अधिकतर अब दम्पत्ति यही चाहते हैं िकवे अकेले रहें वे दो बस ,न किसी को कुछ कहना पड़े न बताना पड़े न कोई उन पर जिम्मेदारी हो िकवे घर पर से कैसे जायें क्या खा रहे हैं और कीां जा रहे हैं । मां बाप होते हैं तो यह सब बताना पड़ता है । मां बाप टोक भी देते हैं कि यह क्या कल भी बाजार का खाया आज भी बाजार का । बच्चे करना नहीं चाहते बच्चा होना मतलब बंधन । बहुत कहने पर किया भी तो एहसान से एक, चाहे लड़का हो या लड़की । अब लड़की भी कोई कम नहीं होती हैं । दो होते हैं तो बहुत अंतर से वे बड़े होते हैं अलग अलग तरह से वे भाई बहन की तरह नहीं जो लड़ते झगड़ते हैं वे दो अजनबियों की तरह रहते हैं क्योंकि उम्र का अंतर उन्हें साथ नहीं दे पाता। और बच्चे तरह तरह की डिवाइसों की तरफ मुड़ जाते हैं । अब मां बच्चे को अपना दूध तो पिलाती नहीं है वो बोतल से दूध पिलाती है और बच्चा दूध पीले बोतल हटाये नहीं उसके सामने मोबाइल रख देती है और बच्चा उन चलती तस्वीरों को देखकर दूध पी लेता है फिर वह उसका आदी हो जाता है और बिना मोबाइल असहज हो उठता है। जितनी देर तक आप या बालक मोबाइल पर आंख लगाये रहते हैं आप अपने परिवार से दूर हो जाते हैं यह उनसे छीना हुआ समय है। एक निष्क्रियता का जीवन जिसमें चंद इंन्द्रियां सक्रिय रहती हैं बाकी सब निष्क्रिय होती जाती हैं। मस्तिष्क की उर्वरता तो बिलकुल खत्म हो जाती हैं। -रटत रटत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ’पर यहां तो सुजान भी जड़मति हो जाते हैं। कयोंकि मस्तिष्क पर जोर देने की आवश्यकता ही नहीं रह गई है
Shashi Goyal
Monday, 27 April 2026
Sunday, 26 April 2026
Why do we say it
He has an axe to grind
Selfish motive to advance
anubhutiyan
हमारे अंदर अनुभूतियों का सागर है,प्रवाह है। ये जीवन का बैरोमीटर है,ये हमारे अंदर की षक्ति को प्रदर्षित करता है। हमारी कल्पना को आगामी जीवन की कल्पना कहता है, यह तो प्रकृति का सुंदरतम उपहार है, इसे अभिव्यक्ति देना ईष्वरीय सत्ता को नमन करना है । हम जीवन को कैसे देख रहे हैं ? हम कैसा महसूस कर रहे हैं ?इस छोटी सी बात पर ही सारा जीवन टिका है। हमारी सफलताऐं असफलताऐं सब में यह बात निहित है, तो उसे हम बाहर आने दें ।
हमें अपने अंदर की इस षक्ति को उपयोग में लाना है, एंड्र कार्नेगी ने भट्टी बनाई और स्टील मिल की नींव रखी, जब कि हिटलर ने वही भट्टी लाषों को ठिकाने लगाने में काम में लाई ।
जब तक जीवन कार्यषील है, तब तक ही उपयोगी है, नहीं तो मिट्टी है। मिट्टी कितनी ही उपयोगी हो, रोंदी पैरों तले ही जायेगी ,जब वह कोई आकार ले लेती है तो सिर माथे भी रखी जाती है। सड़क का पत्थर ठोकर खाता है,जब वह मूर्ति रूप ले लेता है तो देवता बन जाता है ।
Friday, 24 April 2026
mobaile aur bacche
यद्यपि मोबाइल,‘दनिया मेरी जेब में ,तकनीकी विज्ञान का चमत्कार है इसने पूरी दुनिया को सबके सामने एक क्लिक पर ला दिया है और यदि कहा जाए तो एसा छोटा सा डिब्बा वह जो अगर आपके पास है तो आपको न मोटे मोटे एनसाइक्लोपीडिया,डिक्शनरी,कुछ भी नहीं चाहिए । वैसे ही पुस्तके अपना आस्त्त्वि खोती जा रही है। इस छोटी सी डिबाइस ने पुस्तकों को धूल खाने को विवश कर दिसा है। मोबाइल ने न जाने कितनी चीजों को डिब्बे में बंद कर दिया है। बच्चे जहां रंग बिरंगी किताबों को खोल कर पढ़ने बैठते थे अब गर्दन झुकाए छोटी सी स्क्रीन पर देखते रहते हैं? संभवतः एक दिन गर्दन टेढी वाले ही पैदा होने लगेंगे ।आंखें अपना आस्त्त्वि खो देंगी पर मोबाइल की दुनिया बच्चे छाड़ने के लिए तैयार नहीं होंगे ,
