरा जीव बर्फ में हजारों साल बाद भी दबा मिल जाता है।

सबसे पुराना जीवाश्म पचास करोड़ वर्ष पुराना है। ये जीव बिना मेरुदंड वाले थे। रीढ़ वाले जीव बाद में धीरे-धीरे बने। इनका विकास भी इसी क्रम में हुआ रीढ़ बनने के साथ इनमें पंख, डैने आदि विकसित हुए और प्रजातियाँ बनीं। मछलियों के शरीर में फेफड़े विकसित हुए और कई करोड़ वर्ष बाद, प्रलय होने के बाद मछलियाँ सृष्टिकर्त्ता बनीं और विभिन्न 

4

जलचर, उभयचर की उत्पत्ति हुई। ये जल और थल दोनों पर समय बिताते थे। दस करोड़ वर्षों तक पृथ्वी पर राज्य करने के बाद यह जीवन भी समाप्त हुआ और डायनोसोर का जमाना आया। डायनोसोर का अर्थ है भयानक छिपकली। लगभग बीस करोड़ वर्ष तक इनका साम्राज्य रहा और ये पृथ्वी को हिलाते कंपाते रहे। ये सरीसृप प्रजाति के थे।

रीढ़ की हड्डी वाले जानवरों में मछली, चिड़िया और स्तनपायी जानवर आते हैं और बिना रीढ़ वालों में रंेगने वाले प्राणी। ये जीव रीढ़ की हड्डी रहित अवश्य थे लेकिन आजकल के रीढ़ की हड्डी रहित जीवों की भांति मात्र सरकने वाले जीव नहीं थे। इनका पीठ का हिस्सा आम चौपायों की तरह धरती से ऊपर उठा रहता था।

 पृथ्वी पर नभ, जल और थल पर अलग-अलग रूपों में विकसित होकर करोड़ों वर्ष तक राज्य करते रहे, फिर एकाएक विलुप्त हो गये और फिर हिमयुग आया और सृष्टि संहार हुआ। आस्टिन टैक्सस विष्वविद्यालय के वैज्ञानिकांे ने अध्ययन के बाद बताया है मैक्सिको के निकट 81 किलो मीटर बड़े आकार की उल्का पृथ्वी से टकराई जिसकी ताकत 1000 करोड़ बमों के बराबर थी। इसकी वजह से हजारों किमी क्षेत्र में आग लग गई साथ ही सुनामी पैदा हुई। पृथ्वी पर मौजूद 75 प्रतिषत जीव खत्म हो गये थे । इस टकराव के कारण सूर्य की किरणें लंबे समय के लिये पृथ्वी पर आने से रुक गईं, इससे तापमान में भारी गिरावट आई। डायनोसोर जैसे बड़े जीव खत्म हो गये ।

एक अरब वर्ष तक पृथ्वी पर बर्फ की चादर ढकी रही। मौसम ने रंग बदला और जीवन विकसित हुआ और इस बार स्तनपायी जीवों का विकास हुआ। मनुष्य इन्हीं का विकसित रूप है ,लेकिन करोड़ों वर्ष पुरानी पृथ्वी पर जीव जन्तुओं का ही साम्राज्य रहा है। मनुष्य तो केवल चालीस हजार साल पुराना है।










Friday, 24 January 2025

kabhi 26 jqnuary Tyohar Tha

 26 जनवरी  स्वाधीनता पर्व


   यद्यपि आजादी 1947 में मिली और स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त है। 26 जनवरी 1950 से गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाना प्रारम्भ हुआ,वह भी केवल एक साधारण मार्च पास्ट से  ,लेकिन यह अब भारत का सर्वाधिक गौरवपूर्ण दिवस बन गया है। भारत में तीन दिवस राष्ट्रीय घोषित हैं, गणतन्त्र दिवस, स्वाधीनता दिवस, व 2 अक्तूबर। हमारा संविधान इसी दिन पारित हुआ था।

,26 जनवरी जब राष्ट्रीय पर्व है तो उसे कैसे नहीं मनाया जाता।आज की पीढ़ी ने तो आजादी की जंग देखी नहीं उन्होंने परतन्त्रता भोगी नहीं तो कैसे उन्हें उसके महत्व का पता लगेगा किताबी बात और भोगे यथार्थ में उतना ही अन्तर है जितना अनन्त आकाश और धरती में। 

