Thursday, 23 July 2026

manushya ki shakti

 मनुष्य जो कुछ भी है अपने अंदर की शक्ति से है और वह शक्ति ईश्वर की कृपा से मिलती है। ईश्वर की कृपा अर्थात् स्वयं की शक्ति के साथ ईश्वरीय शक्ति मिलकर मनुष्य को कुछ कर गुजरने की इच्छा दे देते हैं। कभी भी मन से नहीं हारना चाहिये। मन के हारे हार मन के जीते जीत। परन्तु यह भी न सोचें कि जो कुछ भी है उसने किया है स्वयं ने ,वह सब कुछ है। जब तक ईश्वरीय इच्छा न होगी मानव कुछ नहीं कर सकता है ।दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम ,जिस दाने पर हमारा नाम होगा वही हमें मिलेगा और हम सोचें कि यह दाना हमने उठाया है,इसके हम अधिकारी हो गये,नहीं जब तक ईश्वर की इच्छा नहीं होगी दाना आपके मंुह में नहीं जायेगा। परंतु यह सोच लें कि ईश्वर हमारे मुह में उठाकर दाना डालेगा तो यह भी बिना अपनी इच्छा के नहीं होगा। हर कार्य के पीछे ईश्वरीय इच्छा और अपनी इच्छा दोनों होते हैं। जब व्यक्ति यह कहने लगता है मैं ,मैं ही सब कुछ कर रहा हूं,मैंने यह किया इसलिए यह पाया। यहां पर वह गलत है,प्रयत्न अपनीे स्थान पर है,ईश्वरेच्छा अपने स्थान पर है। जब  मनुष्य हर कार्य को करके ईश्वर को धन्यवाद करता है तभी वह वास्तव में ईश्वर का कृपा पात्र होता है 

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