सिमटते परिवारों ने बच्चों का एकाकीपन बढ़ा दिया था उसकी वजह से बच्चे चिड़चिड़े हो रहे थे पर अब बच्चे एकाकीपन अधिक पसंद करते हैं आपके बोलने तक ये चिढ़ने लगते हैं। अब बैट बल्ला नहीं खेलना चाहता। वे गेम वीडियो पर खेलते हैं। वर्चुअल दुनिया में समा गये हैं। आपका किसी काम का कहना या बुलाना उन्हें झुंझला देता है ।
Wednesday, 22 April 2026
hum badal rahe hain
हम अपने अंदर बुनियादी बदलाब चाहते हैं। चेतना जाग्रत होती है पर कैसे के सवाल के साथ ही इब जाती है,कारण मन सोचता कुछ और है लेकिन जब कभी कार्यान्वित करने का अवसर आता है तो मन बदल जाता है अपने पुराने ढर्रे पर चल देता है। असली बदलाव युवा वर्ग में आ रहा है,रोमांच फन और पैसों के दुरुपयोग का शान शैकत आदि की ओर अधिक घ्यान दे रहे हैं। यहां विचार और विचारक बदल जाते हैं । भारतीय संस्कृति उच्चतम पायदान पर थी अब धीरे धीरे वह एकदम निचले स्तर पर आती जा रही है । बेटा बाप का कत्ल कर रहा है ,बेटी पूरे परिवार को मौत की नींद अपनी हवस के कारण सुला रही हैं भाई भाई को मार रहा है बहन हिस्से के लिये लड़ रही है ,इकलौते भाई को मार रही है,जिससे अकेली वह जमीन जायदाद की वारिस बन जाये ।
Tuesday, 21 April 2026
shabd ko nishabd ki abha cahiye
आजकल आम बोलचाल की भाषा में नये नये शब्द गढ़कर आ गये हैं। अगर उनका शाब्दिक अर्थ देखा जाये तो अर्थ का अनर्थ हो सकता है। मीडिया को बाइट चाहिये ऐसा लगता है मीडिया काटखाने के लिये दौड़ती ह या हम चबा चबा कर शब्द बोल रहे हैं कि कुछ मंुह से गलत न निकल जाए जो अखबारों की सुर्खियां बन जाऐं। पर फिर भी जब दो विरोधी पार्टियां एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाती हैं तो उस समय ऐसा लगता है कि अंडरवर्ल्ड के लोग हैं जो एक दूसरे को शब्दों से नहीं मार रहे चाकू छुरे घोंप रहे हों फिर बाद में माफी मांगते दिखेंगे कि कुछ अनजाने में शब्द निकल गये जब कि वे जानबूझ कर बोले गये होते हैं पर दिखाते हैं कि गलती से निकल गए।जैसे भोजन खायें या ठूस लें । आहत को राहत चाहिये न कि कटु शब्दों की मार कि ऐसा होना चाहिये। विष भरे शब्द घायल के घाव को कुरेद कर उसे नासूर बना देते हैं। अर्न्तमन से निकला शब्द असर करता है। मन में शब्द पलने चाहिए उन्हें परिपक्व होने देना चाहिए कि आप बोल रहे हैं वह कहां तक उचित हैं। आपके शब्दों का प्रभाव पड़ेगा या नहीं । आपके भाव और मन की ऊर्जा शब्दों में प्रवेश करती है और आपका वाक्य वजनदार हो जाता है। शब्द को भी निशब्द की आभा चाहिये ,कौन से निकले शब्द घायल मन के लिये औषधि होंगे ,वजनदार होंगे
Saturday, 18 April 2026
boliye magar sambhal kar
बोलिये मगर संभल कर ,मुंह से निकला शब्द और तरकश से निकला तीर वापस नहीं आ सकता,जब दोनों की दिल पर लगते हैं तो घायल कर देते हैं इसलिए अच्छा है कि बोलते समय ही संभल कर बोलिये। मन में कुछ और जुबां पर कुछ भी कभी कभी आवश्यक है
एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव
शब्द संभल कर बोलिये शब्द के हाथ न पाव
कबीर दास जी ने एक दोहे में पूरा जीवन का फलसफा सामने रख दिया । शब्द घायल मन पर मलहम का काम भी कर सकते हैं और उसे कुरेद कर नासूर बना सकते हैं । वे शब्द ही आपकी धारणा का इजहार करते हैं आप सामने वाले के प्रति कितनी आस्था रखते हैं ।