अब उससे जुड़े समारोह में भारत की सैन्य षक्ति, सामाजिक विकास तथा समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्षित करने का माध्यम है। 1952 से आम चुनाव की घोषणा इसी दिन से हुई और 1952 में प्रथम राष्ट्रपति के रूप में डा॰राजेन्द्रप्रसाद ने कार्यभार संभाला ।

गणतन्त्र दिवस की परेड प्रारम्भ होने से पहले प्रधानमंत्री षहीदस्मारक अमर जवान ज्योति पर श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। यह स्मारक 1962 चीन के आक्रमण के बाद ष्षहीदों की स्मृति में बनाया गया। श्रद्धा सुमन अर्पित करने ठीक नौ बजे प्रधानमंत्री पहुंचते हैं तब लतामंगेषकर द्वारा प्रदीप द्वारा सुरबद्ध गीत ‘ए मेरे वतन के लोगो’ बजाया जाता है जिसे सुनकर पंडित नेहरू की आंख में आंसू आ गये थे । सेना के तीनों अंग अपने प्रथम नागरिक, राष्ट्राघ्यक्ष सर्वोच्च सेनापति, राष्ट्रपति को और झंडे को सलामी देते हुए अपनी बटालियन के साथ मार्च पास्ट करते हुए निकलते हैं। वायुसेना थलसेना और नौसेना के साथ अर्द्धबल  सैनिक ,एन सी सी कैडेट स्कूली बच्चे अपना कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं। राष्ट्रपति के घुड़सवार अंगरक्षक जो उनके साथ रहते हैं वे बेहतरीन फौजी होते हैं यह स्वतंत्र इकाई होती है ।

 विदेषी राष्ट्राध्यक्ष इसके मुख्य अतिथि होते हैं और 21 तोपांे की सलामी दी जाती है । सभी राज्य अपने राज्य की विषेष्ताओं का प्रदर्षन झांकियों के माध्यम से करते हैं। सेना के तीनों अंग अपनी षक्ति का प्र्रदर्षन झांकियों के माध्यम से करते हैं । हाथी पर बहादुर बच्चे भी गुजरते हैं जिन्हें राष्ट्रपति भवन में एक समारोह में सम्मानित किया जाताहै। हवाई जहाज से तरह तरह के करतब दिखाये जाते हैं फूलों की बारिष, व कबूतर उड़ाने के साथ परेड समप्त हो जाती है।।

गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या पर लालकिले पर एक बृहद कवि सम्मेलन का आयोजन होता है ।

27 जनवरी को विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ विजय चौक पर बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी होती है । षाम के समय माारतीय सषस्त्र सेनाओं के बैंड संगीतमय प्रस्तुतियां देते हैं। 60 मिनट के इस कार्यक्रम में 1000 सैन्य संगीतकार हिस्सा लेते हैं। सारे जहां से अच्छा गीत के साथ समापन होजाता है। सभी सरकारी इमारतों पर बिजली की रोषनी की जाती है । राष्ट्रपति भवन दुत्हन की तरह सजाया जाता है

यद्यपि हमने भी पराधीनता के दिन बचपन में जिये जो जानता ही नही था कि क्या आजादी क्या गुलामी। उसकी दुनिया माँ की गोद तक सीमित थी लेकिन नई नई पाई आजादी की खुशियों को जिया था। वो उत्साह देखा है 15 अगस्त, छब्बीस जनवरी का स्वागत भी दीवाली की तरह होता तो 30 जनवरी को गम में डूबे भारत को भी देखा ठीक 11 बजे भोपू बज उठता और पूरा शहर स्थिर हो जाता उसकी आंख नीची होती और श्रद्धा से हाथ जोडे़ सब स्वतः खड़े हो जाते । एक मिनट के लिये शहर स्थिर हो जाता। बस, रिक्शे, तांगे सब रुक जाते थे अब 30 जनवरी को क्या है यह भी बताना पड़ता है। कुछ दिन बाद कार्यालयों में टंगे चित्र जो साल में एक बार पुछ जाते हैं घूल के पीछे खो जायेंगे, और गांधी कौन ? तब कौन से गांधी बच्चों को याद आयेेंगे नही कहा जा सकता।

25 जनवरी से शहर में चहल पहल शुरू हो जाती। पान की दुकान और सारे बाजार में आठ बजे रेडियो पर प्रसारित होने वाले राष्ट्रपति के भाषण को सुनने के लिये ठठ लग जाते थे। तब तक ट्रॉजिस्टर नहीं आया था हाँ रेडियो अवश्य थे वे भी हर घर में नहीं । रेडियो का आकार भी आज के टी वी जैसा बड़ा लंबा ऊँचा था । बड़े ध्यान से भाषण सुना जाता दम साध कर उस समय बाजार में चहल पहल रहती पर कान भाषण पर रहते । पूरे बाजार में पतली कागज की पन्नी की रंग बिरंगी या तीन रंग की तिकोनी झंडिया क्रिस क्रास ढंग से लगाई जातीं यह काम शाम से ही प्रारम्भ हो जाता। जगह जगह ग्रामोफोन लग जाते पहले  ग्रामोफोन पूरे दस लीटर की बाल्टी के से आकार के होते थे फिर छोटे बनने लगे थे।

प्रातःकाल भोर की बेला से ही देश भक्ति के गाने प्रारम्भ हो जाते , 6 बजे से वहाँ प्रभात फेरी निकलती इसमें शहर के सभी नेता व उत्साही कार्यकर्त्ता शहर के गणमान्य व्यक्ति नारे लगाते व देश भक्ति के गीत गाते निकलते। उसके बाद सभी स्कूलों के छात्रों की दो दो की पंक्तिबद्ध कतार निकलती हर स्कूल का बैनर दो स्काउट पकड़े चलते थे। हर स्कूल में स्काउट को प्रशिक्षण दिया जाता उनकी यूनीफॉर्म खाकी रंग की पैन्ट शर्ट व कैप रहती। लैफ्ट राइट लैफ्ट राइट करते स्काउट जाते दो दो की पंक्ति में ही सभी स्कूलों के बच्चे वंदे मातरम्, भारत माता की जय, करते या गीत गाते निकलते सभी स्कूल वहाँ से बड़े  मैदान में एकत्रित होते और वहाँ सम्मलित रूप से झंडारोहण किया जाता। झंडारोहण ठीक आठ बजे होता । झंडारोहण में जन गन मन के बाद ही वंदे मातरम् गाया जाता । उस समय छात्र छात्राऐं सांस्कृतिक कार्यक्रम विशेष रूप से एक्शन सोंग प्रस्तुत करते । 26 जनवरी का महत्व बताया जाता बूंदी तो मिलती ही थी। उसके पश्चात् सभी छात्र-छात्राएँ अपने अपने स्कूल में चले जाते जहाँ दोपहर तक खेलकूद व सांस्कृतिक कार्यक्रम होते, दूसरे दिन का अर्थात् 27 जनवरी का बच्चों को अवकाश दिया जाता। आवश्यक नहीं था सभी छात्र छात्राएँ प्रभातफेरी में जाये जो नहीं जाना चाहते थे उन्हें सीधे स्कूल जाना होता था पर काफी बच्चे हर स्कूल से रहते थे।

हर चौराहे पर हर गली के नाके पर ग्रामोफोन लगा रहता जहाँ पर गाने बजते रहते उस समय का सबसे अधिक प्रिय और चलने वाला गाना था ‘ये देश है वीर जवानों का’ अलबेलों का मस्तानो का’ यह गाना आज भी बरात के सामने नाचने वालों का भी उतना ही प्रिय है सबसे अच्छा पैर इसी धुन पर उठता है। ‘ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन’ जहॉ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा’ गूंजने लगते थे ।

हर व्यक्ति के कुर्ते, शर्ट, ब्लाउज आदि पर तिरंगा झंडा लगा रहता था। हर दुकान पर घर पर प्रातः काल ही झंडा लगा दिया जाता था तब न तो झंडा लगाना प्रतिबंधित था न उसका आकार प्रतिबंधित था हमारे घर पर पिताजी प्रातः काल ही 21 फुट लंबा और सात फुट चौड़ा तिरंगा झंडा लोहे की रोड से बंधवाते थे। दुछत्ती पर बंधा वह झंडा हवा के साथ शान से लहराता और बाजार में दूर से दिखाई देता था। फिर प्रारम्भ होते थे हर दल के जुलूस कॉग्रेस, जनसंघ, सोशलपार्टी और भी कई दल। पर दल बहुत नहीं थे अब तो हर गली मुहल्ले का अपना दल है।

 शाम के समय झांकियाँ निकलती थीं स्कूलों की, कार्यालय व विभागों की। व्यक्तिगत लोगों की झांकियाँ निकलती थी।

 अधिकांश झांकियाँ देश भक्ति पर आधारित होती थीं। झांकियो के साथ उस विभाग के व्यक्ति होते थे। उसके बाद खुली बग्धी में गणमान्य व्यक्ति निकलते थे प्रारम्भ हाथी से होता और अन्त 4 घोड़ांे पर बैठे सिपाहियों से। बहुत से स्कूल शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रम करते थे। खाने में भी उस दिन विशेष रूप से खीर पूरी बनाई जाती और पूरी भी तीन रंग की हरी पीली और सफेद। खीर में केसर इतनी रहती कि उसमें काफी पीला पन आ जाता था।

और यही हाल करीब करीब हर घर में होता था।

      अब तो स्कूलों में भी 26 जनवरी के नाम पर सिर्फ झंडारोहण होता है और धूप में बैठे बच्चों को केला, फ्रूटी या बिस्कुट दे दिये जाते है हो गई 26 जनवरी। गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस क्यों है अलग अलग यह तो कतई नहीं जानते बल्कि एक बच्चे ने बड़ा ही मजेदार उत्तर दिया उसने बताया 15 अगस्त को पाकिस्तान बना और 26 जनवरी को हिन्दुस्तान। न उत्साह स्कूल जाने का बच्चों को क्या करना है कुछ होता तो है नहीं ’आजादी का अर्थ ही उनकी निगाह में अलग है वे निजात चाहते हैं भारतीय संस्कृति से ,अपने ऊपर लगे  प्रतिबंधों से ।



Thursday, 23 January 2025

Shanti peace

 इस साल को सफल बनाने के लिए - सोचो कि मैं  दूसरों को किस तरह प्रोत्साहन और प्रेरणा दूं- प्रेरणा और प्रोत्साहन पाने का यह पहला सिद्धान्त है ।

आज को संभालो-कल हुई भूलों को भुला दो ,कल आने वाली चिंताओं का इंतजार न करो।

सबसे  वफादारी की आशा करो,सबके साथ वफादारी करो। भगवान् ने हर मनुश्य को बल दिया है । उस बल को बढ़ाओ- अपनी कमजोरियों से ऊपर उठने में मदद मिलेगी।

अपने से ऊँची चीजों,ऊचे आदमियों को देखो- पाओगे कि पहले तुम अधिक कार्य और सेवा करने पा रहे हो।

व्यक्तियों से ,वस्तुओं और योजनाओं से अच्छाई की आशा करो 

हर चीज से शांति की अपेक्षा रखो - शांति पाओगे।

कोई भी निर्णय करते समय प्रभु की इच्छा को समझने की कोशिश करो- जरूर वह तुम्हें राह दिखायेगा।

नेपोलियन ने मिस्त्र पर आक्रमण किया तो वह अनेक विद्वानों को प्राचीन सभ्यता सम्पन्न देश में शोधकार्य के लिये अपने साथ ले गया । अभियान के समय जब शत्रु प्रत्याक्रमण करते तब माल से लदे गधों और पांडित्य से लदे विद्वानों की रक्षा करनी पड़ती। जब शत्रु चारों ओर से धावा करते तब नेपोलिसन आज्ञा देता‘,घेरा बनाओ ,गधों और पंडितों को बीच में रखो ।’

ये सेवंटस अर्थात पंडित देश प्रेमी ,साहसी और कष्टसहिष्णु थे । ये समाज सेवा का ही विचार रखते थे,फिर भी आत्मरक्षा के लिएये सैनिकों के आश्रित थे। गधों के साथ उनकी भी रक्षा करनी पड़ती थी । बुद्धिजीवियों,पंडितों और विद्वानों को ऐसी आश्रित दशा छोड़नी चाहिए।-महात्मा गांधी